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	<title>भर्तृहरि - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;रोहित साव27: Dinesh kumar live (Talk) के संपादनों को हटाकर Ts12rAc के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया</title>
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		<updated>2021-07-16T12:29:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/Dinesh_kumar_live&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/Dinesh kumar live&quot;&gt;Dinesh kumar live&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:Dinesh_kumar_live&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:Dinesh kumar live (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;Talk&lt;/a&gt;) के संपादनों को हटाकर &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:Ts12rAc&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य:Ts12rAc (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;Ts12rAc&lt;/a&gt; के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[File:Hindi Manuscript 884 Wellcome L0024558.jpg|thumb|Hindi Manuscript 884 Wellcome L0024558|भर्तृहरि]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भर्तृहरि&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक महान संस्कृत कवि थे। [[संस्कृत साहित्य]] के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शतकत्रय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ([[नीतिशतकम्|नीतिशतक]], [[शृंगारशतकम्|शृंगारशतक]], [[वैराग्यशतकम्|वैराग्यशतक]]) की उपदेशात्मक कहानियाँ भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु [[गोरखनाथ]] के शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था इसलिये इनका एक लोकप्रचलित नाम &amp;#039;&amp;#039;बाबा [[भरथरी]]&amp;#039;&amp;#039; भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जीवन चरित ==&lt;br /&gt;
इनके आविर्भाव काल के सम्बन्ध में मतभेद है। इनकी जीवनी विविधताओं से भरी है। राजा भर्तृहरि ने भी अपने काव्य में अपने समय का निर्देश नहीं किया है। अतएव दन्तकथाओं, लोकगाथाओं तथा अन्य सामग्रियों के आधार पर इनका जो जीवन-परिचय उपलब्ध है वह इस प्रकार है :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार भर्तृहरि विक्रमसंवत् के प्रवर्तक के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से ५६ वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता है जो [[विक्रमादित्य]] के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि [[विक्रमादित्य]] के अग्रज थे, अत: इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् ७८ और कुछ लोग ई० सन् ५४४ में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं। फारसी ग्रंथ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कलितौ दिमन:&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में पंचतंत्र का एक पद्य &amp;#039;शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्&amp;#039; का भाव उद्धृत है। [[पञ्चतन्त्र|पंचतंत्र]] में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवत: [[पञ्चतन्त्र|पंचतंत्र]] में इसे नीतिशतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ ५७९ ई० से ५८१ ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानत: ५५० ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आये थे। भर्तृहरि [[उज्जैन|उज्जयिनी]] के राजा थे। ये &amp;#039;विक्रमादित्य&amp;#039; उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्होनें सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीति, वैराग्य तथा श्रृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक-काव्य लिखे हैं। इस शतकत्रय के अतिरिक्त, &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[वाक्यपदीय]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; नामक एक उच्च श्रेणी का [[व्याकरण]] ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है। कुछ लोग [[भट्टिकाव्य]] के रचयिता भट्टि से भी उनका ऐक्य मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि [[नाथ सम्प्रदाय|नाथपंथ]] के वैराग्य नामक उपपंथ के ये ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री [[इत्सिंग]] के अनुसार इन्होंने [[बौद्ध धर्म]] ग्रहण किया था परन्तु अन्य सूत्रों के अनुसार ये [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैत वेदान्ताचार्य]] थे। चीनी यात्री इत्सिंग के यात्रा विवरण से यह ज्ञात होता है कि ६५१ ईस्वी में भर्तृहरि नामक एक [[वैयाकरण]] की मृत्यु हुयी थी। इस प्रकार इनका सातवीं शताब्दी का प्रतीत होता है परन्तु भारतीय पुराणों में इनके सम्बन्ध में उल्लेख होने से संकेत मिलता है कि इत्सिंग द्वारा वर्णित भर्तृहरि कोई अन्य रहे होंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लोककथाएँ===&lt;br /&gt;
भर्तृहरि जी की एक कथा बहुत प्रसिद्ध है जो बताती है कि वे कैसे सन्यासी बने। वह कथा नीचे दी गयी है किन्तु भर्तृहरि के [[नीतिशतकम्|नीतिशतक]] के आरम्भिक श्लोक में इसी को संकेत रूप में कहा गया है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;साप्यन्यम् इच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः ।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥ &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;( अर्थ - मैं जिसका सतत चिन्तन करता हूँ वह (पिंगला) मेरे प्रति उदासीन है। वह (पिंगला) भी जिसको चाहती है वह (अश्वपाल) तो कोई दूसरी ही स्त्री (राजनर्तकी) में आसक्त है। वह (राजनर्तकी) मेरे प्रति स्नेहभाव रखती है। उस (पिंगला) को धिक्कार है ! उस अश्वपाल को धिक्कार है ! उस (राजनर्तकी) को धिक्कार है ! उस कामदेव को धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है !)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके एक और रानी अनंगसेना थी जिसको राजा बहुत प्यार करते थे। उसका राजा के घोड़े के चरवाहे चंद्रचूड़ से भी प्यार था और सेनापति से भी था। उस सेनापति का नगरवधू रूपलेखा के घर भी आना जाना था।राजा भी उस रूपलेखा के यहाँ चंद्रचूड़ कोचवान के साथ बग्घी में बैठकर जाते थे। इस तरह चंद्रचूड़ और सेनापति दोनों का ही रानी अनंगसेना और रूपलेखा से प्यार का सम्बन्ध था।यह बात योगी गोरखनाथ जी को पता चली तो उन्होंने ही किसी ब्राह्मण के साथ अमरफल भेजा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा ने वो अमरफल रानी अनंगसेना को दिया।रानी ने वो अमरफल चंद्रचूड़ को दिया। चंद्रचूड़ जब उस अमरफल को लिया और जब वो राजा भर्तहरी को रूपलेखा के यहाँ ले गया। तब राजा जब मदहोश हो गया तब चंद्रचूड़ ने उसके साथ प्यार कर के वो अमरफल रूपलेखा को यह कहकर दे दिया की वो उसको खायेगी तो अमर हो जायेगी और उसका चिरकाल तक यौवन बना रहेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वही फल रूपलेखा ने राजा को दे दिया की वो उसको खाएंगे तो अमर हो जायेंगे।वो खुद के जीवन से घृणा करती थी।&lt;br /&gt;
उस फल को देख राजा क्रोधित हो गए।पूछने पर रूपलेखा ने चंद्रचूड़ का नाम बताया की उसीने उसको अमरफल दिया था।जब चंद्रचूड़ ने को राजा तलवार निकाल कर सच पूछा तो उसने रानी अनंगसेना के साथ अपने सम्बन्ध कबूले और सेनापति का भी भेद बताया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस दिन अमावस्या की रात थी।राजा आगबबूला होकर नंगी तलवार लिए शोर करता हुआ अनगसेना के आवास की तरफ बढ़ चला।अनगसेना ने राजा के क्रोध से डरकर सच मान लिया।लेकिन उसी अमावस्या की रात रानी ने आत्मदाह कर लिया।सईस चंद्रचूड़ को देश निकाला दिया गया और सेनापति को मृत्युदंड दिया गया।&lt;br /&gt;
अब राजा उदास रहते थे।पिंगला ने ही उनको आखेट के लिए भेजा था।फिर आखेट के समय एक सैनिक मारा गया तो उसकी पत्नी उसकी देह के साथ सती हो गई।&lt;br /&gt;
राजा सोच में पड़ गया।एक नारी थी अनगसेना।एक नारी है रूपलेखा।और एक नारी है उस सैनिक की पत्नी।&lt;br /&gt;
क्या है नारी??&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब पिगला वाली बात आती है जब राजा की मौत का झूठा समाचार सुनते ही रानी मरने को तैयार हो जाती है।&lt;br /&gt;
जब गोरखनाथ जी मृत हिरन को जीवित कर देते है तब वो राजपाट से बहुत ऊबे हुए होते है।&lt;br /&gt;
गोरखनाथ जी एक शर्त रखते हैं कि वो रानी पिंगला को माता कहकर महल से भिक्षा लाएं तो ही वे उनको अपना शिष्य बनायेगे।रानी पिगला बहुत पतिवृता थी।&lt;br /&gt;
भगवा धारण करके राजमहल के द्वार आकर राजा भृतहरि आवाज लगाते है:-अलख निरंजन।माता पिंगला भिक्षाम् देहि।&lt;br /&gt;
पिंगला रानी की आँखों से जल धारा बह निकलती है।&lt;br /&gt;
काफी वार्तालाप के बाद रानी भिक्षा पात्र में डाल देती है।&lt;br /&gt;
इसके बाद गोरखनाथ जी उनको शिष्य बनाकर अपने साथ ले जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== किंवदन्तियाँ==&lt;br /&gt;
इनके जीवन से सम्बन्धित कुछ किंवदन्तियाँ इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिये गये हुए थे। वहाँ काफी समय तक भटकते रहने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। निराश पति-पत्नी जब घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। जिसके आगे एक मृग चल रहा था। भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि &amp;#039;&amp;#039;महाराज, यह मृगराज ७ सौ हिरनियों का पति और पालनकर्ता है। इसलिये आप उसका शिकार न करें। भर्तृहरि ने पत्नी की बात नहीं मानी और हिरन को मार डाला जिससे वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा। प्राण छोड़ते-छोड़ते हिरन ने राजा भर्तृहरि से कहा- &amp;#039;&amp;#039;तुमने यह ठीक नहीं किया। अब जो मैं कहता हूँ उसका पालन करो। मेरी मृत्यु के बाद मेरे सींग श्रृंगीबाबा को, मेरे नेत्र चंचल नारी को, मेरी त्वचा साधु-संतों को, मेरे पैर भागने वाले चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी पापी राजा को दे दो।&amp;#039;&amp;#039; हिरन की करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। हिरन का कलेवर घोड़े पर लाद कर वह मार्ग में चलने लगे। रास्ते में उनकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हुई। भर्तृहरि ने इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरन को जीवित करने की प्रार्थना की। इस पर [[गोरखनाथ|बाबा गोरखनाथ]] ने कहा- &amp;#039;&amp;#039;मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूँ कि इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा।&amp;#039;&amp;#039; राजा ने गोरखनाथ की बात मान ली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भर्तृहरि ने वैराग्य क्यों ग्रहण किया यह बतलाने वाली अन्य किंवदन्तियां भी हैं जो उन्हें राजा तथा [[विक्रमादित्य]] का ज्येष्ठ भ्राता बतलाती हैं। इनके ग्रंथों से ज्ञात होता है कि इन्हें ऐसी प्रियतमा से निराशा हुई थी जिसे ये बहुत प्रेम करते थे। &amp;#039;&amp;#039;नीति-शतक&amp;#039;&amp;#039; के प्रारम्भिक श्लोक में भी निराश प्रेम की झलक मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने प्रेम में धोखा खाने पर वैराग्य जीवन ग्रहण कर लिया था, जिसका विवरण इस प्रकार है। इस अनुश्रुति के अनुसार एक बार राजा भर्तृहरि के दरबार में एक साधु आया तथा राजा के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उन्हें एक अमर फल प्रदान किया। इस फल को खाकर राजा या कोई भी व्यक्ति अमर को सकता था। राजा ने इस फल को अपनी प्रिय रानी पिंगला को खाने के लिए दे दिया, किन्तु रानी ने उसे स्वयं न खाकर अपने एक प्रिय सेनानायक को दे दिया जिसका सम्बन्ध राजनर्तिकी से था। उसने भी फल को स्वयं न खाकर उसे उस राजनर्तिकी को दे दिया। इस प्रकार यह अमर फल राजनर्तिकी के पास पहुँच गया। फल को पाकर उस राजनर्तिकी ने इसे राजा को देने का विचार किया। वह राजदरबार में पहुँची तथा राजा को फल अर्पित कर दिया। रानी पिंगला को दिया हुआ फल राजनर्तिकी से पाकर राजा आश्चर्यचकित रह गये तथा इसे उसके पास पहुँचने का वृत्तान्त पूछा। राजनर्तिकी ने संक्षेप में राजा को सब कुछ बतला दिया। इस घटना का राजा के ऊपर अत्यन्त गहरा प्रभाव पड़ा तथा उन्होंने संसार की नश्वरता को जानकर संन्यास लेने का निश्चय कर लिया और अपने छोटे भाई विक्रम को राज्य का उत्तराधिकारी बनाकर वन में तपस्या करने चले गये। इनके तीनों ही शतक उत्कृष्टतम संस्कृत काव्य हैं। इनके अनेक पद्य व्यक्तिगत अनुभूति से अनुप्राणित हैं तथा उनमें आत्म-दर्शन का तत्त्व पूर्णरूपेण परिलक्षित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भविष्य पुराण]] से ज्ञात होता है कि राजा विक्रमादित्य का समय अत्यन्त सुख और समृद्धि का था। उस समय उनके राज्य में जयंत नाम का एक ब्राह्मण रहता था। घोर तपस्या के परिणाम स्वरूप उसे इन्द्र के यहाँ से एक फल की प्राप्ति हुई थी जिसकी विशेषता यह थी कि कोई भी व्यक्ति उसे खा लेने के उपरान्त अमर हो सकता था। फल को पाकर ब्राह्मण अपने घर चला आया तथा उसे राजा भर्तृहरि को देने का निश्चय किया और उन्हें दे दिया। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भर्तृहरि विक्रमादित्य के बड़े भाई तथा [[भारत]] के प्रसिद्ध सम्राट थे। वे [[मालवा]] की राजधानी उज्जयिनी में न्याय पूर्वक शासन करते थे। उनकी एक रानी थी जिसका नाम पिंगला बताया जाता है। राजा उससे अत्यन्त प्रेम करते थे, जबकि वह महाराजा से अत्यन्त कपटपूर्ण व्यवहार करती थी। यद्यपि इनके छोटे भाई विक्रमादित्य ने राजा भर्तृहरि को अनेक बार सचेष्ट किया था तथापि राजा ने उसके प्रेम जाल में फँसे होने के कारण उसके क्रिया-कलापों पर ध्यान नहीं दिया था। उस अनुश्रुति के आधार पर यह संकेत मिलता है कि भर्तृहरि मालवा के निवासी तथा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== काव्य शैली ==&lt;br /&gt;
भर्तृहरि संस्कृत [[मुक्तक]]काव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरल, मनोरम, मधुर,रसपूर्ण तथा प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग, विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियाँ जन-जन में प्रचलित रही हैं और समय-समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[भरथरी]]&lt;br /&gt;
* [[शृंगारशतकम्|शृंगारशतक]]&lt;br /&gt;
* [[नीतिशतकम्|नीतिशतक]]&lt;br /&gt;
* [[वैराग्यशतकम्|वैराग्यशतक]]&lt;br /&gt;
* [[वाक्यपदीय]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20120107221856/http://prayaslt.blogspot.com/2010/04/blog-post_4949.html भर्तृहरि और उनका भाषा-चितंन]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20090410082257/http://tempweb34.nic.in/xneeti/html/index.php भर्तृहरिविरचित नीतिशतक]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110315033532/http://sa.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AF वाक्यपदीय] (विकिपुस्तक)&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=D5ci3yIxNIkC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false The Vākyapadīya of Bhartṛhari: Kāṇḍa II., Volume 2] (Google book By K.A. Subramania Iyer, Bhartr̥hari)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20140702181358/http://www.hindisahityadarpan.in/2014/05/bhartrihari-neeti-shatak-hindi-complete.html सम्पूर्ण भर्तृहरि नीति शतक हिंदी और अंग्रेजी में]&lt;br /&gt;
*[https://www.mpinfo.org/Story/StoryDetails.aspx?StoryID=160318S4&amp;amp;CatId=25 भर्तृहरि-सिद्ध और सत्र]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}&lt;br /&gt;
*[https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/aasthaaurchintan/bhartrihari-and-fruit-of-immortality/ बिना अमरफल खाए अमर हुए भर्तृहरि] (नवभारत टाइम्स)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृत कवि]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:वैयाकरण]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;रोहित साव27</name></author>
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