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	<title>भाषा-परिवार - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-25T04:43:29Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;अनिरुद्ध कुमार: मृत कड़ी हटाई</title>
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		<updated>2020-12-01T08:55:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;मृत कड़ी हटाई&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Languages.png|right|thumb|400px|विश्व के प्रमुख भाषाकुलों के भाषाभाषियों की संख्या का पाई-चार्ट]]&lt;br /&gt;
आपस में सम्बंधित [[भाषा]]ओं को &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;भाषा-परिवार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कहते हैं। कौन भाषाएँ किस परिवार में आती हैं, इनके लिये वैज्ञानिक आधार हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस समय संसार की भाषाओं की तीन अवस्थाएँ हैं। विभिन्न देशों की प्राचीन भाषाएँ जिनका अध्ययन और वर्गीकरण पर्याप्त सामग्री के अभाव में नहीं हो सका है, पहली अवस्था में है। इनका अस्तित्व इनमें उपलब्ध प्राचीन [[शिलालेख|शिलालेखो]], सिक्कों और हस्तलिखित पुस्तकों में अभी सुरक्षित है। [[मेसोपोटेमिया]] की पुरानी भाषा ‘सुमेरीय’ तथा [[इटली]] की प्राचीन भाषा ‘एत्रस्कन’ इसी तरह की भाषाएँ हैं। दूसरी अवस्था में ऐसी आधुनिक भाषाएँ हैं, जिनका सम्यक् शोध के अभाव में अध्ययन और विभाजन प्रचुर सामग्री के होते हुए भी नहीं हो सका है। बास्क, बुशमन, जापानी, कोरियाई, अंडमानी आदि भाषाएँ इसी अवस्था में हैं। तीसरी अवस्था की भाषाओं में पर्याप्त सामग्री है और उनका अध्ययन एवं वर्गीकरण हो चुका है। [[ग्रीक]], [[अरबी]], [[फारसी]], [[संस्कृत]], [[अंग्रेजी]] आदि अनेक विकसित एवं समृद्ध भाषाएँ इसके अन्तर्गत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वर्गीकरण के आधार ==&lt;br /&gt;
भाषा के वर्गीकरण के मुखयतः दो आधार हैं–आकृतिमूलक और अर्थतत्त्व सम्बन्धी। प्रथम के अन्तर्गत शब्दों की आकृति अर्थात् शब्दों और वाक्यों की रचनाशैली की समानता देखी जाती है। दूसरे में अर्थतत्त्व की समानता रहती है। इनके अनुसार भाषाओं के वर्गीकरण की दो पद्धतियाँ होती हैं–आकृतिमूलक और पारिवारिक या ऐतिहासिक। &lt;br /&gt;
ऐतिहासिक वर्गीकरण के आधारों में आकृतिमूलक समानता के अतिरिक्त निम्निलिखित समानताएँ भी होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
:१ भौगोलिक समीपता - भौगोलिक दृष्टि से प्रायः समीपस्थ भाषाओं में समानता और दूरस्थ भाषाओं में असमानता पायी जाती है। इस आधार पर संसार की भाषाएँ अफ्रीका, यूरेशिया, प्रशांतमहासागर और अमरीका के खंड़ों में विभाजित की गयी हैं। किन्तु यह आधार बहुत अधिक वैज्ञानिक नहीं है। क्योंकि दो समीपस्थ भाषाएँ एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं और दो दूरस्थ भाषाएँ परस्पर समान। भारत की हिन्दी और मलयालम दो भिन्न परिवार की भाषाएँ हैं किन्तु भारत और इंग्लैंड जैसे दूरस्थ देशों की संस्कृत और अंग्रेजी एक ही परिवार की भाषाएँ हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:२ शब्दानुरूपता- समान शब्दों का प्रचलन जिन भाषाओं में रहता है उन्हें एक कुल के अन्तर्गत रखा जाता है। यह समानता भाषा-भाषियों की समीपता पर आधारित है और दो तरह से सम्भव होती है। एक ही समाज, जाति अथवा परिवार के व्यक्तियों द्वारा शब्दों के समान रूप से व्यवहृत होते रहने से समानता आ जाती है। इसके अतिरिक्त जब भिन्न देश अथवा जाति के लोग सभ्यता और साधनों के विकसित हो जाने पर राजनीतिक अथवा व्यावसायिक हेतु से एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तो शब्दों के आदान-प्रदान द्वारा उनमें समानता आ जाती है। पारिवारिक वर्गीकरण के लिए प्रथम प्रकार की अनुरूपता ही काम की होती है। क्योंकि ऐसे शब्द भाषा के मूल शब्द होते हैं। इनमें भी नित्यप्रति के कौटुम्बिक जीवन में प्रयुक्त होनेवाले संज्ञा, सर्वनाम आदि शब्द ही अधिक उपयोगी होते हैं। इस आधार में सबसे बड़ी कठिनाई यह होती है कि अन्य भाषाओं से आये हुए शब्द भाषा के विकसित होते रहने से मूल शब्दों में ऐसे घुलमिल जाते हैं कि उनको पहचान कर अलग करना कठिन हो जाता है।&lt;br /&gt;
इस कठिनाई का समाधान एक सीमा तक अर्थगत समानता है। क्योंकि एक परिवार की भाषाओं के अनेक शब्द अर्थ की दृष्टि से समान होते हैं और ऐसे शब्द उन्हें एक परिवार से सम्बन्धित करते हैं। इसलिए अर्थपरक समानता भी एक महत्त्वपूर्ण आधार है।&lt;br /&gt;
:३ ध्वनिसाम्य- प्रत्येक भाषा का अपना ध्वनि-सिद्धान्त और उच्चारण-नियम होता है। यही कारण है कि वह अन्य भाषाओं की ध्वनियों से जल्दी प्रभावित नहीं होती है और जहाँ तक हो सकता है उन्हें ध्वनिनियम के अनुसार अपनी निकटस्थ ध्वनियों से बदल लेती है। जैसे [[फारसी]] की क, ख, फ़ आदि ध्वनियाँ हिन्दी में निकटवर्ती क, ख, फ आदि में परिवर्तित होती है। अतः ध्वनिसाम्य का आधार शब्दावली-समता से अधिक विश्वसनीय है। वैसे कभी-कभी एक भाषा के ध्वनिसमूह में दूसरी भाषा की ध्वनियाँ भी मिलकर विकसित हो जाती हैं और तुलनात्मक निष्कर्षों को भ्रामक कर देती हैं। आर्य भाषाओं में वैदिक काल से पहले मूर्धन्य ध्वनियाँ नहीं थी, किन्तु द्रविड़ भाषा के प्रभाव से आगे चलकर विकसित हो गयीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४ व्याकरणगत समानता- भाषा के वर्गीकरण का व्याकरणिक आधार सबसे अधिक प्रामाणिक होता है। क्योंकि भाषा का अनुशासन करने के कारण यह जल्दी बदलता नहीं है। व्याकरण की समानता के अन्तर्गत धातु, धातु में प्रत्यय लगाकर शब्द-निर्माण, शब्दों से पदों की रचना प्रक्रिया  तथा वाक्यों में पद-विन्यास के नियम आदि की समानता का निर्धारण आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह साम्य-वैषम्य भी  सापेक्षिक होता है। जहाँ एक ओर भारोपीय परिवार की भाषाएँ अन्य परिवार की भाषाओं से भिन्न और आपस में समान हैं वहाँ दूसरी ओर संस्कृत, फारसी, ग्रीक आदि भारोपीय भाषाएँ एक-दूसरे से इन्हीं आधारों पर भिन्न भी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वर्गीकरण की प्रक्रिया ==&lt;br /&gt;
वर्गीकरण करते समय सबसे पहले भौगोलिक समीपता के आधार पर संपूर्ण भाषाएँ यूरेशिया, प्रशांतमहासागर, अफ्रीका और अमरीका खंडों अथवा चक्रों में विभक्त होती हैं। फिर आपसी समानता रखनेवाली भाषाओं को एक कुल या परिवार में रखकर विभिन्न परिवार बनाये जाते हैं। अवेस्ता, फारसी, संस्कृत, ग्रीक आदि की तुलना से पता चला कि उनकी शब्दावली, ध्वनिसमूह और रचना-पद्धति में काफी समानता है। अतः भारत और यूरोप के इस तरह की भाषाओं का एक भारतीय कुल बना दिया गया है। परिवारों को वर्गों में विभक्त किया गया है। भारोपीय परिवार में शतम् और केन्टुम ऐसे ही वर्ग हैं। वर्गों का विभाजन शाशाओं में हुआ है। शतम् वर्ग की ‘ईरानी’ और ‘भारतीय आर्य’ प्रमुख शाखाएँ हैं। शाखाओं को उपशाखा में बाँटा गया है। ग्रियर्सन ने आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं को भीतरी और बाहरी उपशाखा में विभक्त किया है। अतः में उपशाखाएँ भाषा-समुदायों और समुदाय भाषाओं में बँटते हैं। इस तरह भाषा पारिवारिक-वर्गीकरण की इकाई है। इस समय भारोपीय परिवार की भाषाओं का अध्ययन इतना हो चुका है कि यह पूर्ण प्रक्रिया उस पर लागू हो जाती है। इन नामों में थोड़ी हेर-फेर हो सकता है, किन्तु इस प्रक्रिया की अवस्थाओं में प्रायः कोई अन्तर नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वर्गीकरण ==&lt;br /&gt;
उन्नीसवीं शती में ही विद्वानों का ध्यान संसार की भाषाओं के वर्गीकरण की ओर आकृष्ट हुआ और आज तक समय-समय पर अनेक विद्वानों ने अपने अलग-अलग वर्गीकरण प्रस्तुत किये हैं; किन्तु अभी तक कोई वैज्ञानिक और प्रामाणिक वर्गीकरण प्रस्तुत नहीं हो सका है। इस समस्या को लेकर भाषाविदों में बड़ा मतभेद है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर फेडरिख मूलर इन परिवारों की संख्या 100 तक मानते हैं वहाँ दूसरी ओर राइस विश्व की समस्त भाषाओं को केवल एक ही परिवार में रखते हैं। किन्तु अधिकांश विद्वान् इनकी संख्या बारह या तेरह मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मुख्य भाषा-परिवार ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुनिया भर में बोली जाने वाली क़रीब सात हज़ार भाषाओं को कम से कम दस परिवारों में विभाजित किया जाता है जिनमें से प्रमुख परिवारों का ज़िक्र नीचे है :&lt;br /&gt;
[[चित्र:Primary Human Language Families Map.png|center|thumb|600px|विश्व के प्रमुख भाषा-परिवार]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== [[हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार|भारत-यूरोपीय भाषा-परिवार]] (भारोपीय भाषा परिवार) ===&lt;br /&gt;
(Indo-European family)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य लेख &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह समूह भाषाओं का सबसे बड़ा परिवार है और सबसे महत्वपूर्ण भी है क्योंकि [[अंग्रेज़ी]],[[रूसी]], [[प्राचीन फारसी]], [[हिन्दी]], [[पंजाबी]], [[जर्मन]], [[नेपाली]]  - ये तमाम भाषाएँ इसी समूह से संबंध रखती हैं। इसे &amp;#039;भारोपीय भाषा-परिवार&amp;#039; भी कहते हैं। विश्व जनसंख्या के लगभग आधे लोग (४५%) भारोपीय भाषा बोलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[संस्कृत]], ग्रीक और [[लातीनी]] जैसी शास्त्रीय भाषाओं का संबंध भी इसी समूह से है। लेकिन अरबी एक बिल्कुल विभिन्न परिवार से संबंध रखती है। इस परिवार की प्राचीन भाषाएँ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;बहिर्मुखी श्लिष्ट-योगात्मक&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (end-inflecting) थीं। इसी समूह को पहले &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आर्य-परिवार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; भी कहा जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== [[चीनी-तिब्बती भाषा-परिवार]] ===&lt;br /&gt;
(The Sino - Tibetan Family)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्व में जनसंख्या के अनुसार सबसे बड़ी भाषा &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मन्दारिन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (उत्तरी [[चीनी भाषा]]) इसी परिवार से संबंध रखती है। [[चीन]] और [[तिब्बत]] में बोली जाने वाली कई भाषाओं के अलावा [[बर्मी भाषा]] भी इसी परिवार की है। इनकी स्वरलहरी एक ही है। एक ही शब्द अगर ऊँचे या नीचे स्वर में बोला जाय तो शब्द का अर्थ बदल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 इस भाषा परिवार को &amp;#039;नाग भाषा परिवार&amp;#039; नाम दिया गया  है। इसे &amp;#039;एकाक्षर परिवार&amp;#039; भी कहते हैं। कारण कि इसके मूल शब्द प्राय: एकाक्षर होते हैं। ये भाषाएँ [[कश्मीर]], [[हिमाचल प्रदेश]], [[उत्तरांचल]], [[नेपाल]], [[सिक्किम]], [[पश्चिम बंगाल]], [[भूटान]], [[अरूणाचल प्रदेश]], [[आसाम]], [[नागालैंड]], [[मेघालय]], [[मणिपुर]], [[त्रिपुरा]] और [[मिजोरम]] में बोली जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== [[सामी-हामी भाषा-परिवार]] या अफ़्रीकी-एशियाई भाषा-परिवार ===&lt;br /&gt;
(The Afro - Asiatic family or Semito-Hamitic family)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसकी प्रमुख भाषाओं में [[आरामी]], [[असेरी]], [[सुमेरी]], [[अक्कादी]] और [[कनानी]] वग़ैरह शामिल थीं लेकिन आजकल इस समूह की प्रसिद्धतम भाषाएँ [[अरबी]] और [[इब्रानी]] हैं। इन भाषाओं में मुख्यतः तीन धातु-अक्षर होते हैं और बीच में स्वर घुसाकर इनसे क्रिया और संज्ञाएँ बनायी जाती हैं (अन्तर्मुखी श्लिष्ट-योगात्मक भाषाएँ)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== [[द्रविड़ भाषा-परिवार]] ===&lt;br /&gt;
(The Dravidian Family)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषाओं का द्रविड़ी परिवार इस लिहाज़ से बड़ा दिलचस्प है कि हालाँकि ये भाषाएँ भारत के दक्षिणी प्रदेशों में बोली जाती हैं लेकिन उनका उत्तरी क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं से कोई संबंध नहीं है (संस्कृत से ऋणशब्द लेने के अलावा)।&lt;br /&gt;
	&lt;br /&gt;
इसलिए उर्दू या हिंदी का अंग्रेज़ी या जर्मन भाषा से तो कोई रिश्ता निकल सकता है लेकिन मलयालम भाषा से नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिणी भारत और श्रीलंका में द्रविड़ी समूह की कोई 26 भाषाएँ बोली जाती हैं लेकिन उनमें ज़्यादा मशहूर [[तमिल]], [[तेलुगु]], [[मलयालम]] और [[कन्नड़]] हैं। ये अन्त-अश्लिष्ट-योगात्मक भाषाएँ हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== यूराल-अतलाई कुल ===&lt;br /&gt;
प्रमुख भाषाओं के आधार पर इसके अन्य नाम – ‘तूरानी’, ‘सीदियन’, ‘फोनी-तातारिक’ और ‘तुर्क-मंगोल-मंचू’ कुल भी हैं। इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत है, किन्तु मुख्यतः साइबेरिया, मंचूरिया और मंगोलिया में हैं। प्रमुख भाषाएँ–तुर्की या तातारी, किरगिज, मंगोली और मंचू है, जिनमे सर्व प्रमुख तुर्की है। साहित्यिक भाषा उस्मानली है। तुर्की पर अरबी और फारसी का बहुत अधिक प्रभाव था किन्तु आजकल इसका शब्दसमूह बहुत कुछ अपना है। ध्वनि और शब्दावली की दृष्टि से इस कुल की यूराल और अल्ताई भाषाएँ एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। इसलिए कुछ विद्वान् इन्हें दो पृथक् कुलों में रखने के पक्ष में भी हैं, किन्तु व्याकरणिक साम्य पर निस्सन्देह वे एक ही कुल की भाषाएँ ठहरती हैं। प्रत्ययों के योग से शब्दनिर्माण का नियम, धातुओं की अपरिवर्तनीयता, धातु और प्रत्ययों की स्वरानुरूपता आदि एक कुल की भाषाओं की मुख्य विशेषताएँ हैं। स्वरानुरूपता से अभिप्राय यह है कि मक प्रत्यय यज्धातु में लगने पर यज्मक् किन्तु साधारणतया विशाल आकार और अधिक शक्ति की वस्तुओं के बोधक शब्द पुंल्लिंग तथा दुर्बल एंव लघु आकार की वस्तुओं के सूचक शब्द स्त्रीलिंग होते हैं। (लिखना) में यज् के अनुरूप रहेगा, किन्तु सेव् में लगने पर, सेवमेक (तुर्की), (प्यार करना) में सेव् के अनुरूप मेक हो जायगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारत के भाषा-परिवार ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{मुख्य|भारत के भाषाई परिवार}}&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में मुख्यतः चार भाषा परिवार है:-&lt;br /&gt;
1. भारोपीय&lt;br /&gt;
2. द्रविड़&lt;br /&gt;
3. आस्ट्रिक&lt;br /&gt;
4. चीनी-तिब्बती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में सबसे अधिक भारोपीय भाषा परिवार (लगभग 73%) की भाषा बोली जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=OHY8FaNqzboC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी] (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ राम विलास शर्मा)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20121215041840/http://books.google.co.in/books?id=PAYm47egOr4C&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false भारत के भाषा परिवार] (गूगल पुस्तक)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20011005193846/http://www.ethnologue.com/web.asp Ethnologue]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20090817105205/http://linguistlist.org/multitree/ The Multitree Project]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भाषा-परिवार| ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:ऐतिहासिक भाषाविज्ञान]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;अनिरुद्ध कुमार</name></author>
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