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	<title>भीष्म का प्राण त्याग - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;Saurabh1204: एक छवि के साथ सुधार #WPWP</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;एक छवि के साथ सुधार #WPWP&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
| image = Marcus Aurelius showing sacrifice - Arch of Marcus Aurelius - Musei Capitolini - Rome 2016.jpg&lt;br /&gt;
| चित्र = Marcus Aurelius showing sacrifice - Arch of Marcus Aurelius - Musei Capitolini - Rome 2016.jpg&lt;br /&gt;
| caption=कैपिटलिन संग्रहालय, रोम&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{tone}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने वंश के नाश से दुखी [[पाण्डव]] अपने समस्त बन्धु-बान्धवों तथा भगवान श्रीकृष्ण को साथ ले कर [[कुरुक्षेत्र]] में [[भीष्म]] पितामह के पास गये। भीष्म जी शरशैया पर पड़े हुये अपने अन्त समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। भरतवंश शिरोमणि भीष्म जी के दर्शन के लिये उस समय [[नारद]], [[धौम्य]], [[पर्वतमुनि]], [[वेदव्यास]], [[वृहदस्व]], [[भारद्वाज ऋषि|भारद्वाज]], [[वशिष्ठ]], [[त्रित]], [[इन्द्रमद]], [[परशुराम]], [[गृत्समद]], [[असित]], [[गौतम]], [[अत्रि]], [[सुदर्शन]], [[काक्षीवान्]], [[विश्वामित्र]], [[शुकदेव]], [[कश्यप]], [[अंगिरा]] आदि सभी ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा राजर्षि अपने शिष्यों के साथ उपस्थित हुये। भीष्म पितामह ने भी उन सभी ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियों का धर्म, देश व काल के अनुसार यथेष्ठ सम्मान किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारे पाण्डव विनम्र भाव से भीष्म पितामह के पास जाकर बैठे। उन्हें देख कर भीष्म के नेत्रों से प्रेमाश्रु छलक उठे। उन्होंने कहा, &amp;quot;हे धर्मावतारों! अत्यन्त दुःख का विषय है कि आप लोगों को धर्म का आश्रय लेते हुये और भगवान [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] की शरण में रहते हुये भी महान कष्ट सहने पड़े। बचपन में ही आपके पिता स्वर्गवासी हो गये, रानी [[कुन्ती]] ने बड़े कष्टों से आप लोगों को पाला। युवा होने पर [[दुर्योधन]] ने महान कष्ट दिया। परन्तु ये सारी घटनायें इन्हीं भगवान श्रीकृष्ण, जो अपने भक्तों को कष्ट में डाल कर उन्हें अपनी भक्ति देते हैं, की लीलाओं के कारण से ही हुये। जहाँ पर धर्मराज युधिष्ठिर, पवन पुत्र भीमसेन, गाण्डीवधारी अर्जुन और रक्षक के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हों फिर वहाँ विपत्तियाँ कैसे आ सकती हैं? किन्तु इन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को बड़े बड़े ब्रह्मज्ञानी भी नहीं जान सकते। विश्व की सम्पूर्ण घटनायें ईश्वाराधीन हैं! अतः शोक और वेदना को त्याग कर निरीह प्रजा का पालन करो और सदा भगवान श्रीकृष्ण की शरण में रहो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये श्रीकृष्णचन्द्र सर्वशक्तिमान साक्षात् ईश्वर हैं, अपनी माया से हम सब को मोहित करके यदुवंश में अवतीर्ण हुये हैं। इस गूढ़ तत्व को भगवान [[शिव|शंकर]], देवर्षि [[नारद]] और भगवान [[कपिल]] ही जानते हैं। तुम लोग तो इन्हें मामा का पुत्र, अपना भाई और हितू ही मानते हो। तुमने इन्हें प्रेमपाश में बाँध कर अपना दूत, मन्त्री और यहाँ तक कि सारथी बना लिया है। इनसे अपने अतिथियों के चरण भी धुलवाये हैं। हे धर्मराज! ये समदर्शी होने पर भी अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं तभी यह मेरे अन्त समय में मुझे दर्शन देने कि लिये यहाँ पधारे हैं। जो भक्तजन भक्तिभाव से इनका स्मरण, कीर्तन करते हुये शरीर त्याग करते हैं, वे सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। मेरी यही कामना है कि इन्हीं के दर्शन करते हुये मैं अपना शरीर त्याग कर दूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मराज युधिष्ठिर ने शरशैया पर पड़े हुये भीष्म जी से सम्पूर्ण ब्रह्मर्षियों तथा देवर्षियों के सम्मुख धर्म के विषय में अनेक प्रश्न पूछे। तत्वज्ञानी एवं धर्मेवेत्ता भीष्म जी ने वर्णाश्रम, राग-वैराग्य, निवृति-प्रवृति आदि के सम्बंध में अनेक रहस्यमय भेद समझाये तथा [[दानधर्म]], [[राजधर्म]], [[मोक्षधर्म]], [[स्त्रीधर्म]], [[भगवत्धर्म]], द्विविध धर्म आदि के विषय में विस्तार से चर्चा की। [[धर्म]], [[अर्थ]], [[काम]] और [[मोक्ष]] की प्राप्ति के साधनों का भी उत्तम विधि से वर्णन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी काल में [[उत्तरायण सूर्य|उत्तरायण]] सूर्य आ गये। अपनी मृत्यु का उत्तम समय जान कर भीष्म जी ने अपनी वाणी को संयम में कर के मन को सम्पूर्ण रागादि से हटा कर सच्चिदान्द भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना चतुर्भुज रूप धारण कर के दर्शन दिये। भीष्म जी ने श्रीकृष्ण की मोहिनी छवि पर अपने नेत्र एकटक लगा दिये और अपनी इन्द्रियों को रो कर भगवान की इस प्रकार स्तुति करने लगे - &amp;quot;मै अपने इस शुद्ध मन को देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में अर्पण करता हूँ। जो भगवान अकर्मा होते हुये भी अपनी लीला विलास के लिये योगमाया द्वारा इस संसार की श्रृष्टि रच कर लीला करते हैं, जिनका श्यामवर्ण है, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, जो पीताम्बरधारी हैं तथा चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म कण्ठ में कौस्तुभ मणि और वक्षस्थल पर वनमाला धारण किये हुये हैं, ऐसे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में मेरा मन समर्पित हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तरह से भीष्म पितामह ने मन, वचन एवं कर्म से भगवान के आत्मरूप का ध्यान किया और उसी में अपने आप को लीन कर दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और दुंदुभी बजाये। युधिष्ठिर ने उनके शव की अन्त्येष्टि क्रिया की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्रोत ==&lt;br /&gt;
[https://web.archive.org/web/20190809023654/http://sukhsagarse.blogspot.com/ सुखसागर] के सौजन्य से&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:श्रीमद्भागवत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्म ग्रंथ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पौराणिक कथाएँ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Saurabh1204</name></author>
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