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	<title>महावाक्य - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-24T10:18:55Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>2409:4064:2EAB:3403:0:0:708B:8F0F: Jivan ka param purusartha dharma me nihit hai.</title>
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		<updated>2021-07-20T17:55:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Jivan ka param purusartha dharma me nihit hai.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;महावाक्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; से उन उपनिषद वाक्यो का निर्देश है जो स्वरूप में लघु है, परन्तु बहुत गहन विचार समाये हुए है। प्रमुख उपनिषदों में से इन वाक्यो को महावाक्य माना जाता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[अहं ब्रह्मास्मि ]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - &amp;quot;मैं ब्रह्म हूँ&amp;quot; ( बृहदारण्यक उपनिषद १/४/१० - यजुर्वेद)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[तत्त्वमसि]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - &amp;quot;वह ब्रह्म तू है&amp;quot; ( छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७- सामवेद )&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[अयम् आत्मा ब्रह्म]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - &amp;quot;यह आत्मा ब्रह्म है&amp;quot; ( माण्डूक्य उपनिषद १/२ - अथर्ववेद )&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[प्रज्ञानं ब्रह्म]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - &amp;quot;वह प्रज्ञानं ही ब्रह्म है&amp;quot; ( ऐतरेय उपनिषद १/२ - ऋग्वेद)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[ सर्वं खल्विदं ब्रह्मम् | सर्वं खल्विदं ब्रह्म]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;- &amp;quot;यह सब ब्रह्म ही है&amp;quot; ( छान्दोग्य उपनिषद ३/१४/१- सामवेद )&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[उपनिषद्|उपनिषद]] के यह महावाक्य निराकार ब्रह्म और उसकी सर्वव्यापकता का परिचय देते है। यह महावाक्य उद्घोष करते हैं कि मनुष्य देह, इंद्रिय और मन का संघटन मात्र नहीं है, बल्कि वह सुख-दुख, जन्म-मरण से परे दिव्यस्वरूप है, आत्मस्वरूप है। आत्मभाव से मनुष्य जगत का द्रष्टा भी है और दृश्य भी। जहां-जहां ईश्वर की सृष्टि का आलोक व विस्तार है, वहीं-वहीं उसकी पहुंच है। वह परमात्मा का अंशीभूत आत्मा है। यही जीवन का परम &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पुरुषार्थ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिषद के ये महावाक्य मानव जाति के लिए महाप्राण, महोषधि एवं संजीवनी बूटी के समान हैं, जिन्हें हृदयंगम कर मनुष्य आत्मस्थ हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
[[कृष्ण यजुर्वेद|कृष्ण यजुर्वेदीय]] उपनिषद &amp;quot;शुकरहस्योपनिषद &amp;quot; में [[वेदव्यास|महर्षि व्यास]] के आग्रह पर [[शिव|भगवान शिव]] उनके पुत्र [[शुकदेव]] को चार महावाक्यों का उपदेश &amp;#039;ब्रह्म रहस्य&amp;#039; के रूप में देते हैं। वे चार महावाक्य ये हैं- &lt;br /&gt;
# ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म,&lt;br /&gt;
# ॐ अहं ब्रह्मास्मि,&lt;br /&gt;
# ॐ तत्त्वमसि, और&lt;br /&gt;
# ॐ अयमात्मा ब्रह्म &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रज्ञानं ब्रह्म===&lt;br /&gt;
इस महावाक्य का अर्थ है- &amp;#039;प्रकट ज्ञान ब्रह्म है।&amp;#039; वह ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म जानने योग्य है और ज्ञान गम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध-रूप, बुद्धि-रूप, मुक्त-रूप और अविनाशी रूप है। वही सत्य, ज्ञान और सच्चिदानन्द-स्वरूप ध्यान करने योग्य है। उस महातेजस्वी देव का ध्यान करके ही हम &amp;#039;मोक्ष&amp;#039; को प्राप्त कर सकते हैं। वह परमात्मा सभी प्राणियों में जीव-रूप में विद्यमान है। वह सर्वत्र अखण्ड विग्रह-रूप है। वह हमारे चित और अहंकार पर सदैव नियन्त्रण करने वाला है। जिसके द्वारा प्राणी देखता, सुनता, सूंघता, बोलता और स्वाद-अस्वाद का अनुभव करता है, वह प्रज्ञान है। वह सभी में समाया हुआ है। वही &amp;#039;ब्रह्म&amp;#039; है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== अहं ब्रह्माऽस्मि===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस महावाक्य का अर्थ है- &amp;#039;मैं ब्रह्म हूं।&amp;#039; यहाँ &amp;#039;अस्मि&amp;#039; शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब वह उसी का रूप हो जाता है। दोनों के मध्य का द्वैत भाव नष्ट हो जाता है। उसी समय वह &amp;#039;अहं ब्रह्मास्मि&amp;#039; कह उठता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== तत्त्वमसि===&lt;br /&gt;
इस महावाक्य का अर्थ है-&amp;#039;वह ब्रह्म तुम्हीं हो।&amp;#039; सृष्टि के जन्म से पूर्व, द्वैत के अस्तित्त्व से रहित, नाम और रूप से रहित, एक मात्र सत्य-स्वरूप, अद्वितीय &amp;#039;ब्रह्म&amp;#039; ही था। वही ब्रह्म आज भी विद्यमान है। उसी ब्रह्म को &amp;#039;तत्त्वमसि&amp;#039; कहा गया है। वह शरीर और इन्द्रियों में रहते हुए भी, उनसे परे है। आत्मा में उसका अंश मात्र है। उसी से उसका अनुभव होता है, किन्तु वह अंश परमात्मा नहीं है। वह उससे दूर है। वह सम्पूर्ण जगत में प्रतिभासित होते हुए भी उससे दूर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== अयमात्मा ब्रह्म===&lt;br /&gt;
इस महावाक्य का अर्थ है- &amp;#039;यह आत्मा ब्रह्म है।&amp;#039; उस स्वप्रकाशित परोक्ष (प्रत्यक्ष शरीर से परे) तत्त्व को &amp;#039;अयं&amp;#039; पद के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहंकार से लेकर शरीर तक को जीवित रखने वाली अप्रत्यक्ष शक्ति ही &amp;#039;आत्मा&amp;#039; है। वह आत्मा ही परब्रह्म के रूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान है। सम्पूर्ण चर-अचर जगत में तत्त्व-रूप में वह संव्याप्त है। वही ब्रह्म है। वही आत्मतत्त्व के रूप में स्वयं प्रकाशित &amp;#039;आत्मतत्त्व&amp;#039; है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में भगवान शिव शुकदेव से कहते हैं-&amp;#039;हे शुकदेव! इस सच्चिदानन्द- स्वरूप &amp;#039;ब्रह्म&amp;#039; को, जो तप और ध्यान द्वारा प्राप्त करता है, वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है।&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव के उपदेश को सुनकर मुनि शुकदेव सम्पूर्ण जगत के स्वरूप परमेश्वर में तन्मय होकर विरक्त हो गये। उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और सम्पूर्ण प्ररिग्रह का त्याग करके तपोवन की ओर चले गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/57-62-80552.html उपनिषदों की शिक्षा]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20080524175245/http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3051145.cms उपनिषदों के छह महावाक्य हैं सुखी जीवन के सूत्र] (नवभारत)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:वेद]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:महावाक्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[pl:Mantra#Mahawakja]]&lt;/div&gt;</summary>
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