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	<title>महावीर - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;Dilip awadhiya: अयोध्या इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार</title>
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		<updated>2021-08-28T10:26:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;अयोध्या इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{साँचा:जैन तीर्थंकर&lt;br /&gt;
| subheader = &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;चौबीसवें [[तीर्थंकर]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| image = Vardhaman Keezhakuyilkudi.jpg|&lt;br /&gt;
| alt = &lt;br /&gt;
| caption = पहाड़ पर उकेरी गयी तीर्थंकर महावीर की आकृति (तमिल नाडु)&lt;br /&gt;
| अन्य नाम = वीर, अतिवीर, वर्धमान, सन्मति&lt;br /&gt;
| पूर्व_तीर्थंकर = [[पार्श्वनाथ]]&lt;br /&gt;
| शिक्षाएं = अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकान्तवाद&lt;br /&gt;
| वंश = इक्ष्वाकु&lt;br /&gt;
| पिता = [[राजा सिद्धार्थ]]&lt;br /&gt;
| माता = [[त्रिशला]]&lt;br /&gt;
| एतिहासिक_काल = [[५९९|599]]-[[५२७|527]] ई॰ पू॰ डॉ&lt;br /&gt;
| च्यवन =&lt;br /&gt;
| च्यवन_स्थान =&lt;br /&gt;
| जन्म = चैत्र शुक्ल त्रयोदशी&lt;br /&gt;
| जन्म_स्थान = कुण्डग्राम, [[वैशाली]] के निकट&lt;br /&gt;
| दीक्षा = &lt;br /&gt;
| दीक्षा_स्थान = &lt;br /&gt;
| केवल_ज्ञान = &lt;br /&gt;
| केवलज्ञान_स्थान =&lt;br /&gt;
| मोक्ष = कार्तिक कृष्ण अमावस्या&lt;br /&gt;
| मोक्ष_स्थान = [[पावापुरी]], जिला [[नालंदा]], [[बिहार]]&lt;br /&gt;
| रंग = [[स्वर्ण]]&lt;br /&gt;
| चिन्ह = [[सिंह]]&lt;br /&gt;
| ऊँचाई = [[६|6]] फीट ([[७|7]] हाथ)&lt;br /&gt;
| आयु = [[७२|72]] वर्ष&lt;br /&gt;
| वृक्ष =&lt;br /&gt;
| यक्ष = मातंग&lt;br /&gt;
| यक्षिणी = सिद्धायिका&lt;br /&gt;
| प्रथम_गणधर = [[गौतम गणधर]]&lt;br /&gt;
| गणधरों_की_संख्य	 = ११&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{जैन पन्थ}}&lt;br /&gt;
भगवान &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;महावीर&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (Mahāvīra) [[जैन धर्म]] के चौंबीसवें ([[२४|24]]वें) [[तीर्थंकर]] थे। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), [[वैशाली]]  गणराज्य के कुण्डग्राम में अयोध्या इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। [[१२|12]] वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें [[केवलज्ञान]] प्राप्त हुआ जिसके पश्चात् उन्होंने [[समवशरण]] में ज्ञान प्रसारित किया। [[७२|72]] वर्ष की आयु में उन्हें [[पावापुरी]] से [[मोक्ष (जैन धर्म)|मोक्ष]] की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी बने जिसमें उस समय के प्रमुख राजा [[बिम्बिसार]], [[कुणिक]] और [[चेटक]] भी शामिल थे। जैन समाज द्वारा महावीर स्वामी के जन्मदिवस को [[महावीर-जयंती]] तथा उनके मोक्ष दिवस को [[दीपावली]] के रूप में धूम धाम से मनाया जाता है।[[File:Mahavir.jpg|350px|thumb|right||भगवान महावीर की प्रतिमा (महावीरजी, करौली, राजस्थान)]]&lt;br /&gt;
जैन ग्रन्थों के अनुसार समय समय पर धर्म तीर्थ के प्रवर्तन के लिए तीर्थंकरों का जन्म होता है, जो सभी जीवों को आत्मिक सुख प्राप्ति का उपाय बताते है। तीर्थंकरों की संख्या चौबीस ही कही गयी है। भगवान महावीर वर्तमान [[अवसर्पिणी]] काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे और [[ऋषभदेव]] पहले।{{sfn|प्रमाणसागर|२००८|प=१७}} हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया।{{sfn|Jain|Jain|2002|p=13}} उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो है– [[अहिंसा]], [[सत्य]], [[अपरिग्रह]], अचौर्य ([[अस्तेय]]) ,[[ब्रह्मचर्य]]। उन्होंने [[अनेकांतवाद|अनेकांतवाद,]] [[स्यादवाद]] और [[अपरिग्रह]] जैसे अद्भुत सिद्धान्त दिए। महावीर के सर्वोदयी तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएँ नहीं थीं। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसन्द हो। यही महावीर का &amp;#039;जियो और जीने दो&amp;#039; का सिद्धान्त है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जीवन ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== जन्म ===&lt;br /&gt;
भगवन महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के कुण्डग्राम में [[इक्ष्वाकु वंश]] के क्षत्रिय [[राजा सिद्धार्थ]] और रानी [[त्रिशला]] के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। ग्रंथों के अनुसार उनके जन्म के बाद राज्य में उन्नति होने से उनका नाम वर्धमान रखा गया था। जैन ग्रंथ उत्तरपुराण में वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति ऐसे पांच नामों का उल्लेख है।{{sfn|Pannalal Jain|2015|p=460-462}} इन सब नामों के साथ कोई कथा जुडी है।&lt;br /&gt;
जैन ग्रंथों के अनुसार, २३वें तीर्थंकर [[पार्श्वनाथ]] जी के निर्वाण ([[मोक्ष (जैन धर्म)|मोक्ष]]) प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।{{sfn|जैन|२०१५|प=२१०}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===विवाह===&lt;br /&gt;
[[दिगम्बर]] परम्परा के अनुसार महावीर बाल ब्रह्मचारी थे। भगवान महावीर शादी नहीं करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य उनका प्रिय विषय था। भोगों में उनकी रूचि नहीं थी। परन्तु इनके माता-पिता शादी करवाना चाहते थे। दिगम्बर परम्परा के अनुसार उन्होंने इसके लिए मना कर दिया था।&amp;lt;ref&amp;gt; {{citation |last=Jain |first=Shanti Lal |title=ABC of Jainism |date=1998 |publisher=Jnanodaya Vidyapeeth |location=Bhopal (M.P.) |isbn=81-7628-000-3 |p=51}}&amp;lt;/ref&amp;gt; श्वेतांबर परम्परा के अनुसार इनका विवाह यशोदा नामक सुकन्या के साथ सम्पन्न हुआ था और कालांतर में प्रियदर्शिनी नाम की कन्या उत्पन्न हुई जिसका युवा होने पर राजकुमार जमाली के साथ विवाह हुआ। {{refn|group=note|जैन विद्वान, [[चम्पत राय जैन]] के अनुसार, “दो वर्णनों में से कोई एक ही सत्य हो सकता है - या तो महावीर ने शादी की या नहीं की। अगर उन्होंने विवाह किया तो दिगम्बर इसको नकारेंगे क्यूँ? दिगम्बरों के अनुसार २४ में से १९ तीर्थंकरों ने विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे। अगर महावीर ने विवाह किया होता तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। दिगम्बरों के पास इस छोटी सी बात को नकारने का कोई कारण नहीं है। पर श्वेतांबर सम्प्रदाय के पास ऐसा कारण हो सकता है— अपनी प्राचीनता सिद्ध करने की कोशिश।&amp;lt;ref&amp;gt;{{citation |last=Jain |first=Champat Rai|authorlink=चम्पत राय जैन |title= The Change of Heart |url=https://archive.org/details/TheChangeOfHeart |date=1939 |quote=Not in Copyright|p=९७}}&amp;lt;/ref&amp;gt;}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== तपस्या ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान महावीर का साधना काल १२ वर्ष का था।{{sfn|Pannalal Jain|2015|p=466}} दीक्षा लेने के उपरान्त भगवान महावीर ने [[दिगम्बर साधु]] की कठिन चर्या को अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे। श्वेतांबर सम्प्रदाय जिसमें साधु श्वेत वस्त्र धारण करते है के अनुसार भी महावीर दीक्षा उपरान्त कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी दिगम्बर अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। इन वर्षों में उन पर कई ऊपसर्ग भी हुए जिनका उल्लेख कई प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== केवल ज्ञान और उपदेश ==&lt;br /&gt;
{{see also|जैन धर्म में भगवान}}&lt;br /&gt;
जैन ग्रन्थों के अनुसार [[केवल ज्ञान]] प्राप्ति के बाद, भगवान महावीर ने उपदेश दिया। उनके ११ गणधर (मुख्य शिष्य) थे जिनमें प्रथम [[इंद्रभूति गौतम|इंद्रभूति]] थे।{{sfn|प्रमाणसागर|२००८|p=३७१}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैन ग्रन्थ, [[उत्तरपुराण]] के अनुसार महावीर स्वामी ने समवसरण में जीव आदि [[तत्त्व (जैन धर्म)|सात तत्त्व]], [[द्रव्य (जैन दर्शन)|छह द्रव्य]], संसार और मोक्ष के कारण तथा उनके फल का नय आदि उपायों से वर्णन किया था।{{sfn|Pannalal Jain|2015|p=468-469}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पाँच व्रत===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* सत्य ― सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अहिंसा – इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और [[पंचेंद्रीय (जैन)|पाँच इंद्रीयों वाले जीव]]) है उनकी हिंसा मत कर, उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अचौर्य - दुसरे के वस्तु बिना उसके दिए हुआ ग्रहण करना जैन ग्रंथों में चोरी कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अपरिग्रह – परिग्रह पर भगवान महावीर कहते हैं जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता है, उसको दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता। यही संदेश अपरिग्रह का माध्यम से भगवान महावीर दुनिया को देना चाहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ब्रह्मचर्य- महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जो पुरुष स्त्रियों से संबंध नहीं रखते, वे मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जैन मुनि]], आर्यिका इन्हें पूर्ण रूप से पालन करते है, इसलिए उनके महाव्रत होते है और [[श्रावक]], श्राविका इनका एक देश पालन करते है, इसलिए उनके अणुव्रत कहे जाते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== दस धर्म ===&lt;br /&gt;
जैन ग्रंथों में दस धर्म का वर्णन है। [[पर्युषण]] पर्व, जिन्हें दस लक्षण भी कहते है के दौरान दस दिन इन दस धर्मों का चिंतन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[क्षमा]]&lt;br /&gt;
क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं- &amp;#039;मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव है। मेरा किसी से वैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ।&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे यह भी कहते हैं &amp;#039;मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प किया हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियाँ प्रकट की हों और शरीर से जो-जो पापवृत्तियाँ की हों, मेरी वे सभी पापवृत्तियाँ विफल हों। मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों।&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[धर्म]]&lt;br /&gt;
धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। महावीरजी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मोक्ष ==&lt;br /&gt;
[[File:Jal Mandir.The Jain Temple at Pawapur,.jpg|right|thumb|270px|पावापुरी में स्थित जल मंदिर।]]&lt;br /&gt;
तीर्थंकर महावीर का केवलीकाल ३० वर्ष का था। उनके के संघ में १४००० साधु, ३६००० साध्वी, १००००० श्रावक और ३००००० श्रविकाएँ थी।{{sfn|प्रमाणसागर|२००८|p=३७२-३७६}} भगवान महावीर ने ईसापूर्व 527, 72 वर्ष की आयु में बिहार के [[पावापुरी]] (राजगीर) में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण ([[मोक्ष (जैन धर्म)|मोक्ष]]) प्राप्त किया। उनके साथ अन्य कोई मुनि मोक्ष को प्राप्त नहीं हुए | पावापुरी में एक जल मंदिर स्थित है जिसके बारे में कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ से महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वर्तमान में ==&lt;br /&gt;
[[File:Ahinsa Sthal.jpg|350px|thumbnail|right|अहिंसा स्थल, महरौली, दिल्ली]]&lt;br /&gt;
दूसरी सदी के प्रभावशाली दिगम्बर मुनि, [[आचार्य समन्तभद्र]] ने तीर्थंकर महावीर के तीर्थ को सर्वोदय की संज्ञा दी थी।{{sfn|Jain|Upadhye|2000|p=54}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान अशांत, [[आतंकवाद|आतंकी]], [[भ्रष्टाचार (आचरण)|भ्रष्ट]] और हिंसक वातावरण में महावीर की अहिंसा ही शांति प्रदान कर सकती है। महावीर की अहिंसा केवल सीधे वध को ही हिंसा नहीं मानती है, अपितु मन में किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। वर्तमान युग में प्रचलित नारा &amp;#039;समाजवाद&amp;#039; तब तक सार्थक नहीं होगा जब तक आर्थिक विषमता रहेगी। एक ओर अथाह पैसा, दूसरी ओर अभाव। इस असमानता की खाई को केवल भगवान महावीर का &amp;#039;[[अपरिग्रह]]&amp;#039; का सिद्धांत ही भर सकता है। अपरिग्रह का सिद्धांत कम साधनों में अधिक संतुष्टिपर बल देता है। यह आवश्यकता से ज्यादा रखने की सहमति नहीं देता है। इसलिए सबको मिलेगा और भरपूर मिलेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब अचौर्य की भावना का प्रचार-प्रसार और पालन होगा तो चोरी, लूटमार का भय ही नहीं होगा। सारे जगत में मानसिक और आर्थिक शांति स्थापित होगी। चरित्र और संस्कार के अभाव में सरल, सादगीपूर्ण एवं गरिमामय जीवन जीना दूभर होगा। भगवान महावीर ने हमें अमृत कलश ही नहीं, उसके रसपान का मार्ग भी बताया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतने वर्षों के बाद भी भगवान महावीर का नाम स्मरण उसी श्रद्धा और भक्ति से लिया जाता है, इसका मूल कारण यह है कि महावीर ने इस जगत को न केवल मुक्ति का संदेश दिया, अपितु मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी बताई। भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु [[अहिंसा|अहिंसा धर्म]] का उपदेश दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साहित्य ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== काव्यात्मक ===&lt;br /&gt;
* [[आचार्य समन्तभद्र]] विरचित “स्वयंभूस्तोत्र” चौबीस तीर्थंकर भगवानों की स्तुति है। इसके आठ श्लोक भगवान महावीर को समर्पित है। {{sfn|Vijay K. Jain|2015|p=164–169}}&lt;br /&gt;
* आचार्य समन्तभद्र विरचित &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;युक्तानुशासन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक काव्य रचना है जिसके ६४ श्लोकों में तीर्थंकर महावीर की स्तुति की गयी है।{{sfn|Gokulchandra Jain|2015|p=84}}&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;वर्धमान स्तोत्र&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;- ६४ श्लोक में महावीर स्वामी की स्तुती की गयी है। इसकी रचना [[मुनि प्रणम्यसागर]] ने की है&amp;lt;ref&amp;gt;{{साँचा:Cite book|last = प्रणम्यसागर|first = मुनि|date = २०१८|title =वर्धमान स्तोत्रम्|publisher = आचार्य अकलंकदेव जैनविद्या शोधालय समिति|pp=iii-xx|isbn = 978-81-939298-1-0}}&amp;lt;/ref&amp;gt;। मुनि प्रणम्यसागर ने वीरष्टकम भी लिखा है।&lt;br /&gt;
* महाकवि पदम कृत महावीर रास - इसका रचना काल वि•स• की 18वीं सदी का [[मध्यकालीन भारत|मध्यकाल]] है। इसका प्रथम बार [[हिन्दी|हिंदी]] अनुवाद और संपादन डॉ. विद्यावती जैन जी द्वारा किया गया था। यह 1994 में प्राच्य श्रमण भारती द्वारा प्रकाशित किया गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुरातत्व ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
File:Mahavira Pratimaji.jpg|350px|पद्मासन मुद्रा में भगवन महावीर की विशालतम ज्ञात प्रतिमा जी, पटनागंज (म•प•)&lt;br /&gt;
File:Thirakoil-mahaaveerar.JPG|350px|तमिल नाडु, थिराकोइल &lt;br /&gt;
File:7th - 12th century Mahavira flanked by 24 Tirthankaras in Cave 4, Badami Jain cave temple Karnataka.jpg|350px|भगवान महावीर और अन्य २३ तीर्थंकर (बादामी गुफा, कर्नाटक)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान महावीर की कई प्राचीन प्रतिमाओं के देश और विदेश के संग्रहालयों में दर्शन होते है। महाराष्ट्र के एल्लोरा गुफाओं में भगवान महावीर की प्रतिमा मौजूद है। कर्नाटक की बादामी गुफाओं में भी भगवान महावीर की प्रतिमा स्थित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[केवली]]&lt;br /&gt;
* [[जय जिनेन्द्र]]&lt;br /&gt;
* [[जैन धर्म में भगवान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नोट ==&lt;br /&gt;
{{Reflist|group=note}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची|2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ग्रन्थ ==&lt;br /&gt;
* {{सन्दर्भ विकिडाटा|Q41794338}}&lt;br /&gt;
* {{citation|last=प्रमाणसागर|first=मुनि|title=जैन तत्त्वविद्या|year=२००८|publisher=भारतीय ज्ञानपीठ|url=https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&amp;amp;dq=Jain+Tattvavidya&amp;amp;source=gbs_navlinks_s|isbn=978-81-263-1480-5|access-date=10 जनवरी 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20150925201536/https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&amp;amp;dq=Jain+Tattvavidya&amp;amp;source=gbs_navlinks_s|archive-date=25 सितंबर 2015|url-status=live}}&lt;br /&gt;
* {{citation|title= उत्तरपुराण|first=आचार्य|last=गुणभद्र| last2= जैन |first2= साहित्याचार्य डॉ पन्नालाल|date=2015 |publisher= [[भारतीय ज्ञानपीठ]] |author-link= पन्नालाल जैन |isbn=978-81-263-1738-7 |ref={{sfnref|Pannalal Jain|2015}}}}&lt;br /&gt;
*{{citation|last1=जैन|first1=विजय.क.|title=समन्तभद्र स्वामी विरचित स्वयम्भूस्तोत्र|year=२०१५|publisher=Vikalp Printers|isbn=9788190363976|url=https://books.google.co.in/books?id=xI8HBgAAQBAJ|quote=Non-Copyright|access-date=22 मार्च 2016|archive-url=https://web.archive.org/web/20150916101903/https://books.google.co.in/books?id=xI8HBgAAQBAJ|archive-date=16 सितंबर 2015|url-status=live}}&lt;br /&gt;
*{{citation |last=Jain |first=Hiralal |authorlink= |last2=Upadhye |first2=Adinath Neminath |authorlink2= |title=Mahavira, his times and his philosophy of life |url=https://books.google.com/books?id=GHfzERhGUjQC |date=2000 |origyear=1974 |publisher=[[भारतीय ज्ञानपीठ]] |access-date=19 जुलाई 2016 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160512211950/https://books.google.com/books?id=GHfzERhGUjQC |archive-date=12 मई 2016 |url-status=live }}&lt;br /&gt;
* {{citation |title=Jaina Tradition in Indian Thought |url=https://books.google.com/books?id=uIHXAAAAMAAJ |last=Jain |first=Hiralal |date=1 January 2002 |isbn=9788185616841 }}&lt;br /&gt;
* {{citation |last=Jain |first=Dr. Gokulchandra|title=Samantabhadrabhāratī |date=2015 |publisher=आचार्य शांति सागर छाणी स्मृति ग्रंथमाला Smriti |location=बुढ़ाना, मुज़फ्फरनगर |isbn=978-81-90468879 |edition=1st |ref={{sfnref|Gokulchandra Jain|2015}} }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[[जैन धर्म]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{जैन विषय}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>imported&gt;Dilip awadhiya</name></author>
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