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	<title>मोक्ष - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;Ts12rAc: 171.76.250.223 (वार्ता) के 1 संपादन वापस करके 2409:4043:2317:1997:6CC5:4D43:C9CA:B0AAके अंतिम अवतरण को स्थापित किया (ट्विंकल)</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/171.76.250.223&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/171.76.250.223&quot;&gt;171.76.250.223&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:171.76.250.223&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:171.76.250.223 (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;वार्ता&lt;/a&gt;) के 1 संपादन वापस करके 2409:4043:2317:1997:6CC5:4D43:C9CA:B0AAके अंतिम अवतरण को स्थापित किया (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=WP:TW&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;WP:TW (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;ट्विंकल&lt;/a&gt;)&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मोक्ष&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक दार्शनिक शब्द है जो [[हिन्दू]], [[बौद्ध]], [[जैन]] तथा [[सिख]] धर्मों में प्रमुखता से आता है। [[धर्मशास्त्र|शास्त्रों]] और [[पुराण|पुराणों]] के अनुसार जीव का [[जन्म]] और [[मरण]] के बन्धन से छूट जाना ही &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मोक्ष&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; है। इसे &amp;#039;विमोक्ष&amp;#039;, &amp;#039;विमुक्ति&amp;#039; और &amp;#039;मुक्ति&amp;#039; भी कहा जाता है। [[भारतीय दर्शन|भारतीय दर्शनों]] में कहा गया है कि जीव [[अज्ञान]] के कारण ही बार बार [[जन्म]] लेता और [[मृत्यु|मरता]] है । इस जन्ममरण के बंधन से छूट जाने का ही नाम मोक्ष है । जब मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है, तब फिर उसे इस [[संसार]] में आकर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती । मोक्ष के बारे में बताने वाले मुख्य हिन्दू दर्शन, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन, भारतीय दर्शन है।&lt;br /&gt;
[[File:Siddha Shila.svg|thumb|मोक्ष में मुक्त आत्माओं का चित्रण]]&lt;br /&gt;
शास्त्रकारों ने जीवन के [[पुरुषार्थ|चार उद्देश्य]]तलाए हैं—[[धर्म]], [[अर्थ]], [[काम]] और [[मोक्ष]] । इनमें से मोक्ष परम अभीष्ट अथवा &amp;#039;परम पुरूषार्थ&amp;#039; कहा गया है । मोक्ष की प्राप्ति का उपाय [[आत्मा|आत्मतत्व]] या [[ब्रह्म]]तत्व का साक्षात् करना बतलाया गया है । [[न्याय दर्शन|न्यायदर्शन]] के अनुसार दुःख का आत्यंतिक नाश ही मुक्ति या मोक्ष है । [[सांख्य दर्शन|सांख्य]] के मत से तीनों प्रकार के तापों का समूल नाश ही मुक्ति या मोक्ष है । [[वेदान्त दर्शन|वेदान्त]] में पूर्ण आत्मज्ञान द्वारा [[माया]]सम्बन्ध से रहित होकर अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना मोक्ष है । तात्पर्य यह है कि सब प्रकार के सुख दुःख और मोह आदि का छूट जाना ही मोक्ष है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोक्ष की कल्पना [[स्वर्ग लोक|स्वर्ग-]][[नरक]] आदि की कल्पना से पीछे की है और उसकी अपेक्षा विशेष संस्कृत तथा परिमार्जित है । [[स्वर्ग लोक]] की कल्पना में यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने किए हुए पुण्य वा शुभ कर्म का फल भोगने के उपरान्त फिर इस संसार में आकर जन्म ले; इससे उसे फिर अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पड़ेंगे । पर मोक्ष की कल्पना में यह बात नहीं है । मोक्ष मिल जाने पर [[जीव (हिन्दू धर्म)|जीव]] सदा के लिये सब प्रकार के बन्धनों और कष्टों आदि से छूट जाता है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारतीय दर्शन]] में नश्वरता को दुःख का कारण माना गया है। संसार आवागमन, जन्म-मरण और नश्वरता का केंद्र हैं। इस [[अविद्या]]कृत प्रपंच से मुक्ति पाना ही &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मोक्ष&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; है। प्राय: सभी दार्शनिक प्रणालियों ने संसार के दुःखमय स्वभाव को स्वीकार किया है और इससे मुक्त होने के लिये कर्ममार्ग या ज्ञानमार्ग का रास्ता अपनाया है। मोक्ष इस तरह के जीवन की अंतिम परिणति है। इसे पारपार्थिक मूल्य मानकर जीवन के परम उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया है। मोक्ष को वस्तुसत्य के रूप में स्वीकार करना कठिन है। फलतः सभी प्रणालियों में मोक्ष की कल्पना प्रायः आत्मवादी है। अन्ततोगत्वा यह एक वैयक्तिक अनुभूति ही सिद्ध हो पाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि विभिन्न प्रणालियों ने अपनी-अपनी [[ज्ञानमीमांसा]] के अनुसार मोक्ष की अलग अलग कल्पना की है, तथापि अज्ञान, दुःख से मुक्त हो सकता है। इसे जीवनमुक्ति कहेंगे। किंतु कुछ प्रणालियाँ, जिनमें न्याय, [[वैशेषिक दर्शन|वैशेषिक]] एवं [[विशिष्टाद्वैत]] उल्लेखनीय हैं; जीवनमुक्ति की संभावना को अस्वीकार करते हैं। दूसरे रूप को &amp;quot;विदेहमुक्ति&amp;quot; कहते हैं। जिसके सुख-दु:ख के भावों का विनाश हो गया हो, वह देह त्यागने के बाद आवागमन के चक्र से सर्वदा के लिये मुक्त हो जाता है। उसे निग्रहवादी मार्ग का अनुसरण करना पड़ता है। [[उपनिषद्|उपनिषदों]] में आनन्द की स्थिति को ही मोक्ष की स्थिति कहा गया है, क्योंकि आनन्द में सारे द्वंद्वों का विलय हो जाता है। यह अद्वैतानुभूति की स्थिति है। इसी जीवन में इसे अनुभव किया जा सकता है। [[वेदान्त दर्शन|वेदांत]] में मुमुक्षु को श्रवण, मनन एवं निधिध्यासन, ये तीन प्रकार की मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। इस प्रक्रिया में नानात्व, का, जो अविद्याकृत है, विनाश होता है और आत्मा, जो ब्रह्मस्वरूप है, उसका साक्षात्कार होता है। मुमुक्षु &amp;quot;तत्वमसि&amp;quot; से &amp;quot;अहंब्रह्यास्मि&amp;quot; की ओर बढ़ता है। यहाँ आत्मसाक्षात्कार को हो मोक्ष माना गया है। वेदान्त में यह स्थिति जीवनमुक्ति की स्थिति है। मृत्यूपरांत वह ब्रह्म में विलीन हो जाता है। ईश्वरवाद में ईश्वर का सान्निध्य ही मोक्ष है। अन्य दूसरे वादों में संसार से मुक्ति ही मोक्ष है। [[चार्वाक दर्शन|लोकायत]] में मोक्ष को अस्वीकार किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== हिन्दू दर्शन ==&lt;br /&gt;
[[हिन्दू धर्म]] में मोक्ष का बहुत महत्त्व है। यह मनुष्य जीवन चार उद्देश्यों में बांटा गया है- [[धर्म]], [[अर्थ]], [[काम]] और [[मोक्ष]]। ये [[पुरुषार्थ|पुरुषार्थ चतुष्टय]] कहलाते हैं। इनका वर्णन [[वेद|वेदों]] व अन्य हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में पाया जाता है। ये चारों आपस में गहरा संबन्ध रखते हैं। धर्म का अर्थ है वे सभी कार्य जो आत्मा व समाज की उन्नति करने वाले हों। अर्थ से तात्पर्य है किसी अच्छे कलात्मक कार्य द्वारा धनार्जन करना। काम का अर्थ है जीवन को सात्विक व सुःख सुविधासंपन्न बनाना। मोक्ष का अर्थ है आत्मा द्वारा अपना और परमात्मा का दर्शन करना। आत्मा को मोक्ष भगवान की कृपा से प्राप्त होता है। भगवान की कृपा उन्ही आत्माओं पर होती है जिन्होंने शरीर में रहते हुए अच्छे कर्म किए हों। मोक्ष प्राप्ति के लिए मनुष्य को अष्टांग योग भी अपनाना चाहिए। [[अष्टांग योग]] का वर्णन महर्षि [[पतञ्जलि|पतंजलि]] ने अपने ग्रंथ [[पतञ्जलि योगसूत्र|योगसूत्र]] में किया है। [[श्रीमद्भगवद्गीता|गीता]] में भी योग के बारे में वर्णन है। महर्षि [[दयानन्द सरस्वती]] ने अपने ग्रंथ [[ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका]] में भी अष्टांग योग के बारे में वर्णन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बौद्ध दर्शन ==&lt;br /&gt;
बौद्ध दर्शन में निर्वाण की कल्पना मोक्ष के समानांतर ही की गई है। &amp;quot;निर्वाण&amp;quot; शब्द का अर्थ है, बुझ जाना। निर्वाण शब्द की इस व्युत्पत्ति के मूल अर्थ को लेकर आलोचकों ने निर्वाण के सिद्धान्त को निरर्थक बना bया है। उनका मानना है कि निर्वाण का अर्थ है सभी मानवीय भावनाओं का बुझ जाना, जो मृत्यु के सामान है। इस प्रकार के अर्थ द्वारा निर्वाण के सिद्धांत का उपहास बनाने की कोशिश की है। दूसरी बात है कि आलोचक &amp;#039;निर्वाण&amp;#039; और &amp;#039;परिनिर्वाण&amp;#039; में भेद करना भी भूल गए हैं। &amp;quot;जब शरीर के महाभूत बिखर जाते हैं, सभी संज्ञाएँ रुक जाती हैं, सभी वेदनाओं का नाश हो जाता है, सभी प्रकार की प्रतिक्रया बन्द हो जाती है और चेतना जाती रहती है, परिनिर्वाण कहलाता है। निर्वाण का कभी भी यह अर्थ नहीं हो सकता। निर्वाण का अर्थ है अपनी भावनाओं पर पर्याप्त संयम रखना, जिससे आदमी धर्म के मार्ग पर चलने के योग्य बन सके। तथागत बुद्ध ने यह स्पष्ट किया था की सदाचरणपूर्ण जीवन का ही दूसरा नाम निर्वाण है। निर्वाण का अर्थ है वासनाओं से मुक्ति। निर्वाण प्राप्ति से सदाचरणपूर्ण जीवन जिया जाता है। जीवन का लक्ष्य निर्वाण ही है। निर्वाण ही ध्येय है। निर्वाण माध्यम मार्ग है। निर्वाण आष्टागिक-मार्ग के अतिरिक्त कुछ नहीं है। बौद्ध दर्शन में भी बंधन का कारण तृष्णा, वितृष्णा तथा अविद्या को माना गया है। जब आदमी इन बंधनों से मुक्त हो जाता है तो वह निर्वाण प्राप्त करना जन जाता है और उसके लिए निर्वाण-पथ खुल जाता है। इसके लिये अष्टांगिक मार्ग की व्यवस्था की गई है। वे इस प्रकार हैं: सम्यग् दृष्टि, सम्यग् संकल्प, सम्यग् वचन, सम्यग् कर्म, सम्यग् जीविका, सम्यग् प्रयत्न, सम्यग् स्मृति और सम्यग् समाधि। इनमें से प्रथम दो ज्ञान, मध्य के तीन शील एवं अंतिम तीन समाधि के अंतर्गत आते हैं। इस मार्ग का अनुसरण करने पर तृष्णा का निरोध होता है, तृष्णा के निरोध से संग्रह प्रवृति का निरोध होता है। इस प्रकार की मुक्ति जीवन में भी संभव है, किंतु मृत्यूपरांत निर्वाण का क्या स्वरूप होगा, इसे निषेधात्मक रूप से बतलाया गया है। एक प्रकार से वह शल्नय के समान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जैन दर्शन ==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मोक्ष (जैन धर्म)}}&lt;br /&gt;
जैन दर्शन में जीव और अजीव का सबंध कर्म के माध्यम से स्थापित होता है। कर्म के माध्यम से जीव को अजीव या जड़ से बँध जाना ही बंधन है। इस प्रक्रिया का आस्राव शब्द से व्यक्त करते हैं। आस्राव का निरोध होने पर ही जीव अजीव से मुक्त हो सकता है। इसके लिये त्रिविध संयम की व्यवस्था की गई है। सम्यग् दर्शन (सही श्रद्धा), सम्यग् ज्ञान और सम्यग् चरित्र का पालन करते हुए मोक्ष की प्राप्ति होती है। इन &amp;quot;[[रत्नत्रय]]&amp;quot; के पालन से &amp;quot;आश्रव&amp;quot; निरूद्ध होता है। मुक्त होने के क्रम में दो स्थितियाँ आती हैं। पहले नवीन कर्मों का प्रवाह निरुद्ध होता है, इसे &amp;quot;संवर&amp;quot; कहते हैं। दूसरी अवस्था में पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का भी विनाश हो जाता है। इसे &amp;quot;निर्जरा&amp;quot; कहते हैं। इसके बाद की ही स्थिति मोक्ष कहलाती है। यह जीवनमुक्ति की स्थिति है, यह स्पष्ट रूप से पारमार्थिक स्वरूप माना गया है। विदेहमुक्ति की अवस्था में &amp;quot;[[केवल ज्ञान]]&amp;quot; की उपलब्धि हो जाती है। ऐसी स्थिती में आत्मा सर्वांगीण संपूर्ण होती है। अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत शांति एवं अनंत ऐश्वर्य उसे सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== न्याय एवं वैशोषिक दर्शन ==&lt;br /&gt;
न्याय वैशोषिक मोक्ष की कल्पना भिन्न प्रकार से करते हैं। वे मोक्ष की स्थिति को आनंदमय नहीं मानते। क्योंकि दु:ख और सुख दोनों आत्मा के विशेष गुण हैं, इसलिये दोनों सत्य हैं। न्याय वैशेषिक अभाव को भी एक पदार्थ मानते हैं। इसीलिये दोनों सत्य हैं। न्याय वैशेषिक अभाव को भी एक पदार्थ मानते हैं। इसीलये दु:ख के अभाव का अर्थ आनंद का होना, नहीं है। मुक्ति का अर्थ है &amp;quot;अपवर्ग&amp;quot;, दु:ख सुख दोनों से परे होना। ये दोनों आत्मा के मूलभूत गुण नहीं हैं। इसलिये मोक्ष की स्थिति में आत्मा दोनों से मुक्त हो जाती है। दु:ख से मुक्ति पाने के पहले हमें सुख की आशा ही छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि दु:ख अंत तक हमारा पीछा नहीं छोड़ता, लेकिन हम उसका अतिक्रमण कर सकते हैं। यह अवस्था सुख दु:ख के परे होने से प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति देहत्याग के पश्चात् विदेहमुक्ति को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में आत्मा अपने विशेष गुणों से परे हो जाता है। एक तरह से वह संवेदनहीन और इच्छाशून्य हो जाता है उसमें पुन: चैतन्य प्रविष्ट होगा ही नहीं। जीवनमुक्ति इस संप्रदाय में अस्वीकार की गई है। फिर वह अच्छे कर्मो का संपादन करते हुए, &amp;quot;दिव्य विभूति&amp;quot; पद को प्राप्त कर सकता है। किंतु आत्मा के विशेष गुण बने रहेंगें। इसमें भी योग, ध्यान और क्रमिक अभ्यास के कठोर संयमों का पालन करना पड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सांख्य दर्शन ==&lt;br /&gt;
सांख्य योग में &amp;quot;कैवल्य&amp;quot; को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। यह मोक्ष के समान ही है। यह जिससे मुक्त होता है, उवसे प्रकृति और जो मुक्त होता है, उसे पुरूष स्वरूप से ही असंग है। कैवल्य उसका स्वभाव है। प्रकृति के संसर्ग में आने पर वह अपने स्वरूप को भूल जाता है। वह अहमबूद्धि के आ जाने पर संसार को सत्य मान लेता है। संसार के प्रति अनासक्ति भाव उत्पन्न करने के लिये मुुमुक्ष को कठोर तप, नियम एवं संयम का पालन करना पड़ता है। इस कठोर साधना के आठ अंग हैं, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इस साधना के माध्यम से व अहंभाव से मुक्त होता है। यहाँ मुक्त होने का अर्थ किसी अन्य सत्ता, ईश्वर या ब्रह्म से संयोग नहीं है, बल्कि मोक्ष यहाँ वियोग की स्थिति है। प्रवृति से मुक्त होकर, परमशांति का मनन करता हुआ पुरूष अपनी असफलता को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में साधक जीवन मुक्त हो जाता है। प्रकृति से अपनी भिन्नता को समझते हुए वह रोग द्वेष इत्यादि से प्रभावित नहीं होगा। देह त्यागने के बाद वह विदेह मुक्त हो जाएगा। सांध्य ईश्वर में विश्वास नहीं करता, लेकिन योग ईश्वर प्रणिधान या भक्ति को भी मोक्ष का साधन मानता है। किंतु यह श्रद्धालु अथवा अज्ञानियों के लिये स्वीकृत किया गया है, जो कठोर योगागों का अभ्यास करने में अक्षम हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पूर्वमीमांसा ==&lt;br /&gt;
पूर्वमीमांसा में कर्म को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। इसलये जीवन में दु:ख से मुक्ति और सुख की प्राप्ति की इच्छा करनेवाला धार्मिक कर्म करे। ये धार्मिक कर्म, यज्ञ, दान, इत्यादि करने से स्वर्गादि की प्राप्ति हाती है। एक तरह से मोक्ष कर इससे कोई संबंध नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अद्वैत वेदान्त ==&lt;br /&gt;
[[अद्वैत वेदांत]] में मोक्ष की कल्पना [[उपनिषद|उपनिषदों]] के आधार पर की गई है। वेदान्त में [[कर्म]] अथवा [[भक्ति ]]की प्रधानता न देकर [[ज्ञान]] को प्रधानता दी गई है। यद्यपि मुमुक्षु को कुछ निश्चित अनुशासनों का पालन करना पड़ता है। इसके अनन्तर अद्वैतवादी शिक्षा पर ध्यान एकाग्र किया जाता है। आत्मा को ब्रह्मस्वरूप माना गया है। &amp;quot;[[अहं ब्रह्मास्मि]]&amp;quot; का ज्ञान होना होता है, यही मोक्ष है। तब आत्मा सत् , चित् , आनन्द से पूर्ण हो जाता है। [[शंकराचार्य|आचार्य शंकर]] इस सिद्धान्त के प्रधान व्याख्याता हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[विवेकचूडामणि]] में कहा गया है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;   जातिनीतिकुल-गोत्र-दूरगं &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;   नामरूपगुणदोषवर्जितम् ।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;    नाम रूप गुण दोष वर्जितम् ।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;    देशकालविषयातिवर्ति यद्ब्रह्म&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;    तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥२५४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: (&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अर्थ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; : जाति, नीति, कुल, गोत्र से परे ; नाम, रूप, गुण दोष से रहित, जो देशकाल और विषयों से परे है और जिसमें &amp;#039;यद्ब्रह्म तत्त्वमसि&amp;#039; (जो ब्रह्म है, वही तुम हो) का भाव अपने अन्दर लाओ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== विशिष्टाद्वैत ==&lt;br /&gt;
[[विशिष्टाद्वैत]] में [[ज्ञान]] की अपेक्षा [[भक्ति]] को प्रधान माना गया है। भक्ति के माध्यम से नारायण का सान्निध्य प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारायण के संरक्षण में ही पूर्णमुक्ति और आनंद की प्राप्ति होती है। यह सान्निध्य दो साधनों से प्राप्त किया जा सकता है। क्रमश: इसे भक्ति और प्रपत्ति कहते हैं। प्रपत्ति का अर्थ है ईश्वर की कृपा पर पुर्ण विश्वास करके आत्मसमर्पण करना। इससे सहज ही मोक्ष लाभ होता है। [[रामानुज]] ने भक्ति के अंतर्गत कर्मयोग एवं ज्ञानयोग को भी गौण महत्व दिया है। भक्तियोग में ईश्वर का निरंतर चिंतन अनिवार्य बतलाया गया है। इस चिंतन का रूप प्रेममय भी हो सकता है। किंतु इसके माध्यम से मुमुक्षु ईश्वर की ओर उन्मुख होता है, उसे ईश्वर की प्रत्याक्षानुभूति नहीं होती। इसीलिये रामानुज जीवनमुक्ति को नहीं मानते। वह तो विदेहमुक्ति के बाद नारायण के लोक में ही सँभव है। प्रपति और भक्ति के माध्यम से ही ईश्वरकृपा के फलस्वरूप मुक्ति संभव है। [[मध्वाचार्य]] भी मोक्ष के लिये भक्ति को साधन मानते हैं। इसी भक्ति के कारण जीव को ईश्वर का प्रसाद प्राप्त होता है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[मोक्ष (जैन धर्म)]]&lt;br /&gt;
* [[कैवल्य]]&lt;br /&gt;
* [[स्वर्ग]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Ts12rAc</name></author>
	</entry>
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