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	<title>रमण प्रभाव - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;चक्रबोट: ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार</title>
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		<updated>2021-05-06T03:30:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[File:Raman energy levels.svg|thumb|रमण प्रभाव]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रमण प्रकीर्णन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; या &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रमण प्रभाव&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; [[फोटॉन|फोटोन]] कणों के लचीले वितरण के बारे में है। इसकी खोज प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक श्री [[चन्द्रशेखर वेंकटरमन|सी वी रमन]] ने की थी।&lt;br /&gt;
रमन प्रभाव के अनुसार, जब कोई एकवर्णी प्रकाश [[द्रव|द्रवों]] और [[ठोस|ठोसों]] से होकर गुजरता है तो उसमें आपतित [[प्रकाश]] के साथ अत्यल्प तीव्रता का कुछ अन्य वर्णों का प्रकाश देखने में आता है। 1930 में भौतिकी का [[नोबेल पुरस्कार]] चन्द्रशेखर वेंकटरमन को उनके इस खोज के लिए प्रदान किया गया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमन की पूरी शिक्षा-दीक्षा भारत में ही हुई। स्वयं २०० रु. का स्पेक्ट्रममापी अभिकल्पित कर, केवल लगन, परिश्रम और एकनिष्ठ अनुसंधन के बल पर इतनी महत्वपूर्ण खोज कर सके। शुरू में रमन ने सूर्य के प्रकाश को बैंगनी फिल्टर से गुजार कर प्राप्त बैंगनी प्रकाश किरण पुन्ज को द्रव से गुजारा। निर्गत प्रकाश पुंज मुख्यतः तो बैंगनी रंग का ही था, परन्तु इसे हरे फिल्टर से गुजारने पर इसमें बहुत कम परिमाण में हरी किरणों का अस्तित्व भी देखने में आया।  रमन प्रभाव रासायनिक यौगिकों की आंतरिक संरचना समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह प्रभाव वैज्ञानिकों के लिए काफी महत्वपूर्ण खोज है। [[राष्ट्रीय विज्ञान दिवस]] के दिन [[भारत]] के विभिन्न क्षेत्रों में [[विज्ञान]] के गतिविधियों कों बढ़ावा देने वाले कार्यकमो का आयोजन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
60 से ज्यादा विभिन्न द्रवों पर प्रयोग दोहराने के बाद यह सुनिश्चित हो गया कि सभी द्रव रमन स्पेक्ट्रम दर्शाते हैं। द्रव बदलने से केवल उससे प्रकीर्णित स्पेक्ट्रमी रेखा का रंग बदलता है। अभी तक के प्रयोगों में सिर्फ देखकर प्रभाव की पुष्टि की जा रही थी। किन्तु रमन जानते थे कि जब तक रमन-रेखाओं की तरंगदैर्ध्यों और उनकी आपेक्षिक तीव्रता का मापन नहीं किया जाएगा तब तक न तो प्रभाव की संतोषजनक व्याख्या की जा सकेगी और न ही वैज्ञानिक जगत में मान्यता प्राप्त होगी। इसके लिए उन्होंने एक [[क्वार्टज स्पेक्ट्रोग्राफ]] का उपयोग किया, जिसके परिमाणात्मक परिणाम मार्च 31, 1928 के [[इन्डियन जर्नल ऑफ फिजिक्स]] में प्रकाशित हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक अद्भुत प्रभाव है, इसकी खोज के एक दशक बाद ही 2000 [[रासायनिक यौगिक|रासायनिक यौगिकों]] की आंतरिक संरचना निश्चित की गई थी। इसके पश्चात् ही [[क्रिस्टल]] की आंतरिक रचना का भी पता लगाया गया। रमन प्रभाव के अनुसार प्रकाश की प्रकृति और स्वभाव में तब परिवर्तन होता है जब वह किसी पारदर्शी माध्यम से निकलता है। यह माध्यम ठोस, द्रव और गैसीय, कुछ भी हो सकता है। यह घटना तब घटती है, जब माध्यम के अणु प्रकाश ऊर्जा के कणों को [[प्रकीर्णन|प्रकीर्णित]] कर देते हैं। यह उसी तरह होता है जैसे कैरम बोर्ड पर स्ट्राइकर गोटियों को छितरा देता है। फोटोन की ऊर्जा या प्रकाश की प्रकृति में होने वाले अतिसूक्ष्म परिवर्तनों से माध्यम की आंतरिक अणु संरचना का पता लगाया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
रमन एक अत्यन्त उत्साही, परिश्रमी, और मेधवी व्यक्ति थे। 19 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रथम श्रेणी में प्रथम रहते हुए भौतिकी में एम.ए. किया और वित्त सेवाओं की प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर कलकत्ता में उपमहालेख अधिकरी बन गए। कुछ कर गुजरने की चाह और विज्ञान के प्रति रूचि ने उन्हें महेन्द्र लाल सरकार द्वारा स्थापित विज्ञान अनुसंधन संस्था इन्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंसेज से जोड़ दिया। वे दिन भर अपने दायित्व का निर्वाह करने में व्यस्त रहते और शाम से देर रात तक प्रयोगशाला में। उनका प्रारंभिक कार्य वाद्य यंत्रों की कार्यप्रणाली से जुड़े विज्ञान के अन्वेषण से संबद्ध रहा। रमन का विज्ञान के प्रति समर्पण इतना तीव्र था कि 1917 में जब उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के पालित प्रोफेसर बनाए जाने का प्रस्ताव मिला तो अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर लगभग आधी तन्खाह पर उन्होंने इस पद को स्वीकार कर लिया। रमन की संपूर्ण शिक्षा भारत में ही हुई थी और अभी तक दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों के साथ उनका संपर्क पुस्तकों और अंतरराष्ट्रीय शोधपत्रिकाओं में छपे लेखों के माध्यम से ही था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1921 में पहली बार एक अध्ययन यात्रा पर उन्हें विदेश जाने का अवसर मिला। पानी के जहाज से यात्रा करते समय सागर के नीले-नीले जल ने उनका ध्यान आकर्षित किया। [[लार्ड रैले]] ने आकाश के नीले रंग की सफल व्याख्या वायुकणों से प्रकाश-विकीर्णन के आधार पर की थी किन्तु सागर जल का नीला रंग उन्होंने आकाश का जल में प्रतिबिम्व मान लिया था। रमन को यह व्याख्या स्वीकार्य नहीं थी। उनको लगता था कि जो सिद्धांत वायु के नीले रंग के लिए उत्तरदायी था वही जल के नीले रंग के लिए भी होना चाहिए, इसलिए, अपनी वापसी यात्रा में उन्होंने एक जेबी स्पेक्ट्रममापी अपने साथ रखा। एस.एस. नरकुंडा नामक जलयान पर यात्रा के दौरान उन्होंने ग्लेशियरों और जल से प्रकीर्णन के कुछ प्रयोग इस यंत्र की सहायता से किए। भारत पहुंचते-पहुंचते उन्हें विश्वास हो गया कि उनका विचार सही था। उन्होंने &amp;#039;[[नेचर (पत्रिका)]] को एक छोटा लेख इस संबंध में भेजा और युवा वैज्ञानिकों के अपने दल के साथ प्रकाश-प्रकीर्णन संबंधी अपने प्रयोगों में लीन हो गए। 7 वर्ष के अथक परिश्रम और सैकड़ों द्रवों एवं ठोसों से प्रकाश-प्रकीर्णन का अध्ययन करने के बाद आखिर 28 फरवरी, 1928 को उन्होंने रमन प्रभाव की घोषणा की। 1987 से भारत में यह दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रमन प्रभाव की व्याख्या==&lt;br /&gt;
रमन प्रभाव की उपयुक्त व्याख्या केवल [[क्वांटम]] सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है, जहां एकवर्णी (निश्चित तरंगदैर्ध्य के) प्रकाश पुंज को ऊर्जा युक्त कणों (अथवा फोटोनों) के प्रवाह के रूप में देखा जाता है। ये फोटॉन जब माध्यम (माना वायु) के कणों से टकराते हैं तो उनमें या तो [[प्रत्यास्थ संघट्ट]] होता है जिससे अनिवार्यतः आपतित आवृत्ति की ही तरंगें उत्सर्जित होती हैं ([[रेले प्रकीर्णन]]) या फिर [[अप्रत्यास्थ संघट्ट]] होता है जिससे आपतित विकिरणों से अधिक तरंगदैर्ध्य (या कम आवृत्ति) की स्पेक्ट्रमी रेखाएं ([[स्टॉक रेखाएं]]) भी प्राप्त हो सकती हैं और कम तरंगदैर्ध्य (या अधिक आवृत्ति) की स्पेक्ट्रमी रेखाएं (एण्टी स्टॉर्क रेखाएं) भी। अप्रत्यास्थ संघट्ट से प्राप्त विकिरणों का प्रक्रम &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रमन प्रकीर्णन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कहलाता है और इसके परिणामस्वरूप प्राप्त स्पेक्ट्रमी रेखाएं &amp;#039;रमन रेखाएं&amp;#039; कहलाती हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanscattering.svg|center|550px|thumb|प्रकाश के प्रकीर्णन की विभिन्न सम्भावनाएँ : &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रैले स्कैटरिंग&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (ऊर्जा का कोई आदान-प्रदान नहीम होता: आपतित एवं प्रकीर्णित फोटॉनों की ऊर्जा समान होती है।), &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;स्टोक्स-रमन स्कैटरिंग&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  (परमाणु या अणु ऊर्जा का अवशोषण करते हैं। : प्रकीर्णित फोटॉन की ऊर्जा आपतित फोटॉन की ऊर्जा से कम होती है।) तथा &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;एन्टी-स्टोक्स-रमन स्कैटरिंग&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (परमाणु या अणु ऊर्जा छोड़ता है: प्रकीर्णित फोटॉन की ऊर्जा आपतित फोटॉन की ऊर्जा से अधिक होती है।)]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रमन प्रभाव==&lt;br /&gt;
भौतिकीविदों का प्रभावी औजार शुरूआती दौर में रमन प्रभाव का उपयोग भौतिकीविदों द्वारा शोध अध्ययनों में किया गया। पहले 7 वर्षों में इस प्रभाव को आधार बना कर 700 से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। एक ओर [[सैद्धान्तिक भौतिकी|सैद्धांतिक भौतिकी]] की दृष्टि से इस प्रभाव ने क्वांटम भौतिकी को सुदृढ़ आधार प्रदान करने का कार्य किया तो वहीं दूसरी ओर प्रायोगिक भौतिकविदों को क्रिस्टलों और अणुओं की संरचनाओं के अध्ययन के लिए एक अत्यन्त दक्ष, सरल तकनीक प्रदान की। फिर धीरे-धीरे भौतिकविदों की इस नई तकनीक में रूचि कम होने लगी। पर तब तक रसायनज्ञों के बीच एक विश्लेषणात्क औजार के रूप में यह तकनीक लोकप्रिय होने लगी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसायनज्ञों के औजार के रूप में प्रत्येक पदार्थ का अपना विशिष्ट स्पेक्ट्रम होता है। अतः पदार्थ को नष्ट किए बिना मिश्रणों का भी रासायनिक विश्लेषण इस तकनीक द्वारा किया जा सकता था और पदार्थ कार्बनिक हो या अकार्बनिक उसके हस्ताक्षर रमन स्पेक्ट्रम में पहचाने जा सकते थे। साथ ही स्पेक्ट्रमी रेखाओं की तीव्रता की तुलना से उनके सापेक्ष परिमाण की उपस्थिति का आकलन भी किया जा सकता था। यह एक व्यापक तकनीक थी और इसका उपयोग द्रवों के अतिरिक्त गैसों और ठोसों के लिए भी किया जा सकता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु [[द्वितीय विश्वयुद्ध]] के बाद सुग्राही संसूचकों और इलेक्ट्रॉनिकी में हुए विकास के कारण वैज्ञानिकों को [[अवरक्त स्पेक्ट्रममिति]] रमन स्पेक्ट्रममिति से सरल लगने लगी और रमन प्रभाव के अनुप्रयोगों की ओर रूझान कुछ कम हुआ। किंतु [[लेसर विज्ञान|लेसर]] की खोज के बाद 1960 से रमन प्रभाव फिर से वैज्ञानिक अन्वेषकों में लोकप्रिय हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेसर और रमन प्रभाव==&lt;br /&gt;
रमन प्रभाव के [[सेंसर|संसूचन]] में सबसे कठिन समस्या यह थी कि रमन रेखाएं बहुत क्षीण होती थीं इसलिए उनके संसूचन के लिए अत्यंत तीव्र प्रकाश स्रोत की आवश्यकता थी। लेसर ने न केवल ऐसा अत्यंत तीव्र प्रकाश स्रोत प्रदान किया वरन प्रकीर्णित प्रकाश में ऐसे नए प्रभाव प्रवर्तित किए जिन्होंने रमन स्पेक्ट्रममिति में नए आयाम जोड़ दिए। परिणामस्वरूप रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के अनेक परिवर्त्त विकसित हुए। इनमें जिन मूल संकल्पनाओं का उपयोग किया गया है उनमें सुग्राहिता वृद्धि के लिए पृष्ठवर्धित रमन, स्थानिक विभेदन में सुधार के लिए रमन माइक्रोस्कोपी और अत्यंत विशिष्ट सूचना प्राप्ति के लिए रेजोनेंस रमन मुख्य हैं। इन संकल्पनाओं के समाकलन से अनेक भिन्न-भिन्न रमन स्पेक्ट्रम तकनीकें विकसित की गई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[फूर्ये रूपान्तर|फुरियर रूपांतरण]] तकनीकों और डॉटा प्रबंधन के लिए कम्प्यूटरों का अनुप्रयोग जुड़ जाने के बाद 1980 के दशक के उत्तरार्ध से व्यावसायिक रमन स्पेक्ट्रममापी उपलब्ध हो गए और अब कोई भी क्षेत्र  रमन प्रभाव के अनुप्रयोगों से अछूता नहीं रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रमन प्रभाव के अनुप्रयोग==&lt;br /&gt;
जहां भी सैंपल को बिना क्षति पहुंचाए, द्रुतगति से पदार्थ विशेष के कुछ कण पहचान कर निष्कर्ष निकाले जा सकते हों, वहां रमन प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी तकनीक प्रदान करता है। अभिनव रमन स्पेक्ट्रममिति के कुछ अनुप्रयोग नीचे दिए गए हैं :&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
* औषधियों, पेट्रोकेमिकलों और प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण प्रक्रमों के अध्ययन, मॉनीटरन और गुणवत्ता निर्धरण में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[अपराध शास्त्र|अपराध विज्ञान]] में पैकेट्स या बक्सों को बिना खोले उनके अन्दर विद्यमान विशिष्ट पदार्थों  (जैसे मादक पदार्थों) के संसूचन (डिटेक्शन) में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* पेंट उद्योग में जैसे-जैसे पेंट सूखता है तो उसमें क्या रसायनिक अभिक्रियाएं होती हैं, रसायनज्ञ यह अध्ययन कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* स्टैंड-ऑफ रिमोट रमन नामक तकनीक का उपयोग करके, जिसमे प्रायः प्रकाश संकलन के लिए टेलिस्कोप का और रमन रेखाओं को संसूचक तक ले जाने के लिए ऑप्टिक फाइबरों का उपयोग होता है, हानिकारक या [[रेडियोसक्रियता|रेडियोएक्टिव पदार्थों]] का सुरक्षित दूरी से अध्ययन किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* रमन स्पेक्ट्रम का उपयोग करके प्रकाश रसायनज्ञ और प्रकाश-जीववैज्ञानिक 10&amp;lt;sup&amp;gt;11&amp;lt;/sup&amp;gt; तक औसत आयु के क्षणजीवी रसायनों तक के स्पेक्ट्रम प्राप्त कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[भूविज्ञान|भूगर्भशास्त्र]] और खनिज-वैज्ञानिक रत्नों और खनिजों की पहचान तथा विभिन्न दशाओं में खनिज-व्यवहार आदि का अध्ययन करने के लिए इस तकनीक का उपयोग करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[कार्बन नैनोट्यूब|कार्बन नैनोट्यूबों]] एवं [[हीरा|हीरों]] की गुणवत्ता और गुणों के अध्ययन के लिए रमन प्रभाव का उपयोग किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवन-अध्ययनों जैसे [[डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल|डीएनए]]/[[राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल|आरएनए]] विश्लेषण में, रोग निदान, एकल सेल विश्लेषण आदि में भी व्यापक पैमाने पर रमन प्रभाव उपयोग में लाया जा रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रमन प्रभाव के भावी अनुप्रयोगों संबंधी अनुसंधान==&lt;br /&gt;
* स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक नैनोटैक्नोलॉजी का रमन प्रभाव के साथ उपयोग करके ट्यूमर्स की जांच के लिए अनुसंधान कर रहे हैं जिसके द्वारा कुछ [[कर्कट रोग|कैंसरयुक्त]] कोशिकाओं की उपस्थिति भी दर्ज की जा सकेगी। इसके लिए ऐसे विशिष्ट नैनोकण अभिकल्पित किए गए हैं जो इन्जेक्शन द्वारा रक्त प्रवाह में पहुंचा देने पर केवल कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर उनसे ही जुड़ेंगे। जब लेसर प्रकाश त्वचा पर डाला जाएगा तो ये नैनो कण विशिष्ट रमन सिग्नल परावर्तित करेगे जिनके आधार पर कैंसर कोशिकाओं की उपस्थिति पहचानी जा सकेगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड में विद्यमान प्रत्येक प्रेक्षित पदार्थ का रमन स्पेक्ट्रम प्राप्त कर उसका डॉटाबेस तैयार कर रहे हैं। ब्रह्मांड की इस फिंगर प्रिंटिंग के बाद कहां क्या है, क्या घट बढ़ रहा है आदि ब्रह्मांड संबंधी सूक्ष्म जानकारी ब्रह्मांड में होने वाली घटनाओं की एक अत्यंत सूक्ष्मदृष्टि प्रस्तुत करेंगे। नशीली दवाईयों, प्रदूषणों और विस्फोटकों आदि के डॉटाबेस पहले ही तैयार हो चुके हैं अब छोटे-छोटे रमन स्कैनरों का उपयोग करके स्मगलरों और आतंकवादियों को पकड़ना आसान हो गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* रोटरडम की &amp;#039;रिवर डायग्नोस्टिक&amp;#039; नाम कम्पनी ने एक ऐसा बैक्टीरिया एनालाइजर विकसित किया है, जिसके द्वारा तत्काल रोगी के शरीर में विद्यमान रोगकारी सूक्ष्मजीवों की पहचान की जा सकेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* आशा है कि शीघ्र ही [[रक्त परीक्षण]] गुजरे कल की बात हो जाऐंगे, क्योंकि बाहर से ही रोगी के रक्त का रमन स्पेक्ट्रम लेकर इसमें विद्यमान [[ग्लूकोज़|ग्लुकोज]], [[कोलेस्टरॉल]], [[यूरिक अम्ल]] आदि का सटीक आकलन किया जा सकेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समय के साथ रमन प्रभाव के अनुप्रयोग बढ़ते जा रहे हैं और यह 21वी शताब्दीं में रमन प्रभाव की विरासत के महत्त्व को दर्शाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[रमन स्पेक्ट्रमिकी]] (रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20090315131151/http://hyperphysics.phy-astr.gsu.edu/hbase/atmos/raman.html Explanation from Hyperphysics in Astronomy section of gsu.edu]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110713170108/http://www.kosi.com/Raman_Spectroscopy/rtr-ramantutorial.php?ss=700 Raman Spectroscopy - Tutorial at Kosi.com]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20081026082027/http://www.scientificamericanpast.com/Scientific%20American%201930%20to%201939/1/med/sci121930.htm December 1930;Prof. R. W. Wood Demonstrating the New &amp;quot;Raman Effect&amp;quot; in Physics]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{भारतीय विज्ञान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:Scattering, absorption and radiative transfer (optics)]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:फाइबर ऑप्टिक संचार]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भौतिकी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:विज्ञान]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:रमण प्रभाव]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;चक्रबोट</name></author>
	</entry>
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