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	<title>रामचरितमानस के पात्रों की कसौटी - अवतरण इतिहास</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/2409:4043:2C80:3275:0:0:8608:2501&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/2409:4043:2C80:3275:0:0:8608:2501&quot;&gt;2409:4043:2C80:3275:0:0:8608:2501&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:2409:4043:2C80:3275:0:0:8608:2501&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:2409:4043:2C80:3275:0:0:8608:2501 (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;वार्ता&lt;/a&gt;) के 1 संपादन वापस करके 2405:205:1404:589A:0:0:25C6:D8A4के अंतिम अवतरण को स्थापित किया (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=WP:TW&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;WP:TW (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;ट्विंकल&lt;/a&gt;)&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{Multiple issues|&lt;br /&gt;
{{सफाई|reason=वाक्य विन्यास अशुद्धियाँ|date=अक्टूबर 2020}}&lt;br /&gt;
{{स्रोतहीन|date=अक्टूबर 2020}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{एक स्रोत}}&lt;br /&gt;
{{Infobox religious text&lt;br /&gt;
| image = Ram-charit-manas.gif&lt;br /&gt;
| alt = रामचरितमानस&lt;br /&gt;
| caption = श्रीरामचरितमानस का आवरण&lt;br /&gt;
| language = [[हिन्दी|हिंदी]] की बोली [[अवधी]] &lt;br /&gt;
| religion = [[हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
|author = [[तुलसीदास]]&lt;br /&gt;
|verses=10,902&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;श्री रामचरितमानस&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; [[अवधी]] भाषा में [[तुलसीदास|गोस्वामी तुलसीदास]] द्वारा १६वीं सदी में रचित एक इतिहास की घटना है। इस ग्रन्थ को [[अवधी साहित्य]] (हिंदी साहित्य) की एक महान कृति माना जाता है। इसे सामान्यतः &amp;#039;तुलसी रामायण&amp;#039; या &amp;#039;तुलसीकृत रामायण&amp;#039; भी कहा जाता है। रामचरितमानस [[भारत की संस्कृति|भारतीय संस्कृति]] में एक विशेष स्थान रखता है। रामचरितमानस की लोकप्रियता अद्वितीय है। [[उत्तर भारत]] में &amp;#039;[[रामायण]]&amp;#039; के रूप में बहुत से लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। [[शरद ऋतु|शरद]] [[नवरात्रि]] में इसके [[सुन्दरकाण्ड|सुन्दर काण्ड]] का पाठ पूरे नौ दिन किया जाता है। रामायण मण्डलों द्वारा मंगलवार और शनिवार को इसके सुन्दरकाण्ड का पाठ किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री रामचरित मानस के नायक [[राम|श्रीराम]] हैं जिनको एक मर्यादा पुरोषोत्तम के रूप में दर्शाया गया है जोकि अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी श्रीहरि नारायण भगवान के अवतार है जबकि [[वाल्मीकि|महर्षि वाल्मीकि]] कृत [[रामायण]] में [[राम|श्री राम]] को एक आदर्श चरित्र मानव के रूप में दिखाया गया है। जो सम्पूर्ण मानव समाज ये सिखाता है जीवन को किस प्रकार जिया जाय भले ही उसमे कितने भी विघ्न हों [[तुलसीदास|तुलसी]] के प्रभु [[राम]] सर्वशक्तिमान होते हुए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। गोस्वामी जी ने रामचरित का अनुपम शैली में दोहों, चौपाइयों, सोरठों तथा छंद का आश्रय लेकर वर्णन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
रामचरित मानस १५वीं शताब्दी के कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखा गया [[महाकाव्य]] है, जैसा कि स्वयं गोस्वामी जी ने रामचरित मानस के [[बालकाण्ड]] में लिखा है कि उन्होंने रामचरित मानस की रचना का आरम्भ [[अयोध्या]] में [[विक्रम संवत]] १६३१ (१५७४ ईस्वी) को [[राम नवमी|रामनवमी]] के दिन (मंगलवार) किया था। [[गीताप्रेस]] गोरखपुर के संपादक श्री [[हनुमान प्रसाद पोद्दार]] के अनुसार रामचरितमानस को लिखने में गोस्वामी तुलसीदास जी को २ वर्ष ७ माह २६ दिन का समय लगा था और उन्होंने इसे संवत् १६३३ (१५७६ ईस्वी) के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में [[राम विवाह]] के दिन पूर्ण किया था। इस महाकाव्य की भाषा [[अवधी]] है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने श्री [[राम]]चन्द्र के निर्मल एवं विशद चरित्र का वर्णन किया है। महर्षि [[वाल्मीकि]] द्वारा रचित संस्कृत [[रामायण]] को रामचरितमानस का आधार माना जाता है। यद्यपि [[रामायण]] और रामचरितमानस दोनों में ही [[राम]] के चरित्र का वर्णन है परंतु दोनों ही महाकाव्यों के रचने वाले कवियों की वर्णन शैली में उल्लेखनीय अन्तर है। जहाँ वाल्मीकि ने रामायण में [[राम]] को केवल एक सांसारिक व्यक्ति के रूप में दर्शाया है वहीं तुलसीदास ने रामचरितमानस में राम को भगवान [[विष्णु]] का [[अवतार]] माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामचरितमानस को तुलसीदास ने सात काण्डों में विभक्त किया है। इन सात काण्डों के नाम हैं - [[बालकाण्ड]], [[अयोध्याकाण्ड]], [[अरण्यकाण्ड]], [[किष्किन्धाकाण्ड]], [[सुन्दरकाण्ड]], [[लंकाकाण्ड]] (युद्धकाण्ड) और [[उत्तरकाण्ड]]। छन्दों की संख्या के अनुसार [[बालकाण्ड]] और किष्किन्धाकाण्ड क्रमशः सबसे बड़े और छोटे काण्ड हैं। [[तुलसीदास]] जी ने रामचरितमानस में अवधी के [[अलंकार|अलंकारों]] का बहुत सुन्दर प्रयोग किया है विशेषकर [[अनुप्रास|अनुप्रास अलंकार]] का। रामचरितमानस में प्रत्येक [[हिन्दू धर्म|हिंदू]] की अनन्य आस्था है और इसे हिन्दुओं का पवित्र ग्रन्थ माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संक्षिप्त मानस कथा ==&lt;br /&gt;
यह बात उस समय की है जब [[मनु]] और [[शतरूपा|सतरूपा]] परमब्रह्म की तपस्या कर रहे थे। कई वर्ष तपस्या करने के बाद [[शिव|शंकरजी]] ने स्वयं [[पार्वती]] से कहा कि [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] और मैं कई बार मनु सतरूपा के पास वर देने के लिये आये (&amp;quot;बिधि हरि हर तप देखि अपारा, मनु समीप आये बहु बारा&amp;quot;) और कहा कि जो वर तुम माँगना चाहते हो माँग लो; पर मनु सतरूपा को तो पुत्र रूप में स्वयं परमब्रह्म को ही माँगना था, फिर ये कैसे उनसे यानी शंकर, ब्रह्मा और विष्णु से वर माँगते? हमारे प्रभु श्रीराम तो सर्वज्ञ हैं। वे भक्त के ह्रदय की अभिलाषा को स्वत: ही जान लेते हैं। जब २३ हजार वर्ष और बीत गये तो प्रभु श्रीराम के द्वारा [[आकाशवाणी]] होती है- &lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;प्रभु सर्वग्य दास निज जानी, गति अनन्य तापस नृप रानी। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;माँगु माँगु बरु भइ नभ बानी, परम गँभीर कृपामृत सानी॥&lt;br /&gt;
इस आकाशवाणी को जब मनु सतरूपा सुनते हैं तो उनका ह्रदय प्रफुल्लित हो उठता है और जब स्वयं परमब्रह्म राम प्रकट होते हैं तो उनकी स्तुति करते हुए मनु और सतरूपा कहते हैं- &amp;quot;सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू, बिधि हरि हर बंदित पद रेनू। सेवत सुलभ सकल सुखदायक, प्रणतपाल सचराचर नायक॥&amp;quot; अर्थात् जिनके चरणों की वन्दना विधि, हरि और हर यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही करते है, तथा जिनके स्वरूप की प्रशंसा सगुण और निर्गुण दोनों करते हैं: उनसे वे क्या वर माँगें? इस बात का उल्लेख करके तुलसीदास ने उन लोगों को भी राम की ही आराधना करने की सलाह दी है जो केवल निराकार को ही परमब्रह्म मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अध्याय ==&lt;br /&gt;
# [[बालकाण्ड]]&lt;br /&gt;
# [[अयोध्याकाण्ड]]&lt;br /&gt;
# [[अरण्यकाण्ड]]&lt;br /&gt;
# [[किष्किन्धाकाण्ड]]&lt;br /&gt;
# [[सुन्दरकाण्ड]]&lt;br /&gt;
# [[लंकाकाण्ड]]  (युद्धकाण्ड)&lt;br /&gt;
# [[उत्तरकाण्ड]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाषा-शैली==&lt;br /&gt;
रामचरितमानस की भाषा के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं। कोई इसे [[अवधी]] मानता है तो कोई [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]]। कुछ लोक मानस की भाषा अवधी और भोजपुरी की मिलीजुली भाषा मानते हैं। मानस की भाषा [[बुंदेली भाषा|बुंदेली]] मानने वालों की संख्या भी कम नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोस्वामी जी ने भाषा को नया स्वरूप दिया। यह अवधी नहीं अपितु वही भाषा थी जो [[प्राकृत]] से [[शौरसेनी]] [[अपभ्रंश]] होते हुए, १५ दशकों तक समस्त भारत की साहित्यिक भाषा रही [[बृज भाषा|ब्रजभाषा]] के नए रूप [[मागधी]], [[अर्धमागधी]] आदि से सम्मिश्र होकर आधुनिक हिन्दी की ओर बढ़ रही थी, जिसे ‘भाखा’ कहा गया एवं जो आधुनिक हिन्दी ‘[[खड़ीबोली]]’ का पूर्व रूप थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुलसीदास &amp;#039;ग्राम्य गिरा&amp;#039; के पक्षधर थे परन्तु वे [[मलिक मोहम्मद जायसी|जायसी]] की [[गाँव|गँवारू]] भाषा अवधी के पक्षधर नहीं थे। तुलसीदास की तुलना में जायसी की अवधी अधिक शुद्ध है। स्वयं गोस्वामी जी के अन्य अनेक ग्रन्थ जैसे ‘[[पार्वतीमंगल]]’ तथा &amp;#039;[[जानकीमंगल]]’ अच्छी अवधी में है। गोस्वामी जी [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] के भी विद्वान् थे, इसलिए संस्कृत व आधुनिक शुद्ध हिन्दी खड़ीबोली का प्रयोग भी स्वाभाविक रूप में हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्रकूट धाम|चित्रकूट]] स्थित अन्तरराष्ट्रीय मानस अनुसंधान केन्द्र के प्रमुख [[रामभद्राचार्य|स्वामी रामभद्राचार्य]] ने रामचरितमानस का सम्पादन किया है। स्वामी जी ने लिखा है कि रामचरितमानस के वर्तमान संस्करणों में कर्तृवाचक उकार शब्दों की बहुलता हैं। उन्होंने इसे अवधी भाषा की प्रकृति के विरुद्ध बताया है। इसी प्रकार उन्होंने उकार को कर्मवाचक शब्द का चिन्ह मानना भी अवधी भाषा के विपरीत बताया है। स्वामीजी अनुनासिकों को विभक्ति को द्योतक मानने को भी असंगत बताते हैं- &amp;#039;जब तें राम ब्याहि घर आये&amp;#039;। कुछ अपवादों को छोड़कर अनावश्यक उकारान्त कर्तृवाचक शब्दों के प्रयोग को स्वामी रामभद्राचार्य ने अवधी भाषा के विरुद्ध बताया है।  स्वामी रामभद्रचार्य ने &amp;#039;न्ह&amp;#039; के प्रयोग को भी अनुचित और अनावश्यक बताया है। उनके अनुसार नकार के साथ हकार जोड़ना ब्रजभाषा का प्रयोग है अवधी का नहीं। स्वामीजी के अनुसार मानस की उपलब्ध प्रतियों में तुम के स्थान पर &amp;#039;तुम्ह&amp;#039; और &amp;#039;तुम्हहि&amp;#039; शब्दों के जो प्रयोग मिलते हैं वे अवधी में नहीं होते | इसी प्रकार &amp;#039;श&amp;#039; न तो प्राचीन अवधी की ध्वनि है और न ही आधुनिक अवधी की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[रामायण आरती]] (रामचरितमानस)&lt;br /&gt;
* [[वाल्मीकि]] [[रामायण]]&lt;br /&gt;
* [[तुलसीदास]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देखें==&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्मग्रन्थ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:रामायण]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी के महाकाव्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;QueerEcofeminist</name></author>
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