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	<title>रामनाम - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
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		<updated>2020-03-03T02:30:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रामनाम&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; का शाब्दिक अर्थ है - &amp;#039;राम का नाम&amp;#039;। &amp;#039;रामनाम&amp;#039; से आशय [[विष्णु]] के [[अवतार]] [[राम]] की भक्ति से है या फिर निर्गुण निरंकार परम ब्रह्म से। [[हिन्दू धर्म]] के विभिन्न सम्रदायों में राम के नाम का [[कीर्तन]] या [[जप]] किया जाता है। &amp;#039;&amp;#039;&amp;quot;श्रीराम जय राम जय जय राम&amp;quot;&amp;#039;&amp;#039; एक प्रसिद्ध मंत्र है जिसे पश्चिमी भारत में [[समर्थ रामदास]] ने लोकप्रिय बनाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
[[भारतीय साहित्य]] में [[वैदिक सभ्यता|वैदिक काल]] से लेकर गाथा काल तक रामसंज्ञक अनेक महापुरुषों का उल्लेख मिलता है किंतु उनमें सर्वाधिक प्रसिद्धि [[वाल्मीकि रामायण]] के नायक [[अयोध्या]]नरेश [[दशरथ]] के पुत्र [[राम]] की हुई। उनका चरित् जातीय जीवन का मुख्य प्रेरणास्रोत बन गया। शनै: शनै: वे वीर पुरुष से पुरुषोत्तम और पुरुषोत्तम से परात्पर ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। ईसा की दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच विष्णु अथवा नारायण के अवतार के रूप में उनकी पूजा भी आरंभ हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[आलवार सन्त|आलवारों]] में शठकोप, मधुर कवि तथा कुलशेखर और वैष्णवाचार्यों में [[रामानुज]] ने रामावतार में विशेष निष्ठा व्यक्त की परंतु चौदहवीं शताब्दी के अंत तक रामोपासना व्यक्तिगत साधना के रूप में ही पल्लवित होती रही; उसे स्वतंत्र संप्रदाय के रूप में संगठित करने का श्रेय स्वामी [[स्वामी रामानन्दाचार्य|रामानंद]] को प्राप्त है। उन्होंने रामतारक अथवा षडक्षर राममंत्र को वैष्णव साधना के इतिहास में पहली बार &amp;#039;बीज मंत्र&amp;#039; का गौरव प्रदान किया और मनुष्यमात्र को रामनाम जप का अधिकार घोषित किया। इन्हीं की परंपरा में आविर्भूत [[तुलसीदास|गोस्वामी तुलसीदास]] ने इस विचारधारा का समर्थन करते हुए रामनाम को &amp;#039;मंत्रराज&amp;#039;, &amp;#039;बीज मंत्र&amp;#039; तथा &amp;#039;महामंत्र&amp;#039; की संज्ञा देकर कलिग्रस्त जीवों के उद्धार का एकमात्र साधन बताया। उन्होंने उसे [[वेद|वेदों]] का प्राण, [[त्रिमूर्ति|त्रिदेवों]] का कारण और [[ब्रह्म]] राम से भी अधिक महिमायुक्त कहकर नामाराधन में एकांत निष्ठा व्यक्त की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सांप्रदायिक रामभक्ति के विकसित होने पर अर्थानुसंधानपूर्वक रामनाम जप साधना का एक आवश्यक अंग माना जाने लगा। अन्य नामों की अपेक्षा ब्रह्म के गुणों की अभिव्यक्ति की क्षमता &amp;#039;राम&amp;#039; में अधिक देखकर उसे प्रणव की समकक्षता की महत्ता प्रदान की गई। वैष्णव भक्तों ने सांप्रदायिक विश्वासों के अनुकूल &amp;#039;रामनाम&amp;#039; की विभिन्न व्यख्याएँ प्रस्तुत कीं। सगुणमार्गी मर्यादावादी भक्तों ने उसे लोकसंस्थापनार्थ ऐश्वर्यपूर्ण लीलाओं के विधायक रामचंद्र और रसिक भक्तों ने सौंदर्य माधुर्यादि दिव्य गुणों से विभूषित साकेतविहारी &amp;#039;युगल सरकार&amp;#039; का व्यंजक बताया किंतु निर्गुणमार्गी संतों ने उसे योगियों के चित्त को रमानेवाले, सर्वव्यापक, सर्वातर्यामी, जगन्निवास निराकार ब्रह्म का ही बोधक माना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामनाम की इस लोकप्रियता ने &amp;#039;रामभक्ति&amp;#039; के विकास का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उसकी असीम तारक शक्ति, सर्वसुलभता तथा भक्तवत्सलता का अनुभव कर भावुक उपासकों ने अर्चन तथा पादसेवन को छोड़कर नाम के प्रति सप्तधा भक्ति अर्पित की, जिनमें श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण को विशेष महत्व मिला। तुलसी ने उसे स्वामी और सखा दोनों रूपों में ध्येय माना और [[बनादास]] ने उससे मधुर दास्यभाव का संबंध स्थापित किया। यह नामोपासना रामभक्ति शाखा में ही सीमित न रही। लीलापुरुषोत्तम के आराधक [[सूरदास|सूर]] और [[मीरा बाई|मीरा]] ने भी अपनी कृतियों में प्रगाढ़ रामनामासक्ति व्यंजित की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामभक्ति की रसिक शाखा में नामभक्ति की प्राप्ति के लिए नामसाधना की अनेक प्रणालियाँ प्रवर्तित हुई। रासखा ने चित्रकूट के कामदवन में अनुष्ठानपूर्वक बारह वर्ष तक और बनादास ने अयोध्या के रामघाट पर गुफा बनाकर चौदह वर्ष तक अहर्निश नामजप में लीन रकर आराध्य का दर्शनलाभ किया। युगलानन्यशरण ने नाम अभ्यास की एक अन्य व्यवस्थित प्रक्रिया प्रवर्तित की। इसकी तीन भूमिकाएँ हैं - भूमिशोधन, नामजप और नामध्यान। प्रथम के अंतर्गत संयम नियम द्वारा नामजप की पात्रता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त पृष्ठभमि तैयार की जाती है। दूसरी में नाम के महत्व, अर्थपरत्व तथा जपविधि का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। नाध्यानसंज्ञक तीसरी स्थिति नामसाधना का अंतिम सोपान है। इसके तीन स्तर हैं - ताड़नध्यान, आरतीध्यान और मौक्तिकध्यान। ताड़न का अर्थ है दंड देना। अत: प्रथम अवस्था में रामनाम की निरंतर चोट देकर अंत:करण से वासना निकाली जाती है। विषयनिवृत्ति से अंत:स्थ ईश्वर का ज्योतिर्मय स्वरूप प्रकट हो जाता है। उसकी दिव्य आभा से साधक के मानसनेत्र खुल जाते हैं। तब वह अपनी उद्बुद्ध प्रज्ञा से ध्येय का अभिनंदन अथवा आरती करता है। तीसरी अवस्था में भवबंधन से मुक्त साधक अपने स्थूल शरीर से पृथक् चित् देह अथवा भावदेह का साक्षात्कार कर परमपुरुषार्थ की प्राप्ति करता है। इसके फलस्वरूप लोकयात्रा में जीवन्मुक्ति का सुख भोगता हुआ साधक स्वेच्छानुसार शरीर त्यागकर उपास्य की नित्यलीला में प्रवेश करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी रामानंद से प्रत्यक्ष प्रेरणा ग्रहण करने के कारण अवतारवाद के घोर विरोधी संतमत में भी रामनाम की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण बनी रही। आदि संत कबीर ने निर्गुण ब्रह्म से उसका तादात्म्य स्थापित कर नामसाधना को एक नया मोड़ दिया। उनके परवर्ती नानक, दादू, गुलाल, जगजीवन आदि तत्वज्ञ महात्माओं ने एक स्वर से उसे निर्गुणपंथ का मूल मंत्र स्वीकार किया। इनकी नाम अथवा &amp;#039;जिकिर&amp;#039; साधना तांत्रिक आदर्श पर निर्मित होने से प्रणायाम की जटिल विधियों से समन्वित थी। अँगुलियों से माला फेरने और जिह्वा से रामनाम रटने को निर्थक बताते हुए इन संतों ने आंतरिक चित्तवृत्ति के साथ परम तत्व के परामर्श को ही जप की संज्ञा दी, जिसकी सिद्धि इड़ा पिंगला को छोड़कर सुषुम्ना मार्ग से श्वास का अवधारण करके रामनामस्थ होने से होती है, और &amp;#039;अनाहत नाम&amp;#039; सुनाई पड़ने लगता है। उससे नि:सृत रामनाम-रस पानकर व्यष्टिजीव आत्मविभोर हो जाता है संतों ने नामामृत पान के लिए कायायोग द्वारा परम तत्व के साथ एकात्मता का अनुभव आवश्यक बताया है। मात्र भावावेशपूर्ण नामोच्चारण से इसकी उपलब्धि असंभव है। मनरति के तनरति की यह अनिवार्यता संतों की नामसाधना में योगतत्व की प्रमुखता सिद्ध करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संतों तथा वैष्णव भक्तों द्वारा प्रवर्तित नामसाधना की उपर्युक्त पद्धतियों में विभिन्नता का मुख्य कारण है उनका सैद्धांतिक मतभेद। साकारवादी, भक्ति में शुद्ध प्रेम अथवा भाव तत्व को अधिक महत्व देते हैं, किंतु निराकारवादी, ज्ञान तथा योग तत्व को। सगुणोपासक रूप के बिना नाम की कल्पना ही नहीं कर सकते। अत: वे आराध्य के आंगिक सौंदर्य तथा लीलामाधुर्य के वर्णन एवं ध्यान में मग्न होते हैं। इस स्थिति में उपासक के हृदय में उपास्य से अपने पृथक् अस्तित्व की अनुभूति निरंतर होती रहती है किंतु नाम रस से छके हुए तत्वज्ञान-स्पृही निर्गुणमार्गी सत वितर्कहीन स्थिति में पहुँचकर अपने को भूल जाते हैं। वहाँ ध्याता और ध्येय की पृथक् सत्ता का आभास ही नहीं होता। उनकी अंतर्मुखी चेतना ब्रह्मानुभव ने निरत हो तद्रूप हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ ग्रन्थ==&lt;br /&gt;
* डॉ॰ भगवतीप्रसाद सिंह : रामभक्ति में रसिक संप्रदाय; &lt;br /&gt;
* डॉ॰ कामिल बुल्के : रामकथा; &lt;br /&gt;
* डॉ॰ उदयभानु सिंह : तुलसीदर्शन मीमांसा; &lt;br /&gt;
* डॉ॰ विश्वंभरनाथ उपाध्याय : संतवैष्णव काव्य पर तांत्रिक प्रभाव; &lt;br /&gt;
* डॉ॰ मुंशीराम शर्मा : भक्ति का विकास; &lt;br /&gt;
* डॉ॰ हजारीप्रसाद द्विवेदी : रामानंद की हिंदी रचनाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
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