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	<title>रीति काल - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2021-08-08T11:28:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;परिचय: &lt;/span&gt;शब्द संशोधन&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{स्रोतहीन|date=जून 2015}}&lt;br /&gt;
सन् 1700 ई. के आस-पास [[हिंदी]] कविता में एक नया मोड़ आया। इसे विशेषत: तात्कालिक दरबारी संस्कृति और [[संस्कृत साहित्य]] से उत्तेजना मिली। संस्कृत साहित्यशास्त्र के कतिपय अंशों ने उसे शास्त्रीय अनुशासन की ओर प्रवृत्त किया। हिंदी में &amp;#039;रीति&amp;#039; या &amp;#039;काव्यरीति&amp;#039; शब्द का प्रयोग [[काव्यशास्त्र]] के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और [[रस]], [[अलंकार]] आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रंथों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रीतिकाव्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कहा गया। इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत [[संस्कृत]], [[प्राकृत]], [[अपभ्रंश]], [[फारसी]] और हिंदी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काल में कई कवि ऐसे हुए हैं जो आचार्य भी थे और जिन्होंने विविध काव्यांगों के लक्षण देने वाले ग्रंथ भी लिखे। इस युग में शृंगार की प्रधानता रही। यह युग मुक्तक-रचना का युग रहा। मुख्यतया [[कवित्त]], [[सवैये]] और [[दोहे]] इस युग में लिखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि राजाश्रित होते थे इसलिए इस युग की कविता अधिकतर दरबारी रही जिसके फलस्वरूप इसमें चमत्कारपूर्ण व्यंजना की विशेष मात्रा तो मिलती है परंतु कविता साधारण जनता से विमुख भी हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रीतिकाल के अधिकांश कवि दरबारी थे। [[केशवदास]] (ओरछा), प्रताप सिंह (चरखारी), [[बिहारी]] (जयपुर, आमेर), [[मतिराम]] (बूँदी), [[भूषण]] (पन्ना), [[चिंतामणि]] (नागपुर), [[देव]] (पिहानी), [[भिखारीदास]] (प्रतापगढ़-अवध), रघुनाथ (काशी), [[बेनी]] (किशनगढ़), [[गंग]] (दिल्ली), टीकाराम (बड़ौदा), [[ग्वाल]] (पंजाब), चन्द्रशेखर बाजपेई (पटियाला), हरनाम (कपूरथला), कुलपति मिश्र (जयपुर), नेवाज (पन्ना), सुरति मिश्र (दिल्ली), कवीन्द्र उदयनाथ (अमेठी), ऋषिनाथ (काशी), रतन कवि (श्रीनगर-गढ़वाल), [[बेनी बन्दीजन]] (अवध), [[बेनी प्रवीन]] (लखनऊ), ब्रह्मदत्त (काशी), ठाकुर बुन्देलखण्डी (जैतपुर), [[बोधा]] (पन्ना), गुमान मिश्र (पिहानी) आदि और अनेक कवि तो राजा ही थे, जैसे- महाराज जसवन्त सिंह (तिर्वा), भगवन्त राय खीची, भूपति, रसनिधि (दतिया के जमींदार), महाराज विश्वनाथ, द्विजदेव (महाराज मानसिंह)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ ने किया। ये थे आचार्य [[केशवदास]], जिनकी सर्वप्रसिद्ध रचनाएँ [[कविप्रिया]], [[रसिकप्रिया]] और [[रामचंद्रिका]] हैं। कविप्रिया में अलंकार और रसिकप्रिया में रस का सोदाहरण निरूपण है। लक्षण दोहों में और उदाहरण कवित्तसवैए में हैं। लक्षण-लक्ष्य-ग्रंथों की यही परंपरा रीतिकाव्य में विकसित हुई। रामचंद्रिका केशव का [[प्रबंधकाव्य]] है जिसमें भक्ति की तन्मयता के स्थान पर एक सजग कलाकार की प्रखर कलाचेतना प्रस्फुटित हुई। केशव के कई दशक बाद [[चिंतामणि]] से लेकर अठारहवीं सदी तक हिंदी में रीतिकाव्य का अजस्र स्रोत प्रवाहित हुआ जिसमें नर-नारी-जीवन के रमणीय पक्षों और तत्संबंधी सरस संवेदनाओं की अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति व्यापक रूप में हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
रीतिकाल के कवि राजाओं और रईसों के आश्रय में रहते थे। वहाँ मनोरंजन और कलाविलास का वातावरण स्वाभाविक था। बौद्धिक आनंद का मुख्य साधन वहाँ उक्तिवैचित्रय समझा जाता था। ऐसे वातावरण में लिखा गया साहित्य अधिकतर शृंगारमूलक और कलावैचित्रय से युक्त था। पर इसी समय प्रेम के स्वच्छंद गायक भी हुए जिन्होंने प्रेम की गहराइयों का स्पर्श किया है। मात्रा और काव्यगुण दोनों ही दृष्टियों से इस समय का नर-नारी-प्रेम और सौंदर्य की मार्मिक व्यंजना करनेवाला काव्यसाहित्य महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस समय वीरकाव्य भी लिखा गया। मुगल शासक [[औरंगजेब]] की कट्टर सांप्रदायिकता और आक्रामक राजनीति की टकराहट से इस काल में जो विक्षोभ की स्थितियाँ आई उन्होंने कुछ कवियों को वीरकाव्य के सृजन की भी प्रेरणा दी। ऐसे कवियों में [[भूषण]] प्रमुख हैं जिन्होंने रीतिशैली को अपनाते हुए भी वीरों के पराक्रम का ओजस्वी वर्णन किया। इस समय नीति, वैराग्य और भक्ति से संबंधित काव्य भी लिखा गया। अनेक प्रबंधकाव्य भी निर्मित हुए। इधर के शोधकार्य में इस समय की शृंगारेतर रचनाएँ और प्रबंधकाव्य प्रचुर परिमाण में मिल रहे हैं। इसलिए रीतिकालीन काव्य को नितांत एकांगी और एकरूप समझना उचित नहीं है। इस समय के काव्य में पूर्ववर्ती कालों की सभी प्रवृत्तियाँ सक्रिय हैं। यह प्रधान धारा शृंगारकाव्य की है जो इस समय की काव्यसंपत्ति का वास्तविक निदर्शक मानी जाती रही है। शृंगारी काव्य तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है। पहला वर्ग रीतिबद्ध कवियों का है जिसके प्रतिनिधि केशव, चिंतामणि, भिखारीदास, देव, मतिराम और पद्माकर आदि हैं। इन कवियों ने दोहों में रस, अलंकार और नायिका के लक्षण देकर कवित्त सवैए में प्रेम और सौंदर्य की कलापूर्ण मार्मिक व्यंजना की है। संस्कृत साहित्यशास्त्र में निरूपित शास्त्रीय चर्चा का अनुसरण मात्र इनमें अधिक है। पर कुछ ने थोड़ी मौलिकता भी दिखाई है, जैसे [[भिखारीदास]] का हिंदी छंदों का निरूपण। दूसरा वर्ग रीतिसिद्ध कवियों का है। इन कवियों ने लक्षण नहीं निरूपित किए, केवल उनके आधार पर काव्यरचना की। [[बिहारी]] इनमें सर्वश्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दोहों में अपनी &amp;quot;सतसई&amp;#039; प्रस्तुत की। विभिन्न मुद्राओंवाले अत्यंत व्यंजक सौंदर्यचित्रों और प्रेम की भावदशाओं का अनुपम अंकन इनके काव्य में मिलता है। तीसरे वर्ग में घनानंद, बोधा, द्विजदेव ठाकुर आदि रीतिमुक्त कवि आते हैं जिन्होंने स्वच्छंद प्रेम की अभिव्यक्ति की है। इनकी रचनाओं में प्रेम की तीव्रता और गहनता की अत्यंत प्रभावशाली व्यंजना हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रीतिकाव्य मुख्यत: मांसल [[शृंगार]] का काव्य है। इसमें नर-नारीजीवन के रमणीय पक्षों का सुंदर उद्घाटन हुआ है। अधिक काव्य मुक्तक शैली में है, पर [[प्रबंधकाव्य]] भी हैं। इन दो सौ वर्षों में शृंगारकाव्य का अपूर्व उत्कर्ष हुआ। पर धीरे धीरे रीति की जकड़ बढ़ती गई और हिंदी काव्य का भावक्षेत्र संकीर्ण होता गया। आधुनिक युग तक आते आते इन दोनों कमियों की ओर साहित्यकारों का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतिहास साक्षी है कि अपने पराभव काल में भी यह युग वैभव विकास का था। मुगल दरबार के हरम में पाँच-पाँच हजार रूपसियाँ रहती थीं। मीना बाज़ार लगते थे, सुरा-सुन्दरी का उन्मुक्त व्यापार होता था। डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं- &amp;quot;वासना का सागर ऐसे प्रबल वेग से उमड़ रहा था कि शुद्धिवाद सम्राट के सभी निषेध प्रयत्न उसमें बह गये। अमीर-उमराव ने उसके निषेध पत्रों को शराब की सुराही में गर्क कर दिया। विलास के अन्य साधन भी प्रचुर मात्रा में थे।&amp;quot; [[पद्माकर]] ने एक ही छन्द में तत्कालीन दरबारों की रूपरेखा का अंकन कर दिया है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:		गुलगुली गिल में गलीचा हैं, गुनीजन हैं, &lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:			चाँदनी है, चिक है चिरागन की माला हैं।&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:		कहैं पद्माकर त्यौं गजक गिजा है सजी&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:			सेज हैं सुराही हैं सुरा हैं और प्याला हैं।&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:		सिसिर के पाला को व्यापत न कसाला तिन्हें,&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:			जिनके अधीन ऐते उदित मसाला हैं।&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:		तान तुक ताला है, विनोद के रसाला है,&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
:			सुबाला हैं, दुसाला हैं विसाला चित्रसाला हैं। ६&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
ऐहलौकिकता, शृंगारिकता, नायिकाभेद और अलंकार-प्रियता इस युग की प्रमुख विशेषताएं हैं। प्रायः सब कवियों ने ब्रज-भाषा को अपनाया है। स्वतंत्र कविता कम लिखी गई, रस, अलंकार वगैरह काव्यांगों के लक्षण लिखते समय उदाहरण के रूप में - विशेषकर शृंगार के आलंबनों एवं उद्दीपनों के उदाहरण के रूप में - सरस रचनाएँ इस युग में लिखी गईं। भूषण कवि ने वीर रस की रचनाएँ भी दीं। भाव-पक्ष की अपेक्षा कला-पक्ष अधिक समृद्ध रहा। शब्द-शक्ति पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, न नाटयशास्त्र का विवेचन किया गया। विषयों का संकोच हो गया और मौलिकता का ह्रास होने लगा। इस समय अनेक कवि हुए— [[केशव]], [[कवि चिंतामणि|चिंतामणि]], [[कवि देव|देव]], [[बिहारी]], [[मतिराम]], [[भूषण]], [[घनानंद]], [[पद्माकर]] आदि। इनमें से [[केशव]], [[बिहारी (साहित्यकार)|बिहारी]] और [[भूषण]] को इस युग का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है। बिहारी ने दोहों की संभावनाओं को पूर्ण रूप से विकसित कर दिया। आपको रीति-काल का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काल के कवियों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(१) [[रीतिबद्ध कवि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(२) [[रीतिमुक्त कवि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(३) [[रीतिसिद्ध कवि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्वानों का यह भी मत है कि इस काल के कवियों ने काव्य में मर्यादा का पूर्ण पालन किया है। घोर शृंगारी कविता होने पर भी कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन देखने को नहीं मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
:[[हिन्दी साहित्य]]&lt;br /&gt;
:[[आदिकाल]]&lt;br /&gt;
:[[भक्ति काल]]&lt;br /&gt;
:[[आधुनिक हिंदी पद्य का इतिहास]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=5AF892kSHMsC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false हिन्दी रीति साहित्य] (गूगल पुस्तक ; लेखक - भगीरथ मिश्रा)&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=Oe3WzKQiVTQC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false मध्ययुगीन प्रेमाख्यान] (गूगल पुस्तक ; लेखक - श्याम मनोहर पाण्डेय)&lt;br /&gt;
* [http://www.kavitakosh.org कविता कोश - हिन्दी काव्य का अकूत खज़ाना]&lt;br /&gt;
* [http://hindikaitihaas.blogspot.in/2011/01/blog-post.html रीतिकाव्य के गुणदोष] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160307003109/http://hindikaitihaas.blogspot.in/2011/01/blog-post.html |date=7 मार्च 2016 }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Probiteditor</name></author>
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