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	<title>रोशन सिंह - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>223.235.192.78: /* काकोरी काण्ड का मुकदमा */</title>
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		<updated>2021-08-27T12:33:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;काकोरी काण्ड का मुकदमा&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[Image:Roshan Singh.jpg|right|thumb|300px|महान क्रान्तिकारी रोशन सिंह]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ठाकुर रोशन सिंह&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (22 जनवरी 1892 — 19 दिसंबर 1927) [[भारत]] के स्वतन्त्रता संग्राम के एक क्रान्तिवीर थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[असहयोग आन्दोलन]] के दौरान [[उत्तर प्रदेश]] के [[बरेली]] जिले में हुए गोली-काण्ड में सजा काटकर जैसे ही शान्तिपूर्ण जीवन बिताने घर वापस आये कि &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में शामिल हो गये। यद्यपि ठाकुर साहब ने [[काकोरी काण्ड]] में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था फिर भी आपके आकर्षक व रौबीले व्यक्तित्व को देखकर [[काकोरी काण्ड]] के सूत्रधार पण्डित [[राम प्रसाद &amp;#039;बिस्मिल&amp;#039;|राम प्रसाद बिस्मिल]] व उनके सहकारी श्री [[अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ|अशफाक उल्ला खाँ]] के साथ १९ दिसम्बर १९२७ को [[फाँसी]] दे दी गयी। ये तीनों ही क्रान्तिकारी [[उत्तर प्रदेश]] के शहीदगढ़ कहे जाने वाले जनपद [[शाहजहाँपुर]] के रहने वाले थे। इनमें ठाकुर साहब आयु के लिहाज से सबसे बडे़, अनुभवी, दक्ष व अचूक निशानेबाज थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संक्षिप्त जीवन परिचय ==&lt;br /&gt;
कान्तिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म [[उत्तर प्रदेश]] के [[शाहजहाँपुर]] जनपद में [[फतेहगंज]] से १० किलोमीटर दूर स्थित [[गाँव]] नबादा में २२ जनवरी १८९२ को हुआ था। आपकी [[माता]] जी का नाम कौशल्या देवी जी एवं [[पिता]] जी का ठाकुर जंगी सिंह जी था। पूरा परिवार [[आर्य समाज]] से अनुप्राणित था। आप पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। [[असहयोग आन्दोलन]] में उत्तर प्रदेश के [[शाहजहाँपुर]] और [[बरेली]] जिले के ग्रामीण क्षेत्र में आपने अद्भुत योगदान दिया था। यही नहीं, [[बरेली]] में हुए गोली-काण्ड में एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर [[पुलिस]] को उल्टे पाँव भागना पडा। मुकदमा चला और श्री ठाकुर रोशन सिंह को सेण्ट्रल जेल [[बरेली]] में दो साल वामशक्कत कैद (Rigorous Imprisonment) की सजा़ काटनी पडी़ थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== श्री बिस्मिल के सम्पर्क में ==&lt;br /&gt;
[[बरेली]] गोली-काण्ड में सजायाफ्ता श्री रोशन सिंह की भेंट सेण्ट्रल जेल बरेली में [[कानपुर]] निवासी श्री पंडित रामदुलारे त्रिवेदी से हुई जो उन दिनों [[पीलीभीत]] में शुरू किये गये [[असहयोग आन्दोलन]] के फलस्वरूप ६ महीने की सजा़ भुगतने [[बरेली]] सेण्ट्रल [[कारागार|जेल]] में रखे गये थे। [[महात्मा गांधी|गान्धी]] जी द्वारा सन १९२२ में हुए [[चौरी चौरा]] काण्ड के विरोध स्वरूप [[असहयोग आन्दोलन]] वापस ले लिये जाने पर पूरे [[हिन्दुस्तान]] में जो प्रतिक्रिया हुई उसके कारण श्री ठाकुर साहब ने भी राजेन्द्र नाथ लाहिडी़, &lt;br /&gt;
श्री रामदुलारे त्रिवेदी व श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य आदि के साथ [[शाहजहाँपुर]] शहर के [[आर्य समाज]] पहुँच कर श्री [[राम प्रसाद &amp;#039;बिस्मिल&amp;#039;|राम प्रसाद बिस्मिल]] से गम्भीर मन्त्रणा की जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कोई बहुत बडी़ क्रान्तिकारी पार्टी बनाने की रणनीति तय हुई। इसी रणनीति के तहत श्री ठाकुर रोशन सिंह को पार्टी में शामिल किया गया था। श्री ठाकुर साहब पक्के निशानेबाज (Clay Pigeon Shooting Expert) थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बमरौली डकैती ==&lt;br /&gt;
१९२२ की [[गया]] [[कांग्रेस]] में जब पार्टी के दो अलग सोच हो गए और श्री [[मोतीलाल नेहरू]] एवम श्री देशबन्धु [[चितरंजन दास]] ने अपनी अलग से [[स्वराज पार्टी]] बना ली। ये सभी लोग पैसे वाले थे जबकि क्रान्तिकारी पार्टी के पास [[संविधान]], विचार-धारा व दृष्टि के साथ-साथ उत्साही नवयुवकों का बहुत बडा़ संगठन था। हाँ, अगर कोई कमी थी तो वह कमी पैसे की थी। इस कमी को दूर करने के लिये [[आयरलैण्ड]] के क्रान्तिकारियों का रास्ता अपनाया गया और वह रास्ता था डकैती का। इस कार्य को पार्टी की ओर से &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ऐक्शन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; नाम दिया गया। ऐक्शन के नाम पर पहली डकैती [[पीलीभीत]] जिले के एक [[गाँव]] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;बमरौली&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में २५ दिसम्बर १९२४ को [[क्रिसमस|क्रिस्मस]] के दिन एक खण्डसारी (शक्कर के निर्माता) व सूदखोर (ब्याज पर रुपये उधार देने वाले) बल्देव प्रसाद के यहाँ डाली गयी। इस पहली डकैती में ४००० रुपये और कुछ सोने-चाँदी के जे़वरात क्रान्तिकारियों के हाथ लगे। परन्तु मोहनलाल पहलवान नाम का एक आदमी, जिसने डकैतों को ललकारा था,श्री ठाकुर रोशन सिंह की रायफल से निकली एक ही गोली में ढेर हो गया। सिर्फ मोहनलाल की मौत ही श्री ठाकुर रोशन सिंह की [[फाँसी]] की सजा़ का कारण बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== काकोरी काण्ड का मुकदमा ==&lt;br /&gt;
९ अगस्त १९२५ को [[काकोरी]] स्टेशन के पास जो सरकारी खजा़ना लूटा गया था उसमें श्री ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे, यह हकीकत है किन्तु इन्हीं की आयु (३३ वर्ष) के श्री केशव चक्रवर्ती (छद्म नाम), जरूर शामिल थे जो बंगाल की अनुशीलन समिति के सदस्य थे, फिर भी पकडे़ श्री रोशन सिंह गये। चूकि श्री रोशन सिंह बमरौली डकैती में शामिल थे ही और इनके खिलाफ सारे [[साक्ष्य]] भी मिल गये थे अत: [[पुलिस]] ने सारी शक्ति श्री ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा़ दिलवाने में ही लगा दी और श्री केशव चक्रवर्ती को खो़जने का कोई प्रयास ही नहीं किया। सी०आई०डी० (CID) के कप्तान खानबहादुर तसद्दुक हुसैन &lt;br /&gt;
श्री [[राम प्रसाद &amp;#039;बिस्मिल&amp;#039;|राम प्रसाद बिस्मिल]] पर बार-बार यह दबाव डालते रहे कि श्री बिस्मिल किसी भी तरह अपने दल का सम्बन्ध [[बंगाल]] के अनुशीलन दल या [[रूस]] की बोल्शेविक पार्टी से बता दें परन्तु श्री बिस्मिल टस से मस न हुए। आखिरकार श्री रोशन सिंह को दफा १२० (बी) और १२१(ए) के तहत ५-५ वर्ष की बामशक्कत कैद और ३९६ के अन्तर्गत सजाये-मौत अर्थात् [[फाँसी]] की सजा दी गयी। इस फैसले के खिलाफ जैसे अन्य सभी ने उच्च न्यायालय, वायसराय व सम्राट के यहाँ अपील की थी वैसे ही श्री रोशन सिंह ने भी अपील की; परन्तु नतीजा वही निकला- ढाक के तीन पात।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== फाँसी से पूर्व लिखा खत ==&lt;br /&gt;
ठाकुर साहब ने ६ दिसम्बर १९२७ को [[इलाहाबाद]] स्थित मलाका (नैनी) [[कारागार|जेल]] की काल-कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था: &lt;br /&gt;
::&amp;quot;इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपको मोहब्बत (प्रेम) का बदला दे। आप मेरे लिये रंज (खेद) हरगिज (बिल्कुल) न करें। मेरी मौत खुशी का बाइस (कारण) होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली (पाप) करके अपने को बदनाम न करे और मरते वक्त ईश्वर की याद रहे;यही दो बातें होनी चाहिये और ईश्वर की कृपा से मेरे साथ ये दोनों बातें हैं। इसलिये मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की।&amp;quot; &lt;br /&gt;
पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अन्त में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा था:&lt;br /&gt;
::::&amp;#039;&amp;#039;जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
::::&amp;#039;&amp;#039;वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== फाँसी वाले दिन के हालात ==&lt;br /&gt;
[[फाँसी]] से पहली रात ठाकुर साहब कुछ घण्टे सोये फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन करते रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया कुछ देर गीता-पाठ में लगायी फिर पहरेदार से कहा-&amp;quot;चलो।&amp;quot; वह हैरत से देखने लगा यह कोई आदमी है या देवता! ठाकुर साहब ने अपनी काल-कोठरी को प्रणाम किया और [[श्रीमद्भगवद्गीता|गीता]] हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये। [[फाँसी]] के फन्दे को चूमा फिर ज़ोर से तीन बार &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;वन्दे मातरम्&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; का उद्घोष किया और वेद-मन्त्र - &amp;quot;ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव&amp;quot; - का जाप करते हुए फन्दे से झूल गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[इलाहाबाद]] में नैनी स्थित मलाका [[कारागार|जेल]] के फाटक पर हज़ारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और बाल-वृद्ध एकत्र थे ठाकुर साहब के अन्तिम दर्शन करने व उनकी अन्त्येष्टि में शामिल होने के लिये। जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाये वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया - &amp;quot;रोशन सिंह! अमर रहें!!&amp;quot; भारी जुलूस की शक्ल में शवयात्रा निकली और गंगा यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी जहाँ वैदिक रीति से उनका अन्तिम संस्कार किया गया। [[फाँसी]] के बाद ठाकुर साहब के चेहरे पर एक अद्भुत शान्ति दृष्टिगोचर हो रही थी। मूँछें वैसी की वैसी ही थीं बल्कि गर्व से कुछ ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थीं जैसा कि इस चित्र में भी दिख रहा है।&lt;br /&gt;
ठाकुर साहब को मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फाँसी दे दी गयी, कोई बात नहीं। क्योंकि उन्होंने तो जिन्दगी का सारा सुख उठा लिया, परन्तु श्री बिस्मिल, अशफाक जी और श्री लाहिड़ी जी जिन्होंने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा उनको इस बेरहम बरतानिया सरकार (British Government )ने फाँसी पर क्यों लटकाया? क्या उसके मन ज़रा भी दया का भाव नहीं आया?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इलाहाबाद में मूर्ति ==&lt;br /&gt;
[[इलाहाबाद]] की नैनी स्थित मलाका [[कारागार|जेल]] के फाँसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आवक्ष प्रतिमा [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारतीय स्वतंत्रता संग्राम]] में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगायी गयी है। वर्तमान समय में इस स्थान पर अब एक अस्पताल स्थापित हो चुका है।जिसका नाम स्वरूप रानी अस्पताल है। स्वरुप रानी अस्पताल के मुख्य गेट के पास उनकी प्रतिमा स्थापित है मूर्ति के नीचे ठाकुर साहब की कही गयी ये पंक्तियाँ भी अंकित हैं -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;ज़िन्दगी ज़िन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;वरना कितने ही यहाँ रोज़ फ़ना होते हैं।&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
* [[मदनलाल वर्मा &amp;#039;क्रान्त&amp;#039;|डॉ॰ मदनलाल वर्मा &amp;#039;क्रान्त&amp;#039;]]&amp;#039;&amp;#039;स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास&amp;#039;&amp;#039; (3 खण्डों में) [[२००६|2006]] &amp;#039;&amp;#039;प्रवीण प्रकाशन&amp;#039;&amp;#039; [[नई दिल्ली]] ISBN 81-7783-122-4&lt;br /&gt;
* विद्यार्णव शर्मा &amp;#039;&amp;#039;युग के देवता : बिस्मिल और अशफाक&amp;#039;&amp;#039; [[२००४|2004]] &amp;#039;&amp;#039;प्रवीण प्रकाशन&amp;#039;&amp;#039; [[दिल्ली]] ISBN 81-7783-078-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[राम प्रसाद &amp;#039;बिस्मिल&amp;#039;|राम प्रसाद बिस्मिल]]&lt;br /&gt;
* [[चन्द्रशेखर आज़ाद|चन्द्रशेखर आजाद]]&lt;br /&gt;
* [[लाला हरदयाल]]&lt;br /&gt;
* [[भगत सिंह]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20140804095008/http://www.anilverma.in/ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ठाकुर रोशनसिंह&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; : उपेक्षित है अंतिम निशाँ]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{भारतीय स्वतंत्रता संग्राम}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:इतिहास]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय क्रांतिकारी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी: उत्तर प्रदेश के लोग ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:1892 में जन्मे लोग]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:१९२७ में निधन]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>223.235.192.78</name></author>
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