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	<title>विष्णु दिगंबर पलुस्कर - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2020-09-10T03:43:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Vishnu Digambar Paluskar.jpg|right|thumb|200px|विष्णु दिगंबर पलुस्कर]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;V d पलुस्कर&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (१८ अगस्त १८७२ - २१ अगस्त १९३१) [[हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत]] के क्षेत्र में एक विशिष्ट प्रतिभा थे, जिन्होंने भारतीय संगीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वे भारतीय समाज मे&lt;br /&gt;
और संगीतकार की उच्च प्रतिष्ठा के पुनरुद्धारक, समर्थ संगीतगुरु, अप्रतिम कंठस्वर एवं गायनकौशल के घनी भक्तहृदय गायक। पलुस्कर ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में [[महात्मा गांधी]] की सभाओं सहित विभिन्न मंचों पर [[रामधुन]] गाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाया। पलुस्कर ने [[लाहौर]] में [[गान्धर्व महाविद्यालय|गान्धर्व विद्यालय]] की स्थापना कर भारतीय संगीत को एक विशिष्ट स्थान दिया। इसके अलावा उन्होंने अपने समय की तमाम धुनों की स्वरलिपियों को संग्रहित कर आधुनिक पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समीपवर्ती एक कस्बे में दत्तात्रेय जंयती के दौरान उनकी आंख के समीप पटाखा फटने के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी। आंखों की रोशनी जाने के बाद उपचार के लिए वह समीप के मिरज राज्य चले गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ग्वालियर घराना|ग्वालियर घराने]] में शिक्षित पं॰ [[बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर]] से [[मिरज]] में संगीत की शिक्षा आरंभ की। बारह वर्ष तक संगीत की विधिवत तालीम हासिल करने के बाद पलुस्कर के अपने गुरु से संबंध खराब हो गए। बारह वर्ष कठोर तप:साधना से संगीत शिक्षाक्रम पूर्ण करके सन्‌ 1896 में समाज की कुत्या और अवहेलना एवं संगीतगुरुओं की संकीर्णता से भारतीय संगीत के उद्धार के लिए दृढ़ संकल्प सहित यात्रा आरंभ की। इस दौरान उन्होंने बड़ौदा और ग्वालियर की यात्रा की। [[गिरनार]] में दत्तशिखर पर एक अलौकिक पुरुष के संकेतानुसार [[लाहौर]] का सर्वप्रथम कार्यक्षेत्र चुना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनार्जन के लिए उन्होंने संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम भी किए। पलुस्कर संभवत: पहले ऐसे शास्त्रीय गायक हैं, जिन्होंने संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए। बाद में पलुस्कर [[मथुरा]] आए और उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बंदिशें समझने के लिए [[बृज भाषा|ब्रज भाषा]] सीखी। बंदिशें अधिकतर ब्रजभाषा में ही लिखी गई हैं। इसके अलावा उन्होंने मथुरा में [[ध्रुपद शैली]] का गायन भी सीखा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पलुस्कर मथुरा के बाद [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] घूमते हुए लाहौर पहुंचे और 1901 में उन्होंने गांधर्व विद्यालय की स्थापना की। इस स्कूल के जरिए उन्होंने कई संगीत विभूतियों को तैयार किया। हालांकि स्कूल चलाने के लिए उन्हें बाजार से कर्ज लेना पड़ा। बाद में उन्होंने [[मुम्बई|मुंबई]] में अपना स्कूल स्थापित किया। कुछ वर्ष बाद आर्थिक कारणों से यह स्कूल नहीं चल पाया और इसके कारण पलुस्कर की संपत्ति भी जब्त हो गई। पलुस्कर के शिष्यों में [[पंडित ओंकारनाथ ठाकुर]], [[पंडित विनायक राव पटवर्धन]], [[पंडित नारायण राव]] और उनके पुत्र [[डी.वी. पलुस्कर]] जैसे दिग्गज गायक शामिल थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने तीन खंडों में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संगीत बाल प्रकाश&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; नामक पुस्तक लिखी और 18 खंडों में रागों की स्वरलिपियों को संग्रहित किया। संगीत के इस महान साधक का निधन 21 अगस्त 1931 को हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संगीत-शिक्षा-प्रसार ==&lt;br /&gt;
सन्‌ 1901 में लाहौर में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना, विद्यार्थियों के प्रोत्साहनार्थ छात्रवृत्तियों की उदार व्यवस्था। समान्य विद्यार्थी वर्ग के अतिरिक्त उत्तम शिक्षकों और निर्व्यसन श्रेष्ठ कलाकारों के निर्माणार्थ &amp;#039;उपदेशक वर्ग&amp;#039; नाम से अंतेवासी विद्यार्थियों का विशिष्ट वर्ग बनाया, जिसमें विपुल संख्यक शिष्यों के भोजन, बल, निवासादि का संपूर्ण व्ययभार स्वयं वहन किया। 1909 के आसपास बंबई में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। बाद में नासिक जाकर वहाँ श्री रामनाम-आधार-आश्रम की स्थापना एवं शिक्षाकार्य का संचालन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जनसमूह में संगीतप्रचार ==&lt;br /&gt;
&amp;#039;रघुपति राघव राजा राम&amp;#039; का सामूहिक कीर्तन, रामचरितमानस का संगीतमय प्रवचन, कांग्रेस अधिवेशनों में &amp;#039;वंदेमातरम्‌&amp;#039; एवं राष्ट्रीय भावनात्मक अन्य गीतों का गायन, धार्मिक तथा सामाजिक मेलों, उत्सवों में विशेष संगीत कार्यक्रमों की प्रस्तुति, सशुल्क एवं नि:शुल्क (उदा. जालंधर का हरवल्लभ मेला) संगीत परिषदों का आयोजन इत्यादि द्वारा विभिन्न प्रदेशों में शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने का सफल अभियान चलाया। तुलसी, कबीर, सूर आदि भक्त कवियों के पदों को विभिन्न रागों में कर श्रृंगार-रस-प्रधान ठुमरी शैली के समकक्ष भजन शैली की शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठा की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संगीतलिपि एवं प्रकाशन कार्य ==&lt;br /&gt;
सन्‌ 1900 के लगभग सर्वांग पूर्ण संगीतलिपि का निर्माण किया। निम्नांकित प्राय: 70 संगीत ग्रंथों का लेखन प्रकाशन (सन्‌ 1902-1930)- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(1) रागप्रवेश (19 भाग), (2) संगीत बालप्रकाश (4 भाग), (3) संगीत बालबोध (5 भाग), &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(4) बिहाग, कल्याण, भूपाली, मालकंस रागों का संपूर्ण गायकी सहित 5 पुस्तकें, (5) स्वल्पालाप गायन (4 भाग), &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(6) टप्पा गायन, (7) होरी गायन, (8) मृदंग-तवला-पाठ्यपुस्तक (9) सितार पाठ्यपुस्तक (2 भाग), &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(10) भजनामृत लहरी (5 भाग) (11) रामनामावली, (12) संगीतनामस्मरणी, (13) भक्तप्रेमलहरी, (14) भजनावली, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(15) रामगुणगान (मराठी), (16) बंगाली गायन, (17) कर्णाटक संगीत, (18) बालादय संगीत (हिंदी 2 भाग, मराठी 1 भाग), &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(19) व्यायाम के साथ संगीत (2 भाग), (20) महिला संगीत (2 भाग), (21) राष्ट्रीय संगीत, (22) भारतीय संगीत लेखन पद्धति, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(23) संगीत तत्त्वदर्शक, (24) अंकित अलंकार (25) नारदीय शिक्षा (भाषा टीका सहित), &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(26) 1918-1920 में आयोजित संगीत परिषदों की चार रिपोर्टें। &amp;#039;संगीत सारामृत प्रवाह&amp;#039; नामक मासिक पत्र का सन्‌ 1805 से दशाधिक वर्ष तक नियमित प्रकाशन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पर्यटन और विविध प्रवृत्तियाँ ==&lt;br /&gt;
संगीतप्रचार और महफिली गायन के निमित्त पूरे भारत का व्यापक पर्यटन। 1930 में नेपालयात्रा। वैज्ञानिक रीति से वाद्ययंत्र निर्माणार्थ अपना &amp;#039;वर्कशॉप&amp;#039; खोला और वाद्यप्रदर्शनियाँ आयोजित की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पारिवारिक प्रसंग ==&lt;br /&gt;
1890 में श्रीमती रमाबाई (शिष्यवर्ग की &amp;#039;आईसाहब&amp;#039;) से विवाह। ग्यारह संतान शैशव में कालकवलित, 12वीं संतान श्रीदत्तात्रेय को दस वर्ष का छोड़ आपका निधन। दत्तात्रेय जी डी.बी. पलुस्कर के नाम से विख्यात परम लोकप्रिय गायक बने। 1955 में उनका अकाल निधन। &amp;#039;आई साहब&amp;#039; का भी 1957 में निधन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रमुख शिष्य ==&lt;br /&gt;
सर्वश्री [[ओंकारनाथ ठाकुर]], [[विनायकराव पटवर्धन]], [[नारायणराव व्यास]], ग.रा. गोखले, बा.र. देवधर, वामनराव ठकार, शंकर श्रीपाद वोडस, विष्णुदास शिराली, स्व. वामनराव पाध्ये, स्व. नारायण ये, स्वरे, स्व. शंकरराव व्यास इत्यादि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[भारत में संगीत-शिक्षण]]&lt;br /&gt;
*[[गान्धर्व महाविद्यालय]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20140106040854/http://www.livehindustan.com/news/edu/naidishaye/article1-story-269-276-377836.html गन्धर्व संगीत महाविद्यालय: संगीत का महा मंदिर]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संगीतकार]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय संगीत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:१९३१ में निधन]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>171.76.181.92</name></author>
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