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	<title>वैदिक धर्म - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;Madhusmitabishoi ११ जुलाई २०२१ को १७:३४ बजे</title>
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		<updated>2021-07-11T17:34:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Samuhik Yagya.jpg|thumb|230px|वैदिक रीति से होता यज्ञ]]&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म सूचना मंजूषा}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ऐतिहासिक वैदिक धर्म&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (जिसे वैदिकवाद, वेदवाद या &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;प्राचीन हिंदू धर्म&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के रूप में भी जाना जाता है), और बाद में [[ब्राह्मणवाद]] ने उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब और पश्चिमी गंगा) के कुछ भारतीय-आर्य लोगों के बीच धार्मिक विचारों और प्रथाओं का गठन किया। वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) के दौरान प्राचीन भारत का मैदान। ये विचार और व्यवहार वैदिक ग्रंथों में पाए जाते हैं, और कुछ वैदिक अनुष्ठान आज भी प्रचलित हैं। यह उन प्रमुख परंपराओं में से एक है, जो हिंदू धर्म को आकार देती हैं, हालांकि वर्तमान हिंदू धर्म ऐतिहासिक वैदिक धर्म से अलग है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक धर्म का विकास प्रारंभिक वैदिक काल (1500–1100 ईसा पूर्व) के दौरान हुआ था, लेकिन इसकी जड़ें यूरेशियन स्टेपे सिंटश्टा संस्कृति (2200-1800 ईसा पूर्व) और उसके बाद के मध्य एशियाई ऐंड्रोनोवो संस्कृति (2000-900 ईसा पूर्व) और संभवतः [[सिंधु घाटी सभ्यता|सिंधु घाटी की सभ्यता]] (2600-1900 ईसा पूर्व) में भी हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web|url=https://scroll.in/article/738404/the-old-vedic-language-had-its-origin-outside-the-subcontinent-but-not-sanskrit|title=&amp;#039;The Old Vedic language had its origin outside the subcontinent. But not Sanskrit.&amp;#039;}}&amp;lt;/ref&amp;gt; यह मध्य एशियाई भारत-आर्यों के धर्म का एक सम्मिश्रण था, जो खुद &amp;quot;पुराने मध्य एशियाई और नए भारत-यूरोपीय तत्वों का एक समन्वित मिश्रण&amp;quot; था, जिसने &amp;quot;विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं&amp;quot; से उधार लिया था। बैक्ट्रिया-मैरेजा संस्कृति;  और [[सिंधु घाटी सभ्यता|सिंधु घाटी के हड़प्पा संस्कृति]] के अवशेष।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक काल के दौरान (1100-500 ईसा पूर्व) ब्राह्मणवाद वैदिक धर्म से विकसित हुआ, जो कुरु-पंचला क्षेत्र की विचारधारा के रूप में विकसित हुआ, जो कुरु-पंचम युग के बाद एक व्यापक क्षेत्र में विस्तारित हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधुनिक [[आर्य समाज]] इसी धार्मिक व्यवस्था पर आधारित हैं। [[वैदिक संस्कृत]] में लिखे चार [[वेद]] इसकी धार्मिक किताबें हैं। वेदिक मान्यता के अनुसार [[ऋग्वेद]] और अन्य वेदों के मन्त्र परमेश्वर अथवा [[परमात्मा]] द्वारा ऋषियों को प्रकट किये गए थे। इसलिए वेदों को &amp;#039;[[श्रुति]]&amp;#039; यानि, &amp;#039;जो सुना गया है&amp;#039; कहा जाता है, जबकि श्रुति ग्रन्थौ के अनुशरण कर वेदज्ञ द्वारा रचा गया वेदांगादि सूत्र ग्रन्थ स्मृति कहलाता है। जिसके नीब पर वैदिक सनातन धर्म और वैदिक आर्यसमाजी आदि सभी का व्यवहार का आधार रहा है। कहा जाता है। वेदों को &amp;#039;अपौरुषय&amp;#039; यानि &amp;#039;जीवपुरुषकृत नहीं&amp;#039; भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है कि उनकी कृति दिव्य है, अतः श्रुति मानवसम्बद्ध दोष मुक्त है। &amp;quot;प्राचीन वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म&amp;quot; का सारा धार्मिक व्यवहार विभन्न वेद शाखा सम्बद्ध कल्पसूत्र, श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र आदि ग्रन्थौं के आधार में चलता है। इसके अलावा अर्वाचीन वैदिक ([[आर्य समाज]]) केवल वेदों के संहिताखण्ड को ही वेद स्वीकारते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक धर्म और सभ्यता की जड़ में सन्सार के सभी सभ्यता किसी न किसी रूपमे दिखाई देता है। [[आदिम हिन्द-ईरानी भाषा|आदिम हिन्द-अवेस्ता धर्म]] और उस से भी प्राचीन [[आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा|आदिम हिन्द-यूरोपीय धर्म]] तक पहुँचती हैं, जिनके कारण वैदिक धर्म [[यूरोप]], [[मध्य एशिया]]/[[ईरान]] के प्राचीन धर्मों में भी किसी-न-किसी रूप में मान्य थे, जैसे यजञमे जिनका आदर कीया जाता है उन शिव(रुद्र) या बुद्ध और पार्वती । इसी तरह बहुत से वैदिकशब्दों के प्रभाव [[सजातीय शब्द]] [[अवेस्ता]]धर्म और प्राचीन [[यूरोप]] धर्मों में पाए जाते हैं, जैसे कि सोम (फ़ारसी: होम), यज्ञ (फ़ारसी: यस्न),&lt;br /&gt;
पितर- फादर,मातर-मादर,भ्रातर-ब्रदर स्वासार-स्विष्टर नक्त-नाइट् इत्यादि।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/hindu-religion/vedic-religion-107062500022_1.html|title=वैदिक धर्म क्या कहता है {{!}} Vedic religion|last=WD|website=hindi.webdunia.com|language=hi|access-date=2020-06-07|archive-url=https://web.archive.org/web/20190729084937/http://hindi.webdunia.com/hindu-religion/vedic-religion-107062500022_1.html|archive-date=29 जुलाई 2019|url-status=dead}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
== आत्मा की एकता ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक धर्म में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। जो आदमी इस तत्व को समझ लेगा, वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि &amp;#039;घट-घट में तोरा साँईं रमत हैं!&amp;#039; वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;वैदिक &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों में हमें बहुत से प्राकृति की स्तुति और प्रार्थना के मंत्र मिलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== दीक्षा और तप ==&lt;br /&gt;
सत्य की साधना के लिए दीक्षा भी चाहिए और तपस्या भी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में कहा है :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्‌।&lt;br /&gt;
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्ध्या सत्यमाप्यते॥&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा से दक्षिणा, दक्षिणा से श्रद्धा और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== तप का अर्थ ===&lt;br /&gt;
इंद्रियों का संयम। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए तप करना ही पड़ता है। धर्म को पाने के लिए भी तप करना जरूरी है। ब्रह्मचर्य-जीवन में जिस तरह तपस्या करनी पड़ती है, उसी तरह आगे भी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== ब्रह्मयज्ञ ===&lt;br /&gt;
ब्रह्मयज्ञ का अर्थ है गुरुमुख से अनुवचन किया हुआ वेद-श्रुति (मन्त्रब्राह्मणात्मक) वेद भाग को नित्य विधिवत् पाठ करना। पाठ में असमर्थ से वैदिक मंत्रों का जप करना भी अनुकल्प विधि से ब्रह्मयज्ञ ही है। ब्राह्मण वेदों के जिस यज्ञ-अनुष्ठान का प्रसंग वाला भाग नित्य पाठ करता है उसी यज्ञ का फल प्राप्त करता है। प्राचीन काल में जिसने वेदानुवचन किया है वह प्रतिदिन शुक्ल पक्ष में मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदभाग और कृष्ण पक्ष में  वेदांग-कल्प, व्याकरण, निरुक्त, शिक्षा, छन्द और ज्योतिष पाठ करता था। प्रार्थना और यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाला यजमान और पुरोहित- ऋत्विक् वा आचार्य सदाचारी (वेदोक्त वर्णाश्रमधर्मका पालक) होना चाहिए नहीं तो उसकी पूजा-प्रार्थना वा यज्ञ का कोई अर्थ नहीं है। पुराण मे कहा भी है- आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः यद्यप्यधीता सहषड्भिरंगैः सदाचारी लोग ही तरते हैं, दुराचारी नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद में कहा है :-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
* [[ऋत]]&lt;br /&gt;
* [[वैदिक सभ्यता]]&lt;br /&gt;
* डीएन झा&lt;br /&gt;
* [[वैदिक संस्कृत]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची|2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियां ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20130817065902/http://hindi.webduniya.com/religion/religion/hindu/0706/25/1070625022_1.htm वेब दुनिया पर वैदिक धर्म]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:वेद]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:उपनिषद]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:स्मृति]]&lt;br /&gt;
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