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	<title>वैदिक शाखाएँ - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>106.220.90.30: /* शुक्ल यजुर्वेद */</title>
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		<updated>2021-05-22T17:10:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;शुक्ल यजुर्वेद&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;मूलवस्तु से निकले हुए विभाग अथवा अंग को शाखा कहते हैं - जैसे वृक्ष की शाखा। [[वैदिक साहित्य]] के संदर्भ में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;वैदिक शाखा&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; शब्द से उन विशेष परंपराओं का बोध होता है जो गुरु-शिष्य-प्रणाली, देशविभाग, उच्चारण की भिन्नता, काल एवं विशेष परिस्थितिजन्य कारणों से चार वेदों के भिन्न-भिन्न पाटों के रूप में विकसित हुई। शाखाओं को कभी कभी &amp;#039;चरण&amp;#039; भी कहा जाता है। इन शाखाओं का विवरण [[शौनक]] के [[चरणव्यूह]] और [[पुराण|पुराणों]] में विशद रूप से मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक शाखाओं की संख्याएँ सब जगह एक रूप में दी गई हों, ऐसा नहीं। फिर, विभिन्न स्थलों में वर्णित सभी वैदिक शाखाएँ आजकल उपलब्ध भी नहीं है। [[पतञ्जलि|पतंजलि]] ने [[ऋग्वेद]] की 21, [[यजुर्वेद]] की 100, [[सामवेद संहिता|सामवेद]] की 1000 तथा [[अथर्ववेद संहिता|अथर्ववेद]] की 9 शाखाएँ बताई हैं। किंतु [[चरणव्यूह]] में उल्लिखित संख्याएँ इनसे भिन्न हैं। चरणव्यूह से [[ऋग्वेद]] की पाँच शाखाएँ ज्ञात होती हैं - शाकलायन, बाष्कलायन, आश्वलायन, शांखायन और मांडूकायन। पुराणों से उसकी केवल तीन ही शाखाएँ ज्ञात होती हैं - शाकलायन, बाष्कलायन और मांडूकायन। यजुर्वेद की दो शाखायें ज्ञात होती है - शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद की 85 शाखाओं की चर्चा मिलती है, किंतु आज उनमें से केवल ये चार ही उपलब्ध हैं- [[तैत्तिरीय शाखा|तैत्तिरीय]], मैत्रायणी, कठ और कपिष्ठकल-कठ शाखा। किंतु कपिष्ठलशाखा कठ की ही एक उपशाखा है। कठशाखा पंजाब में तथा तैत्तिरीय और मैत्रायणी शाखाएँ क्रमश: [[नर्मदा नदी]] के निचले प्रदेशों एवं दक्षिण भारत में प्रचलित हुईं। वहाँ उनकी और भी उपशाखाएँ हो गईं। [[सामवेद संहिता|सामवेद]] की शाखासंख्या पुराणों में १००० बताई गई है। [[पतञ्जलि|पतंजलि]] ने भी सामवेद को &amp;#039;सहस्रवर्त्मा&amp;#039; कहा है। [[भागवत पुराण|भागवत]], [[विष्णु पुराण|विष्णु]] और [[वायु पुराण|वायुपुराणों]] के अनुसार [[वेदव्यास]] के शिष्य [[जैमिनि|जैमिनी]] हुए। उन्हीं के वंश में सुकर्मा हुए, जिनके दो शिष्य थे - एक हिरण्यनाभ कौसल्य, जो कोसल के राजा थे और दूसरे पौष्पंजि। कोसल की स्थिति पूर्वी (वास्तव में उत्तर पूर्वी) भारत में थी और इस कारण हिरण्यनाभ से चलनेवाली 500 शाखाएँ &amp;#039;प्राच्य&amp;#039; कहलाई। पौष्यंजि से चलनेवाली 500 शाखाएँ &amp;#039;उदीच्य&amp;#039; कहलाई। [[अथर्ववेद संहिता|अथर्ववेद]] की नौ शाखाएँ मिलती हैं। उनमें नाम हैं - पिप्पलाद, स्तौद, मौद, शौनक, जाजल, जलद, ब्रह्मवद, देवदर्श तथा चारणवैद्य। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध शाखाएँ हैं पिप्पलाद और शौनक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शाखासमूह==&lt;br /&gt;
[[Image:Map of Vedic India.png|thumb|410px|प्राचीन लौहयुगीय [[वैदिक भारत]] का मानचित्र, विटजेल, १९८९। वैदिक शाखाओं की स्थिति &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;हरे रंग में&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; दिखाई गयीं हैं।]]&lt;br /&gt;
===ऋग्वेद===&lt;br /&gt;
शौनक के &amp;#039;&amp;#039;चरणव्यूह&amp;#039;&amp;#039; में [[ऋग्वेद]] की पाँच शाखाओं की तालिका है। ये शाखायें ये हैं- शाकल, बाष्कल, अश्वलायन, शांखायन और माण्डूकायन। वर्तमान समय में इनमें से शाकल और बाष्कल - दो शाखायें प्रचलित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद की बाष्कल शाखा में [[खिलानि]] हैं, जो शाकल शाखा में नहीं हैं। फिर भी वर्तमान में [[पुणे]] में सुरक्षित शाकल शाखा की एक कश्मीरी पाण्डुलिपि में खिलानि पाया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शाकल शाखा में [[ऐतरेय ब्राह्मण]] एवं बाष्कल शाखा में [[कौषीतकी ब्राह्मण]] बचा हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अश्वलायन शाखा का सूत्र साहित्य मिला है जिसमें श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र तथा इनकी [[गर्ग्य नारायण]] द्वारा रचित वृत्ति है। गर्ग्य नारायण की वृत्ति ११वीं शताब्दी में देवस्वामी द्वारा रचित एक विषद भाष्य पर आधारित है। &amp;lt;ref&amp;gt;&amp;#039;&amp;#039;Catalogue of Sanskrit, Pali, and Prakrit Books in the British Museum&amp;#039;&amp;#039; (1876) [http://archive.org/stream/cataloguesanskr03manugoog#page/n20/mode/2up p. 9] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160317043705/http://archive.org/stream/cataloguesanskr03manugoog#page/n20/mode/2up |date=17 मार्च 2016 }}.&lt;br /&gt;
B.K. Sastry, [http://yabaluri.org/TRIVENI/CDWEB/reviewsjul83.htm review] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160314084413/http://yabaluri.org/triveni/cdweb/reviewsjul83.htm |date=14 मार्च 2016 }} of K. P. Aithal (ed.), &amp;#039;&amp;#039;Asvalayana Grihya Sutra Bhashyam of Devasvamin&amp;#039;&amp;#039;, 1983.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===यजुर्वेद===&lt;br /&gt;
*&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शुक्ल यजुर्वेद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;: वाजसनेयी संहिता माध्यंदिन, वाजसनेयी संहिता काण्व: [[शतपथ ब्राह्मण]]।&lt;br /&gt;
*&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कृष्ण यजुर्वेद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;: तैत्तिरीय संहिता ([[तैत्तिरीयब्राह्मण|तैत्तिरीय ब्राह्मण]] नामक एक अतिरिक्त ब्राह्मण के साथ), मैत्रायणी संहिता, चरक-कठ संहिता, कपिष्ठल-कठ संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शुक्ल यजुर्वेद====&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|- style=&amp;quot;background:#ccc;&amp;quot;&lt;br /&gt;
! शाखा&lt;br /&gt;
! संहिता&lt;br /&gt;
! ब्राह्मण&lt;br /&gt;
! आरण्यक&lt;br /&gt;
! उपनिषद्‌&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा|माध्यंदिन वाजसनेयि शाखा (वाजसनेयी संहिता माध्यंदिन)]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| वर्तमान समय में उत्तर भारत के सभी ब्राह्मण और [[देशस्थ ब्राह्मण|देशस्थ ब्राह्मणों]] द्वारा पठित&lt;br /&gt;
| माध्यंदिन शतपथ (शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेयी माध्यंदिन)&lt;br /&gt;
| शतपथ १४.१-८ में रक्षित (स्वरचिह्नों के साथ)।&lt;br /&gt;
| [[बृहदारण्यक उपनिषद्‌]] = शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेयी माध्यंदिन १४.३-८, (उच्चारणभंग सह), [[ईश उपनिषद्‌|ईशावास्योपनिषद]] = वाजसनेयी संहिता माध्यंदिन ४०&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[काण्व वाजसनेयि शाखा|काण्व]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[काण्व वाजसनेयि शाखा|(वाजसनेयी संहिता काण्व)]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| बर्तमान समय में [[उत्कल ब्राह्मण]], [[कन्नड़ ब्राह्मण]], [[कड़डे ब्राह्मण|कऱ्हाडे ब्राह्मण]] और कुछ [[ऐयर]] ब्राह्मणों द्बारा पठित।&lt;br /&gt;
| काण्व शतपथ (शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेयी काण्व) (माध्यंदिन से पृथक)&lt;br /&gt;
| शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेयी काण्व के १६ अध्याय में रक्षित&lt;br /&gt;
| [[बृहदारण्यक उपनिषद्‌]] = शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेयी काण्व (स्वरचिह्नों के साथ), [[ईश उपनिषद्‌|ईशावास्य उपनिषद्‌]] = शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेयी काण्व ४०&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कात्यायन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====कृष्ण यजुर्वेद====&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|- style=&amp;quot;background:#ccc;&amp;quot;&lt;br /&gt;
! शाखा&lt;br /&gt;
! संहिता&lt;br /&gt;
! ब्राह्मण&lt;br /&gt;
! आरण्यक&lt;br /&gt;
! उपनिषद्‌&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[तैत्तिरीय शाखा|तैत्तिरीय]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
| तैत्तिरीय संहिता, समग्र दक्षिण भारत और् [[कोंकण]] में प्रचलित&lt;br /&gt;
| [[तैत्तिरीयब्राह्मण|तैत्तिरीय ब्राह्मण]] और बधूला ब्राह्मण (बधूला श्रौत्रशास्त्र के अन्तर्गत) &lt;br /&gt;
| [[तैत्तिरीय आरण्यक]] &lt;br /&gt;
| [[तैत्तिरीय उपनिषद्‌]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मैत्रेयानी&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
| मैत्रेयानी संहिता, [[नासिक]] के कुछ ब्राह्मण पाठ करते हैं&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| व्यवहारतः उपनिषद्‌ के समान&lt;br /&gt;
| [[मैत्रेयानीय उपनिषद्‌]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;चरक-कठ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| [[कठ आरण्यक]] (प्रायः सम्पूर्ण ग्रन्थ एकमात्र [[पाण्डुलिपि]] के रूप में मिलता है)&lt;br /&gt;
| [[कठक उपनिषद्‌]], कठ-शिक्षा उपनिषद्‌&amp;lt;ref&amp;gt;a lost Upanishad reconstructed by [[Michael Witzel]] as having been very similar in content to the [[Taittiriya Upanishad]], chapter 1. M. Witzel, &amp;#039;&amp;#039;An unknown Upanisad of the Krsna Yajurveda: The Katha-Siksa-Upanisad.&amp;#039;&amp;#039; Journal of the Nepal Research Centre, Vol. 1, Wiesbaden-Kathmandu 1977, pp. 135&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कपिष्ठल&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
| कपिष्ठल-कठ संहिता (खण्डित पाण्डुलिपि, केवल प्रथम भाग स्वरचिह्नों सहित), [[रघु वीर|रघुवीर]] द्वारा सम्पादित (बिना स्वरचिह्नों के)&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===सामवेद===&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|- style=&amp;quot;background:#ccc;&amp;quot;&lt;br /&gt;
! शाखा&lt;br /&gt;
! संहिता&lt;br /&gt;
! ब्राह्मण&lt;br /&gt;
! आरण्यक&lt;br /&gt;
! उपनिषद्‌&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कौठुम&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| पूरे उत्तर तथा दक्षिण भारत में पठित&lt;br /&gt;
| ८ ब्राह्मण (स्वरचिह्न रहित)&lt;br /&gt;
| एक भी नहीं। संहिता में ही एक आरण्यक है।&lt;br /&gt;
| [[छान्दोग्य उपनिषद्‌]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रणयनीय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| संहिता की पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध ; गोकर्ण और देशस्थ ब्राह्मणों द्वारा पठित&lt;br /&gt;
| कौठुम शाखा के समान। कुछ-कुछ अन्तर है।&lt;br /&gt;
| एक भी नहीं। संहिता में ही एक आरण्यक है।&lt;br /&gt;
| कौठुम शाखा के समान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जैमिनीय/तलबकार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| प्रकाशित ब्राह्मण (स्वरचिह्न रहित) – जैमिनीय ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| [[केन उपनिषद्‌]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शात्यायन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अथर्ववेद===&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|- style=&amp;quot;background:#ccc;&amp;quot;&lt;br /&gt;
! शाखा&lt;br /&gt;
! संहिता&lt;br /&gt;
! ब्राह्मण&lt;br /&gt;
! आरण्यक&lt;br /&gt;
! उपनिषद्‌&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शौनक&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| अथर्ववेद संहिता, समग्र उत्तर और दक्षिण भारत में सम्पादित तथा पठित।&lt;br /&gt;
| [[गोपथ ब्राह्मण]] के असम्पूर्ण अंश (प्रकाशित, स्वरचिह्न रहित)&lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
| [[मुण्डक उपनिषद्‌]] (?) प्रकाशित&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पैप्पलाद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
| पैप्पलाद अथर्ववेद। उत्कल ब्राह्मणों द्वारा केवल संहिता पाठ। अन्यत्र दो पाण्डुलिपियाँ मिली हैं: कश्मीरी (अधिकांशतः सम्पादित) तथा ओड़िया (आंशिक सम्पादित, स्वरचिह्न रहित)&lt;br /&gt;
| विलुप्त, गोपथ ब्राह्मण के समान&lt;br /&gt;
| -&lt;br /&gt;
| [[प्रश्न उपनिषद्‌]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[तैत्तिरीय शाखा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20160917033232/https://archive.org/details/caranavyuha महर्षि शौनकोक्तं चरणसूत्रम्] (भाष्य सहितम)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:वेद]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>106.220.90.30</name></author>
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