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	<title>शालीग्राम - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>2409:4051:283:DDE1:1006:3F1D:A8B8:44B6 २८ जुलाई २०२१ को १३:५२ बजे</title>
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		<updated>2021-07-28T13:52:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[File:Rare stones called saligram.JPG|thumb|शालीग्राम]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शालीग्राम&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक प्रकार का जीवाश्म पत्थर है, जिसका प्रयोग परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में भगवान का आह्वान करने के लिए किया जाता है। शालीग्राम आमतौर पर पवित्र नदी की तली या किनारों से एकत्र किया जाता है। [[शिव]] भक्त पूजा करने के लिए शिव लिंग के रूप में लगभग गोल या अंडाकार शालिग्राम का उपयोग करते हैं। जिस प्रकार भगवान [[शिव]] का प्रतिमाविहीन रूप [[शिवलिंग]] हैं उसी प्रकार भगवान [[विष्णु]] का प्रतिमाविहीन रूप शालिग्राम हैं ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैष्णव (हिन्दू) पवित्र नदी गंडकी में पाया जाने वाला एक गोलाकार, आमतौर पर काले रंग के एमोनोइड ([[:en:Ammonoid]]) जीवाश्म को विष्णु के प्रतिनिधि के रूप में  उपयोग करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालीग्राम को प्रायः &amp;#039;शिला&amp;#039; कहा जाता है। शिला शालिग्राम का छोटा नाम है जिसका अर्थ &amp;quot;पत्थर&amp;quot; होता है। शालीग्राम [[विष्णु]] का एक कम प्रसिद्ध नाम है। इस नाम की उत्पत्ति के सबूत नेपाल के एक दूरदराज़ के गाँव से मिलते है जहां विष्णु को &amp;#039;&amp;#039;शालीग्रामम्&amp;#039;&amp;#039; के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में शालीग्राम को सालग्राम के रूप में जाना जाता है। शालीग्राम का सम्बन्ध सालग्राम नामक गाँव से भी है जो गंडकी नामक नदी के किनारे पर स्थित है तथा यहां से ये पवित्र पत्थर भी मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://www.rudrakshanepal.com/page-43-Astrology_and_Shaligram |title=:Shaligram and astrology |access-date=16 सितंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150924092602/http://www.rudrakshanepal.com/page-43-Astrology_and_Shaligram |archive-date=24 सितंबर 2015 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद्मपुराण के अनुसार - &lt;br /&gt;
गण्डकी अर्थात नारायणी नदी के एक प्रदेश में शालिग्राम स्थल नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; वहाँ से निकलनेवाले पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। फिर यदि उसका पूजन किया जाय, तब तो उसके फल के विषय में कहना ही क्या है; वह भगवान के समीप पहुँचाने वाला है। बहुत जन्मों के पुण्य से यदि कभी गोष्पद के चिह्न से युक्त [[श्रीकृष्ण]] शिला प्राप्त हो जाय तो उसी के पूजन से मनुष्य के पुनर्जन्म की समाप्ति हो जाती है। पहले शालिग्राम-शिला की परीक्षा करनी चाहिये; यदि वह काली और चिकनी हो तो उत्तम है। यदि उसकी कालिमा कुछ कम हो तो वह मध्यम श्रेणी की मानी गयी है। और यदि उसमें दूसरे किसी रंग का सम्मिश्रण हो तो वह मिश्रित फल प्रदान करने वाली होती है। जैसे सदा काठ के भीतर छिपी हुई आग मन्थन करने से प्रकट होती है, उसी प्रकार भगवान विष्णु सर्वत्र व्याप्त होने पर भी शालिग्राम शिला में विशेष रूप से अभिव्यक्त होते हैं। जो प्रतिदिन द्वारका की शिला-गोमती चक्र से युक्त बारह शालिग्राम मूर्तियों का पूजन करता है, वह वैकुण्ठ लोक में प्रतिष्ठित होता है। जो मनुष्य शालिग्राम-शिला के भीतर गुफ़ा का दर्शन करता है, उसके पितर तृप्त होकर कल्प के अन्ततक स्वर्ग में निवास करते हैं। जहाँ द्वारकापुरी की शिला- अर्थात गोमती चक्र रहता है, वह स्थान वैकुण्ठ लोक माना जाता है; वहाँ मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य विष्णुधाम में जाता है। जो शालग्राम-शिला की क़ीमत लगाता है, जो बेचता है, जो विक्रय का अनुमोदन करता है तथा जो उसकी परीक्षा करके मूल्य का समर्थन करता है, वे सब नरक में पड़ते हैं। इसलिये शालिग्राम शिला और गोमती चक्र की ख़रीद-बिक्री छोड़ देनी चाहिये। शालिग्राम-स्थल से प्रकट हुए भगवान शालिग्राम और द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र- इन दोनों देवताओं का जहाँ समागम होता है, वहाँ मोक्ष मिलने में तनिक भी सन्देह नहीं है। द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र से युक्त, अनेकों चक्रों से चिह्नित तथा चक्रासन-शिला के समान आकार वाले भगवान शालिग्राम साक्षात चित्स्वरूप निरंजन परमात्मा ही हैं। ओंकार रूप तथा नित्यानन्द स्वरूप शालिग्राम को नमस्कार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालिग्राम का स्वरूप - &lt;br /&gt;
जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान श्री गदाधर का स्वरूप समझना चाहिये।&lt;br /&gt;
संकर्षण मूर्ति में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है।&lt;br /&gt;
प्रद्युम्न के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है।&lt;br /&gt;
अनिरुद्ध की मूर्ति गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नील वर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है।&lt;br /&gt;
भगवान नारायण श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है।&lt;br /&gt;
भगवान [[नृसिंह]] की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं। ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है। वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं।&lt;br /&gt;
जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों; वह वाराह भगवान का स्वरूप है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है। भगवान [[वाराह]] भी सबकी रक्षा करने वाले हैं। [[ कुर्म अवतार]] की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है। उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है। उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है।&lt;br /&gt;
श्रीधर की मूर्ति में पाँच रेखाएँ होती हैं,&lt;br /&gt;
वनमाली के स्वरूप में गदा का चिह्न होता है।&lt;br /&gt;
गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह [[वामन]] मूर्ति की पहचान है।&lt;br /&gt;
जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान अनन्त की प्रतिमा है।&lt;br /&gt;
दामोदर की मूर्ति स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है। उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है। भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं।&lt;br /&gt;
जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को ब्रह्मा की मूर्ति समझनी चाहिये।&lt;br /&gt;
जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह [[श्रीकृष्ण]] का स्वरूप है। वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है।&lt;br /&gt;
हयग्रीव मूर्ति अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है।&lt;br /&gt;
भगवान वैकुण्ठ कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं। उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है। वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है।&lt;br /&gt;
[[मत्स्य]] भगवान की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है। उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है।&lt;br /&gt;
जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान श्री [[राम]] का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं।&lt;br /&gt;
द्वारकापुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप भगवान गदाधर।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं।&lt;br /&gt;
लक्ष्मीनारायण दो चक्रों से,&lt;br /&gt;
त्रिविक्रम तीन से,&lt;br /&gt;
चतुर्व्यूह चार से,&lt;br /&gt;
वासुदेव पाँच से,&lt;br /&gt;
प्रद्युम्न छ: से,&lt;br /&gt;
संकर्षण सात से,&lt;br /&gt;
पुरुषोत्तम आठ से,&lt;br /&gt;
नवव्यूह नव से,&lt;br /&gt;
दशावतार दस से,&lt;br /&gt;
अनिरुद्ध ग्यारह से और&lt;br /&gt;
द्वादशात्मा बारह चक्रों से युक्त होकर जगत की रक्षा करते हैं।&lt;br /&gt;
इससे अधिक चक्र चिह्न धारण करने वाले भगवान का नाम अनन्त है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपयोग==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदू धर्म में आमतौर पर मानवरूपी धार्मिक मूर्तियां प्रतिनिधित्व करती हैं हालांकि प्रतीक चिन्हों का भी समान रूप से प्रयोग होता है। शालीग्राम के रूप में भगवान के अमूर्त रूप का प्रतिनिधित्व किया जाता जिस पर मानव आसानी से ध्यान केंद्रित कर सकें&amp;lt;ref&amp;gt;Hinduism: Beliefs and Practices, by Jeanne Fowler, pp. 42–43, at [http://books.google.com/books?id=RmGKHu20hA0C&amp;amp;pg=PA42&amp;amp;dq=Hinduism+murtis+shiva+linga&amp;amp;lr=&amp;amp;cd=18#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false Books.Google.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150905091459/https://books.google.com/books?id=RmGKHu20hA0C&amp;amp;pg=PA42&amp;amp;dq=Hinduism+murtis+shiva+linga&amp;amp;lr=&amp;amp;cd=18#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false |date=5 सितंबर 2015 }} and Flipside of Hindu symbolism, by M. K. V. Narayan at pp. 84–85 at [http://books.google.com/books?id=ewRfp4qpvt4C&amp;amp;pg=PA84&amp;amp;dq=Hinduism+murtis+saligrama&amp;amp;lr=&amp;amp;cd=1#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false Books.Google.com] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150905075221/https://books.google.com/books?id=ewRfp4qpvt4C&amp;amp;pg=PA84&amp;amp;dq=Hinduism+murtis+saligrama&amp;amp;lr=&amp;amp;cd=1#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false |date=5 सितंबर 2015 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;और जैसा की भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है ,&lt;br /&gt;
{{quote|जिन लोगों के मन परमात्मा के अप्रत्यक्ष, अवैयक्तिक गुणों से जुड़े होते हैं उन लोगों के लिए, उन्नति बहुत कठिन है। शरीर युक्त जीव को इस अनुशासन में प्रगति करना सदैव मुश्किल होता है।|[[गीता|श्रीमद्भगवद् गीता]], अध्याय 12, श्लोक &lt;br /&gt;
5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ref&amp;gt;http://vedabase.net/bg/12/5/en3&amp;lt;/ref&amp;gt; }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुद्ध अर्थ इस प्रकार है &lt;br /&gt;
भगवद  गीता अध्याय: 12&lt;br /&gt;
श्लोक 5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्लोक:&lt;br /&gt;
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌।&lt;br /&gt;
 अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भावार्थ:&lt;br /&gt;
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है&lt;br /&gt;
 ॥5॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म आधार}}&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:विष्णु अवतार]]&lt;br /&gt;
-[https://web.archive.org/web/20190524022639/http://shaligram.com/ शालिग्राम शिला के बारे में आपको जो कुछ भी जानना है वह यहाँ है]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-[https://web.archive.org/web/20190930090444/http://www.shaligram.org/ जानिए क्या है शालिग्राम पत्थर]&lt;/div&gt;</summary>
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