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	<title>श्रीभट्ट - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-26T21:33:00Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;चक्रबोट: ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार</title>
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		<updated>2021-05-06T05:27:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;श्रीभट्ट &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; की [[निम्बार्क सम्प्रदाय]] के प्रमुख कवियों में गणना की जाती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;hindisahityainfo.blogspot.in&amp;quot;&amp;gt;http://hindisahityainfo.blogspot.in/2017/05/blog-post.html?spref=gp{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
माधुर्य के सच्चे उपासक श्रीभट्ट केशव कश्मीरी के शिष्य थे।&lt;br /&gt;
ग्रन्थ &amp;quot;युगल शतक &amp;quot; का रचना काल निम्न दोहे में दिया है ;&lt;br /&gt;
;नयन वान पुनि राम शशि गनो अंक गति वाम। &lt;br /&gt;
;प्रगट भयो युगल शतक यह संवत अभिराम।&lt;br /&gt;
नैन 2 वान 5 राम 3 शशि 1 उलटा करने पर 1352 तेरह सौ वावन होता है। यह श्रीयुगल शतक का रचना काल है ।&amp;lt;ref name=&amp;quot;hindisahityainfo.blogspot.in&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साहित्य सृजन ==&lt;br /&gt;
निम्बार्क सम्प्रदाय के विद्वानों के अनुसार श्री भट्ट जी ने बहुत दोहे लिखे थे,जिनमें से कुछ ही युगल शतक के रूप में अवशिष्ट रह गये हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;hindisahityainfo.blogspot.in&amp;quot;/&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%9F |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190209020814/http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%9F |archive-date=9 फ़रवरी 2019 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==माधुर्य भक्ति का वर्णन==&lt;br /&gt;
श्रीभट्ट जी के उपास्य वृन्दाविपिन विलासी [[राधा]] और [[कृष्ण]] हैं। ये सदा प्रेम में मत्त हो विविध कुंजों में अपनी लीलाओं का प्रसार करते हैं। भट्ट जी की यह जोड़ी सनातन ,एकरस -विहरण -परायण ,अविचल ,नित्य -किशोर-वयस और सुषमा का आगार है। प्रस्तुत उदाहरण में :&lt;br /&gt;
;राधा माधव अद्भुत जोरी। &lt;br /&gt;
;सदा सनातन इक रस विहरत अविचल नवल किशोर किशोरी। &lt;br /&gt;
;नख सिख सब सुषमा रतनागर,भरत रसिक वर हृदय सरोरी। &lt;br /&gt;
;जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल गंडवलय मिली लसत किशोरी।।&lt;br /&gt;
राधा और कृष्ण सदा विहार में लीन रहते हैं। किन्तु इनका यह नित्य विहार कन्दर्प की क्रीड़ा नहीं है। विहार में क्रीड़ा का मूल प्रेरक तत्त्व प्रेम है न कि काम। इसी कारण नित्य-विहार के ध्यान मात्र से भक्त को मधुर रस की अनुभूति हो जाती है। अतः भट्ट जी सदा राधा-कृष्ण के इस विहार के दर्शन करना चाहते हैं और यही उनकी उपासना है। वे कहते हैं :&lt;br /&gt;
;सेऊँ श्री वृन्दाविपिन विलास। &lt;br /&gt;
;जहाँ युगल मिलि मंगल मूरति करत निरन्तर वास।।&lt;br /&gt;
;प्रेम प्रवाह रसिक जन प्यारै कबहुँ न छाँड़त पास। &lt;br /&gt;
;खा कहौं भाग की श्री भट्ट राधा -कृष्ण रस-चास।।&amp;lt;ref name=&amp;quot;hindisahityainfo.blogspot.in&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
युगल किशोर की वन-विहार ,जल-विहार ,भोजन,हिंडोला,मान,सुरत आदि सभी लीलाएं समान रूप से आनन्द   मूलक  हैं। अतः भट्ट जी ने सभी का सरस् ढंग  से वर्णन  किया है। यमुना किनारे हिंडोला झूलते हुए राधा-कृष्ण का यह वर्णन बहुत  सुन्दर  है। इसमें झूलन के साथ तदनुकूल प्रकृति का भी उद्दीपन के रूप में वर्णन किया गया है। :&lt;br /&gt;
हिंडोरे झूलत पिय प्यारी। &lt;br /&gt;
;श्री   रंगदेवी   सुदेवी   विशाखा   झोटा   डेट  ललिता री।।&lt;br /&gt;
;श्री  यमुना  वंशीवट  के  तट    सुभग    भूमि   हरियारी। &lt;br /&gt;
;तैसेइ  दादुर  मोर  करत  धुनि  सुनी  मन  हरत महारी।।&lt;br /&gt;
;घन गर्जन दामिनी तें  डरपि  पिय हिय लपटि सुकुमारी। &lt;br /&gt;
;जै श्री भट्ट निरखि दंपती छवि डेट अपनपौ   वारी।।(युगल शतक :पृष्ठ 40 )&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार वर्षा में भीगते हुए राधा-कृष्ण का यह वर्णन मनोहारी है। यहाँ भाव की सुन्दरता के अतिरिक्त भाषा की सरसता ,स्पष्टता और प्रांजलता भी दर्शनीय है ;&lt;br /&gt;
भींजत कुंजन ते दोउ आवत। &lt;br /&gt;
;ज्यों ज्यों  बूंद परत चुनरी पर त्यों  त्यों हरि उर लावत।।&lt;br /&gt;
;अति   गंभीर  झीनें  मेघन की द्रुम  तर छीन बिरमावत। &lt;br /&gt;
;जै श्री भट्ट रसिक रस लंपट हिलि मिलि हिय सचुपावत।।(युगल शतक )&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्धांत की बात को सिद्ध करने के लिए एक पद।&lt;br /&gt;
जुगल किशोर हमारे ठाकुर।&lt;br /&gt;
सदा सर्वदा हम जिनके हैं,जनम जनम घर जाये चाकर।&lt;br /&gt;
चूक परे परिहरही न कबहू सवही भांति दया के आकर ।&lt;br /&gt;
जै श्रीभट्ट प्रकट त्रिभुवन में प्रणतनि पोषण परम सुधाकर।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साभार स्रोत==&lt;br /&gt;
*ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७&lt;br /&gt;
*युगल शतक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:कवि]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:महाकवि]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भक्त कवि]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भाषा]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी साहित्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;चक्रबोट</name></author>
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