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	<title>सभा - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
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		<updated>2020-03-02T21:58:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[File:Vedic Sabha.jpg|thumb|Vedic Sabha]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[वैदिक सभ्यता|वैदिक युग]] की अनेक जनतांत्रिक संस्थाओं में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सभा&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक थी। सभा के साथ ही एक दूसरी संस्था थी, समिति और [[अथर्ववेद संहिता|अथर्ववेद]] (सातवाँ, 13.1) में उन दोनों को [[ब्रह्मा|प्रजापति]] की दो पुत्रियाँ कहा गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन वैदिक समाज को ये संस्थाएँ अपने विकसित रूप में प्राप्त हुई थीं। उसका तात्पर्य सभास्थल और सभा की बैठक, दोनों ही से था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय एवं स्वरूप ==&lt;br /&gt;
अथर्ववेद के उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि सभा और समिति का अलग अलग अस्तित्व था। सभा में ब्राह्मणों, अभिजात लोगों ओर धनी मानी वर्ग के व्यक्तियों का जोर साधारण व्यक्तियों से संभवत: अधिक होता था। उसके सदस्यों को सुजात अर्थात् कुलीन कहा गया है (ऋग्वेद, सप्तम 1.4)। मैत्रायणी संहिता (चर्तुथ 7.4) के एक संदर्भ से ज्ञात होता है कि सभा की सदस्यता स्त्रियों के लिए उन्मुक्त नहीं थी। कहा जा सकता है कि सामूहिक रूप में सभा का महत्व बहुत अधिक था। उसके सदस्यों को सभासद, अध्यक्ष को सभापति और द्वाररक्षक को सभापाल कहते थे। सभासदों की बड़ी प्रतिष्ठा होती थी, किंतु वह प्रतिष्ठा खोखली न थी और सभासदों की योग्यताएँ निश्चित थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभासदों के लिए ये गुण अत्यंत अपेक्षित थे, वाल्मीकि रामायण (उत्तर कांड, 3.33) तथा महाभारत के सभा पर्व में भी उन्हें गिनाया गया है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मं। &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम् ॥&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात जिस सभा में वृद्धजन (अनुभवी जन) नहीं वह सभा नहीं, जो धर्म की बात न कहें वे वृद्धजन(अनुभवी जन) नहीं, जिसमें सत्य नहीं वह धर्म नहीं और जो कपट से पूर्ण हो, वह सत्य नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्लोक 58, अध्याय 35, उद्योग पर्व, महाभारत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्याय का इच्छुक व्यक्ति सभाचर और सभा से छूटा हुआ अभियुक्त दोषमुक्त, प्रसन्न और सानंद कहा गया है। न्याय वितरण के अतिरिक्त सभा में आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक प्रश्नों पर भी विचार होते थे। कभी कभी लोग वहाँ इकट्ठे होकर जुए के खेल द्वारा अपना मनोरंजन भी किया करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभा का यह स्वरूप उत्तर वैदिककाल का अंत होते होते (600 ई. पू.) समाप्त हो गया। राज्यों की सीमाएँ बढ़ीं और राजाओं के अधिकार विस्तृत होने लगे। उसी क्रम में सभा ने राजसभा अर्थात् राजा के दरबार का रूप धारण कर लिया। धीरे-धीरे उसकी नियंत्रात्मक शक्ति जाती रही और साथ ही साथ उसे जनतंत्रात्मक स्वरूप का भी अंत हो गया। राजसभा में अब केवल राजपुरोहित, राज्याधिकारी, कुछ मंत्री और राजा अथवा राज्य के कुछ कृपापात्र मात्र बच रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:लोकतंत्र]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
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