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	<title>समावर्तन संस्कार - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;रोहित साव27: 2401:4900:5C7C:87AA:F1B4:CA0D:35E7:39B1 (Talk) के संपादनों को हटाकर InternetArchiveBot के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/2401:4900:5C7C:87AA:F1B4:CA0D:35E7:39B1&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/2401:4900:5C7C:87AA:F1B4:CA0D:35E7:39B1&quot;&gt;2401:4900:5C7C:87AA:F1B4:CA0D:35E7:39B1&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:2401:4900:5C7C:87AA:F1B4:CA0D:35E7:39B1&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:2401:4900:5C7C:87AA:F1B4:CA0D:35E7:39B1 (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;Talk&lt;/a&gt;) के संपादनों को हटाकर &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:InternetArchiveBot&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य:InternetArchiveBot (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;InternetArchiveBot&lt;/a&gt; के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{हिन्दू धर्म सूचना मंजूषा}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;समावर्तन संस्कार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; [[हिन्दू धर्म|हिन्दुओं]] का १२वाँ [[संस्कार]] है। प्राचीन काल में [[गुरुकुल]] में शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात जब जातक की गुरुकुल से विदाई की जाती है तो आगामी जीवन के लिये उसे गुरु द्वारा उपदेश देकर विदाई दी जाती है। इसी को समावर्तन संस्कार कहते हैं। इससे पहले जातक का ग्यारहवां संस्कार [[केशान्त संस्कार|केशान्त]] किया जाता है।&lt;br /&gt;
वर्तमान समय में [[दीक्षान्त समारोह]], समावर्तन संस्कार जैसा ही है।  अतः समावर्तन संस्कार वह संस्कार है जिसमें आचार्य जातकों को [[उपदेश]] देकर आगे के जीवन ([[गृहस्थाश्रम]]) के दायित्वों के बारे में बताया जाता है और उसे सफलतापूर्वक जीने के लिये क्या-क्या करना चाहिए, यह बताया जाता है। &amp;#039;समावर्तन&amp;#039; का शाब्दिक अर्थ है, &amp;#039;वापस लौटना&amp;#039;। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
सनातन अथवा [[हिन्दू धर्म]] की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। [[भारत की संस्कृति|भारतीय संस्कृति]] की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वतः विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समावर्तन ==&lt;br /&gt;
गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चार के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी उस मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे उसे [[यज्ञोपवीत]] के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे &amp;#039;विद्या स्नातक&amp;#039; की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस संस्कार के माध्यम से गुरु, शिष्य को इंद्रिय निग्रह, दान, दया और मानवकल्याण की शिक्षा देता है। [[ऋग्वेद]] में लिखा है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;    युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः।&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;    तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यों 3 मनसा देवयन्तः।।[1]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात् युवा पुरुष उत्तम वस्त्रों को धारण किए हुए, उपवीत (ब्रह्मचारी) सब विद्या से प्रकाशित जब गृहाश्रम में आता है, तब वह प्रसिद्ध होकर श्रेय मंगलकारी शोभायुक्त होता है। उसको धीर, बुद्धिमान, विद्धान, अच्छे ध्यानयुक्त मन से विद्या के प्रकाश की कामना करते हुए, ऊंचे पद पर बैठाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]] के शिक्षावल्ली के ११वें अनुवाक में मिलता है कि [[आचार्य]] किस प्रकार स्नातक को भावी जीवन का उपदेश करते थे। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:: &amp;#039;&amp;#039;([[सत्य]] बोलना। [[धर्म]] के मार्ग पर चलना। [[स्वाध्याय]] करने में आलस्य मत करना (पढ़ना समाप्त हुआ, अब हमको पठन-पाठन से क्या काम, ऐसा मत समझना)। आचार्य को उनकी प्रिय वस्तु देना और सन्तान रूपी तन्तु का विच्छेद मत करना (अर्थात सन्तान पैदा करने से मत चूकना)। सत्य (को जानने और बोलने) के प्रति प्रमाद (उपेक्षा) मत करना। [[धर्म]] (कर्तव्य) के मार्ग पर चलने से प्रमाद न करना। कल्याणकारी कार्यों  को करने से प्रमाद मत करना। संसाधनों के विकास में प्रमाद न करें।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/shikshaavalii.html?lang=sa |title=शीक्षावल्ली तैत्तिरीयोपनिषदि |access-date=2 मार्च 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180302164820/https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/shikshaavalii.html?lang=sa |archive-date=2 मार्च 2018 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि नो इतराणि । ये केचास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वया आसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया अदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:: &amp;#039;&amp;#039;स्वाध्याय और प्रवचन (शिक्षण) में प्रमाद न करें। देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए ।  माता को देवता मानना। पिता को देवता मानना। आचार्य को देवता मानना। जो अनिन्द्य कर्म हैं (जिन कर्मों का कथन किया जा सके), उन्हीं का सेवन करें, अन्य नहीं। हमारे (आचार्यों के) जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों, केवल उन्हीं की उपासना करना, दूसरे कर्मों का नहीं (संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है, &amp;#039;आचार्य ने ऐसा किया है&amp;#039; उसका अनुकरण नहीं करना। जो हमसे अच्छे काम बन पड़े हैं, उन्हीं का अनुकरण करना, हमारे अनुचित कामों का अनुकरण मत करना)। हमसे जो अधिक श्रेष्ठ सच्चरित्र ब्रह्मज्ञानी (विद्वान) मिलें उनकी उपासना करना (अन्धश्रद्धा मत करना; अपनी बुद्धि पर भरोसा करके विवेक से काम करना)। श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिये। बिना श्रद्धा के दान नहीं करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दान देना चाहिये । विनम्रतापूर्वक (ह्रिया) दान देना चाहिये । इस भय से दान देना चाहिये कि दान नही करूँगा तो भगवान को क्या मुँह दिखाऊँगा।  विदा (ज्ञानपूर्वक , विधिपूर्वक , आदर एवं उदारतापूर्वक निस्वार्थ भाव से) दान देना चाहिये (प्रमाद से , उपेक्षापूर्वक नही)। &amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/September/v2.4 |title=आचार्य का विद्यार्थी को उपदेश |access-date=2 मार्च 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180302180405/http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/September/v2.4 |archive-date=2 मार्च 2018 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[सनातन धर्म के संस्कार|षोडष संस्कार]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20160305145101/http://hindi.awgp.org/?gayatri%2FAWGP_Offers%2Fparivar_nirman%2Fsanskar%2F]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू षोडश उपचार}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू संस्कार]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू परम्परा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;रोहित साव27</name></author>
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