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	<title>सोफ़िस्त - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2020-06-15T20:18:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 1 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;आधुनिक प्रचलन में, &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सोफ़िस्त&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; वह व्यक्ति है, जो दूसरों को अपने मत में करने के लिए युक्तियों, एवं व्याख्याओं का आविष्कार कर सके। किंतु यह &amp;quot;सोफ़िस्त&amp;quot; का मूल अर्थ नहीं है। प्राचीन [[यूनान|यूनानी]] दर्शनकाल में, ज्ञानाश्रयी दार्शनिक ही सोफ़िस्त थे। तब &amp;quot;फ़िलॉसफ़ॉस&amp;quot; का प्रचलन न था। ईसा पूर्व पाँचवीं तथा चौथी शताब्दियों में यूनान के कुछ सीमावर्ती दार्शनिकों ने सांस्कृतिक विचारों के विरुद्ध आंदोलन किया। [[एथेंस]] नगर प्राचीन यूनानी संस्कृति का केंद्र था। वहाँ इस आंदोलन की हँसी उड़ाई गई। अफलातून ([[प्लेटो]]) के कुछ संवादों के नाम सोफ़िस्त कहे जानेवाले दार्शनिकों के नामों पर हैं। उनमें [[सुकरात]] और प्रमुख सोफ़िस्तों के बीच विवाद प्रस्तुत करते हुए अंत में सोफ़िस्तों को निरुतर करा दिया गया है। सुकरात के आत्मत्याग से यूनान में उसका सम्मान इतना अधिक हो गया था कि सुकरात को सोफिस्त आंदोलन का विरोधी समझकर, परंपरा ने &amp;quot;सोफ़िस्त&amp;quot; शब्द अपमानसूचक मान लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सोफिस्तों का योगदान ==&lt;br /&gt;
वस्तुत: सोफिस्त दार्शनिकों ने ही यूनानी सभ्यता का मानवीकरण किया। इनसे पूर्व, कभी किसी यूनानी दार्शनिक ने मनुष्य को सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माता नहीं समझा था। एकियन सभ्यता में, जिसकी झलक [[हामर]] के [[इलियाड|इलियड]] नामक महाकाव्य में मिलती हैं, सृष्टि का भार ओलिंपस के देवी देवताओं को सौंपा गया था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में देवी देवताओं से अनिच्छा होने पर जिस दर्शन का सूत्रपात हुआ, वह प्रकृति, अथवा नियति को संसार और उसकी संपूर्ण गति विधि की जननी मान बैठा था। किंतु सोफ़िस्त विचारकों का ध्यान इस विचार के प्रत्यक्ष रूप की ओर गया। उन्होंने देखा, देवपुत्र, अथवा प्रकृतिपुत्र यूनानी कुलीन प्रथा से आक्रांत थे। उन्होंने समाज को स्वतंत्र पुरुषों एवं दासों में विभाजित कर रखा था। सार्वजनिक शिक्षा की कोई रूपरेखा बनी ही न थी। उपेक्षित वर्ग का जनकार्यों में कोई स्थान न था। परिवर्तन की किसी भी योजना के सफल होने की आशा तभी की जा सकती थी, जब पुरानी दूषित परंपराओं के सुरक्षित रखने का श्रेय मनुष्य को दिया जाता। अतएव सोफ़िस्तों ने प्रकृतिवादी दर्शन के स्थान पर मानववादी दर्शन की स्थापना की। अफ़लातून के &amp;quot;प्रोतागोरस&amp;quot; नामक संवाद में प्रसिद्ध सोफ़िस्त प्रोतागोरस के मुख से कहलाया गया है - &amp;#039;&amp;#039;मनुष्य सभी वस्तुओं की माप है, जो हैं उनका कि वे हैं, जो नहीं हैं उनका कि वे नहीं हैं।&amp;#039;&amp;#039; यही सोफ़िस्त विचारकों के दर्शन का मुख्य स्वर था। इसी से प्राचीन परंपराओं के पोषकों ने, &amp;quot;सोफ़िस्त&amp;quot; कहकर उनका उपहास किया। किंतु यूनानी सभ्यता के जनजागरण के वे अग्रदूत थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोफ़िस्त विचारकों ने नागरिक एवं दास का भेदभाव मिटाकर सबको शिक्षा देना प्रारंभ किया। सोफ़िस्तों ने कहीं अपने विद्यालय स्थापित नहीं किए। वे घूम घूमकर शिक्षा देते थे। नि:शुल्क शिक्षण के वे समर्थक न थे, क्योंकि उन्होंने इसी कार्य को अपना व्यवसाय बना लिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूनान में पहले कभी, कला के रूप में, [[संभाषण]] (रिटोरिक) की शिक्षा नहीं दी गई थीं। सोफ़िस्तों ने, जनकार्य के लिए भाषण की योग्यता अनिवार्य समझकर, युवकों को संभाषणकला सिखाना प्रारंभ किया। ऐसीमैक्स और थियोडोरस नामक सोफ़िस्तों ने अपने विद्यार्थियों के लिए उक्त विषय पर टिप्पणियाँ तैयार की थीं। अरस्तू ने इनके ऋण को स्वीकार नहीं किया किंतु अपने &amp;quot;रेतारिक्स&amp;quot; में उसने इनकी दो हुई सामग्री का उपयोग किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रॉडिकस ने मिलते जुलते शब्दों का अर्थभेद स्पष्ट करने के लिए पुस्तकें लिखीं थीं। शिक्षा की दृष्टि से यह कार्य उस प्राचीन काल में कितना महत्वपूर्ण था जब यूनानी भाषा के शब्दकोश का निर्माण नहीं हुआ था। यही नहीं, सोफ़िस्तों ने विज्ञान आदि विषयों पर भी पाठ तैयार किए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रसिद्ध है कि सोफ़िस्त किसी भी शब्द का मनमाना अर्थ कर लेते थे। पर उनके इस कार्य का एक दूसरा पक्ष भी है। तब तक किसी सीमित व्याख्यापद्धति का विकास नहीं हुआ था। सोफ़िस्तों के इस कार्य से विचारकों की आँखें खुलीं और उन्होंने समझा कि चिंतन के नियम स्थिर करके ही व्याख्याओं को सीमित किया जा सकता है। अरस्तू के &amp;quot;तादात्म्य के नियम&amp;quot; को सोफ़िस्तों की स्वतंत्र व्याख्यापद्धति का फल मानना संभवत: अनुचित न होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परंपरा ने सोफ़िस्तों को स्थूल [[व्यक्तिवाद]] का पोषक ठहराया है। किंतु प्रोतागोरस के कथन को कि &amp;quot;मनुष्य ही सब वस्तुओं की माप है&amp;quot; यदि उस समय तक विकसित दार्शनिक मतों का एक संक्षिप्त टिप्पणी मानें तो कोई बड़ी भूल न होगी। दार्शनिकों के चिंतन का न कोई मानदंड था, न उनके चिंतन की कोई शैली थी। पाश्चात्य तर्क का जन्मदाता अरस्तू (385-22 ई. पू.) तो बाद में हुआ। अतएव, सोफ़िस्त विचारकों की स्वतंत्र व्याख्यापद्धति को यूनानी दर्शन के तार्किक उत्कर्ष का निमित्त कारण कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110106121715/http://classics.mit.edu/Plato/sophist.html Plato&amp;#039;s Dialogue: Sophist]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:दर्शन]]&lt;/div&gt;</summary>
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