<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9_%E0%A4%B6%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0</id>
	<title>सोलह शृंगार - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9_%E0%A4%B6%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9_%E0%A4%B6%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;action=history"/>
	<updated>2026-08-25T10:23:47Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.43.6</generator>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9_%E0%A4%B6%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=4692&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9_%E0%A4%B6%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=4692&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2020-03-03T23:31:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[भारतीय साहित्य]] में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सोलह शृंगारी&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (षोडश शृंगार) की यह प्राचीन परंपरा रही हैं। आदि काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों प्रसाधन करते आए हैं और इस कला का यहाँ इतना व्यापक प्रचार था कि प्रसाधक और प्रसाधिकाओं का एक अलग वर्ग ही बन गया था। इनमें से प्राय: सभी शृंगारों के दृश्य हमें रेलिंग या द्वारस्तंभों पर अंकित (उभारे हुए) मिलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अंगशुची, मंजन, वसन, माँग, महावर, केश।&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;तिलक भाल, तिल चिबुक में, भूषण मेंहदी वेश।। &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मिस्सी काजल अरगजा, वीरी और सुगंध।&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात् अंगों में उबटन लगाना, स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना, माँग भरना, महावर लगाना, बाल सँवारना, तिलक लगाना, ठोढी़ पर तिल बनाना, आभूषण धारण करना, मेंहदी रचाना, दाँतों में मिस्सी, आँखों में काजल लगाना, सुगांधित द्रव्यों का प्रयोग, पान खाना, माला पहनना, नीला कमल धारण करना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[स्नान]] के पहले [[उबटन]] का बहुत प्रचार था। इसका दूसरा नाम अंगराग है। अनेक प्रकार के [[चन्दन|चंदन]], कालीयक, अगरु और सुगंध मिलाकर इसे बनाते थे। जाड़े और गर्मी में प्रयोग के हेतु यह अलग अलग प्रकार का बनाया जाता था। सुगंध और शीतलता के लिए स्त्री पुरुष दोनों ही इसका प्रयोग करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्नान के अनेक प्रकार काव्यों में वर्णित मिलते हैं पर इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय [[जलविहार]] या [[जलक्रीड़ाओं की सूची|जलक्रीड़ा]] था। अधिकांशत: स्नान के जल को पुष्पों से सुरभित कर लिया जाता था जैसे आजकल &amp;quot;बाथसाल्ट&amp;quot; का प्रयत्न किया जाता है। एक प्रकार के [[साबुन]] का भी प्रयोग होता था जो &amp;quot;फेनक&amp;quot; कहलाता था और जिसमें से झाग भी निकलते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसन वे स्वच्छ वस्त्र थे जो नहाने के बाद नर नारी धारण करते थे। पुरुष एक उत्तरीय और अधोवस्त्र पहनते थे और स्त्रियाँ चोली और घाघरा। यद्यपि वस्त्र रंगीन भी पहने जाते थे तथापि प्राचीन नर-नारी श्वेत उज्जवल वस्त्र अधिक पसंद करते थे। इनपर सोने, चाँदी और रत्नों के काम कर और भी सुंदर बनाने की अनेक विधियाँ थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्नान के उपरांत सभी सुहागवती स्त्रिययाँ [[सिन्दूर|सिंदूर]] से माँग भरती थीं। वस्तुत: वारवनिताओं को छोड़कर अधिकतर विवाहित स्त्रियों के शृंगार प्रसाधनों का उल्लेख मिलता है, कन्याओं का नहीं। सिंदूर के स्थान पर कभी कभी फूलों और मोतियों से भी माँग सजाने की प्रथा थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाल सँवारने के तो तरीके हर समय के अपने थे। स्नान के बाद केशों से जल निचोड़ लिया जाता था। ऐसे अनेक दृश्य पत्थर पर उत्कीर्ण मिलते हैं। सूखे बालों को धूप और चंदन के धुँए से सुगंधित कर अपने समय के अनुसार अनेक प्रकार की वेणियों, अलकों और जूड़ों से सजाया जाता था। बालों में मोती और फूल गूँथने का आम रिवाज था। विरहिणियाँ और परित्यक्ता वधुएँ सूखे अलकों वाली ही काव्यों में वर्णित की गई हैं; वे प्रसाधन नहीं करती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[महावर]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; लगाने की रीति तो आज भी प्रचलित है, विशेषकर त्यौहारों या मांगलिक अवसरों पर। इनसे नाखून और पैर के तलवे तो रचाए ही जाते थे, साथ ही इसे होठों पर लगाकर आधुनिक &amp;quot;लिपिस्टिक&amp;quot; का काम भी लिया जाता था। होठों पर महावर लगाकर लोध्रचूर्ण छिड़क देने से अत्यंत मनमोहक पांडुता का आभास मिलता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुँह का प्रसाधन तो नारियों को विशेष रूप से प्रिय था। इसके &amp;quot;पत्ररचना&amp;quot;, विशेषक, पत्रलेखन और भक्ति आदि अनेक नाम थे। लाल और श्वेत चंदन के लेप से गालों, मस्तक और भवों के आस पास अनेक प्रकार के फूल पत्ते और छोटी बड़ी बिंदियाँ बनाई जाती थीं। इसमें गीली या सूखी केसर या कुमकुम का भी प्रयोग होता था। बाद में इसका स्थान बिंदी ने ले लिया जो आज भी इस देश की स्त्रियों का प्रिय प्रसाधन है। कभी केवल काजल की अकेली बिंदी भी लगाने की रीति थी। आजकल की भाँति ही बीच ठोढ़ी पर दो छोटे छोटे काजल के तिल लगाकर सौंदर्य को आकर्षक बनाने का चलन था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजकल की तरह प्राचीन भारत में भी हथेली और नाखूनों को &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[मेहँदी]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; से लाल करने का आम रिवाज था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[आभूषण|आभूषणों]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; की तो अनंत परंपरा थी जिसे नर नारी दोनों ही धारण करते थे। मध्यकाल में तो आभूषणों का प्रयोग इतना बढ़ा कि शरीर का शायद ही कोई भाग बचा हो जहाँ गहने न पहने जाते हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आँखों में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[काजल]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; या &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[अंजन]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; का प्रयोग व्यापक रूप से होता था। मूर्तिकला में बहुधा शलाका से अंजन लगाती हुई नारी का चित्रण हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अरगजा&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक प्रकार का लेप है जिसे केसर, चंदन, कपूर आदि मिलाकर बनाते थे। आधुनिक इत्र या सेंट की तरह शरीर को सुगंधित करने के लिए इसका अधिकतर प्रयोग किया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुँह को सुगंधित करने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों ही [[तांबूल]] या [[पान]] खाते थे। राजाओं की परिचारिकाओं में तांबूलवाहिनी का अपना विशेष स्थान था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय नारी को अपने प्रसाधन में फूलों के प्रति विशेष मोह है। जूड़े में, वेणियों में, कानों, हाथों, बाहों कलाइयों और कटिप्रदेश में कमल, कुंद, मंदार, शिरीष, केसर आदि के फूल और [[गजरा|गजरों]] का प्रयोग करती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृंगार का सोलहवाँ अंग है नीला कमल, जिसे स्त्रियाँ पूर्वोक्त पंद्रह शृंगारों से सज्जित हो पूर्ण विकसित पुष्प या कली के दंड सहित धारण करती थीं। नीले कमलों का चित्रण प्राचीन मूर्तिकला में प्रभूत रूप से हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इतिहास ==&lt;br /&gt;
प्राचीन [[संस्कृत साहित्य]] में षोडश शृंगार की गणना अज्ञात प्रतीत होती है। अनुमानतः यह गणना [[वल्लभदेव]] की [[सुभाषितावली]] (१५ वीं शती या १२ वीं शती) में प्रथम बार आती है। उनके अनुसार वे इस प्रकार हैं— &lt;br /&gt;
: आदौ मज्जनचीरहारतिलकं नेत्रांजनं कुडले, नासामौक्तिककेशपाशरचना सत्कंचुकं नूपुरौ। &lt;br /&gt;
: सौगन्ध्य करकंकणं चरणयो रागो रणन्मेखला, ताम्बूलं करदर्पण चतुरता शृंगारका षोडण।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात् (१) मज्जन, (२) चीर, (३) हार, (४) तिलक, (५) अंजन, (६) कुंडल, (७) नासामुक्ता, (८) केशविन्यास, (९) चोली (कंचुक), (१०) नूपुर, (११) अंगराग (सुगंध), (१२) कंकण, (१३) चरणराग, (१४) करधनी, (१५) तांबूल तथा (१६) करदर्पण (आरसो नामक अंगूठी)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनः १६ वीं शती में श्री [[रूप गोस्वामी|रूपगोस्वामी]] के उज्वलनीलमणि में शृंगार की यह सूची इस प्रकार गिनाई गई है— &lt;br /&gt;
: स्नातानासाग्रजाग्रन्मणिरसितपटा सूत्रिणी बद्धवेणिः सोत्त सा चर्चितांगी कुसुमितचिकुरा स्त्रग्विणी पद्महस्ता। : &lt;br /&gt;
: ताभ्बूलास्योरुबिन्दुस्तबकितचिबुका कज्जलाक्षी सुचित्रा। राधालक्चोज्वलांघ्रिः स्फुरति तिलकिनी षोडशाकल्पिनीयम्।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्त प्रमाण से शृंगारों की यह सूची बनती है— अर्थात् (१) स्नान, (२) नासा मुक्ता, (३) असित पट, (४) कटि सूत्र (करधनी), (५) वेणीविन्यास, (६) कर्णावतंस, (७) अंगों का चर्चित करना, (८) पुष्पमाल, (९) हाथ में कमल, (१०) केश में फूल खोंसना, (११) तांबूल, (१२) चिबुक का कस्तुरी से चित्रण, (१३) काजल, (१४) शरीर पर पत्रावली, मकरीभंग आदि का चित्रण, (१५) अलक्तक और (१६) तिलक। यहाँ वल्लभदेव के तथा श्रीरूपगोस्वामी के काल तक की शृंगार सूची में विभिन्नता स्पष्ट है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदी कवियों में [[मलिक मोहम्मद जायसी|जायसी]] के अनुसार ये शृंगार यों हैं—(१) मज्जन, (२) स्नान (जायसी ने मज्जन, स्नान को अलग रखा है), (३) वस्त्र, (४) पत्रावली, (५) सिंदूर, (६) तिलक, (७) कुंडल, (८) अंजन, (९) अधरों का रंगना, (१०) तांबूल, (११) कुसुमगंध, (१२) कपोलों पर तिल, (१३) हार, (१४) कंचुकी, (१५) छुद्रघंटिका ओर (१६) पायल।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रीतिकाव्य के आचार्य [[केशव]]दास ने भी सोलह शृंगार की गणना इस प्रकार की है— &lt;br /&gt;
: प्रथम सकल सुचि, मंजन अमल बास, जावक, सुदेस किस पास कौ सम्हारिबो। &lt;br /&gt;
: अंगराग, भूषन, विविध मुखबास-राग, कज्जल ललित लोल लोचन निहारिबो। &lt;br /&gt;
: बोलन, हँसन, मृदुचलन, चितौनि चारु, पल पल पतिब्रत प्रन प्रतिपालिबो। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;केसौदास&amp;#039; सो बिलास करहु कुँवरि राधे, इहि बिधि सोरहै सिंगारन सिंगारिबो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्त छंद की टीका करते हुए [[सरदार कवि]] ने ये शृंगार यों गिने हैं—(१) उबटन, (२) स्नान, (३) अमल पट्ट, (४) जावक, (५) वेणी गूँथना, (६) माँग में सिंदूर, (७) ललाट में खौर, (८) कपोलों में तिल, (९) अंग में केसर लेपन, (१०) मेंहदी, (११) पुष्पाभूषण, (१२) स्वर्णाभूषण, (१३) मुखवास (१४) दंत मंजन, (१५) तांबूल और (१६) काजल। यहाँ स्पष्ट है कि टीकाकार ने कई उपकरण अपनी ओर से जोड़े हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[नगेंद्रनाथ वसु]] ने [[हिन्दी विश्वकोश|हिंदी विश्वकोश]] में इन शृंगारों को गणना निम्नलिखित दी है— (१) उबटन, (२) स्नान, (३) वस्त्रधारण, (४) केश प्रसाधन, (५) काजल, (६) सिंदूर से माँग भरना, (७) महावर, (८) तिलक, (९) चिबुक पर तिल, (१०) मेंहदी, (११) सुगंध लगाना, (१२) आभूषण, (१३) पुष्पमाल, (१४) मिस्सी लगाना, (१५) तांबूल और (१६) अधरों को रंगना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्त विभिन्न सूचियों से पता चलता है कि षोडश शृंगार को कोई निश्चित परिभाषा या सूची नहीं रही है। देश और काल के अनुसार उसमें भिन्नता होती रही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[चौसठ कलाएँ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[शृंगार रस]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=8olKHRKOevUC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false भारतीय शृंगार] (गूगल पुस्तक - लेखिका - कमल गिरि)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृति]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
	</entry>
</feed>