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	<title>स्वामी करपात्री - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;सौरभ तिवारी 05: जगदम्बा मिश्रा (Talk) के संपादनों को हटाकर संजीव कुमार के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया</title>
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		<updated>2021-08-26T11:07:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/जगदम्बा मिश्रा&quot;&gt;जगदम्बा मिश्रा&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:जगदम्बा मिश्रा (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;Talk&lt;/a&gt;) के संपादनों को हटाकर &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य:संजीव कुमार (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;संजीव कुमार&lt;/a&gt; के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Swami Karpatri.jpg|thumb|BBPS|300px|स्वामी स्वामी करपात्री]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;धर्मसम्राट स्वामी करपात्री&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (१९०७ - १९८२) भारत के एक सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं [[राजनेता]] थे। उनका मूल नाम हरि नारायण ओझा था। वे [[दशनामी सम्प्रदाय|दशनामी परम्परा]] के [[संन्यासी]] थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम &amp;#039;हरिहरानन्द सरस्वती&amp;#039; था किन्तु वे &amp;#039;करपात्री&amp;#039; नाम से ही प्रसिद्ध थे क्योंकि वे अपने अंजुलि का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे (कर = हाथ , पात्र = बर्तन, करपात्री = हाथ ही बर्तन हैं जिसके) । उन्होने [[अखिल भारतीय राम राज्य परिषद]] नामक राजनैतिक दल भी बनाया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें &amp;#039;धर्मसम्राट&amp;#039; की उपाधि प्रदान की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी जी की स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रूप में लिखा हुआ है। &lt;br /&gt;
आज जो रामराज्य सम्बन्धी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं, धर्म संघ, रामराज्य परिषद्, राममंदिर आन्दोलन, धर्म सापेक्ष राज्य, आदि सभी के मूल में स्वामी जी ही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवनी==&lt;br /&gt;
स्वामी करपात्री का जन्म सम्वत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वितीया को [[उत्तर प्रदेश]] के [[प्रतापगढ़ जिला|प्रतापगढ़ जिले]] के भटनी ग्राम में सनातनधर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण रामनिधि ओझा एवं श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम &amp;#039;हरि नारायण&amp;#039; रखा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी करपात्री 8-9 वर्ष की आयु से ही सत्य की खोज हेतु घर से पलायन करते रहे। 9 वर्ष की अल्पायु में महादेवी जी के साथ [[विवाह]] संपन्न करा दिया गया किन्तु 17 वर्ष की आयु में उन्होने गृहत्याग कर दिया। कहते हैं कि उस समय उनकी एक पुत्री भी जन्म ले चुकी थी। उसी वर्ष [[जोशीमठ|ज्योतिर्मठ]] के [[शंकराचार्य]] स्वामी [[ब्रह्मानंद सरस्वती]] से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली। हरि नारायण से &amp;#039; हरिहर चैतन्य &amp;#039; बने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शिक्षा===&lt;br /&gt;
संस्कृत : नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पं जीवन दत्त से &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अध्ययन : षड्दर्शनाचार्य स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से व पंजाबी बाबा श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री विद्या दीक्षा : नर्मदा उत्तर तट &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===तपस्वी जीवन===&lt;br /&gt;
17 वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखंड साधना, आत्मदर्शन, धर्म सेवा का संकल्प लिया। काशी धाम में शिखासूत्र परित्याग के बाद विद्वत, सन्यास प्राप्त किया। एक ढाई गज़ कपड़ा एवं दो लंगोटी मात्र रखकर भयंकर शीतोष्ण वर्षा का सहन करना इनका 18 वर्ष की आयु में ही स्वभाव बन गया था। त्रिकाल स्नान, ध्यान, भजन, पूजन, तो चलता ही था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्याध्ययन की गति इतनी तीव्र थी कि सम्पूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम घंटों और दिनों में हृदयंगम कर लेते। गंगातट पर फूंस की झोंपड़ी में एकाकी निवास, घरों में भिक्षाग्रहण करना, चौबीस घंटों में एक बार, भूमिशयन, निरावण चरण (पद) यात्रा। गंगातट नखर में प्रत्येक प्रतिपदा को धूप में एक लकड़ी की किल गाड़कर एक टांग से खड़े होकर तपस्या रत रहते। चौबीस घंटे व्यतीत होने पर जब सूर्य की धूप से कील की छाया उसी स्थान पर पड़ती, जहाँ 24 घंटे पूर्व थी, तब दूसरे पैर का आसन बदलते। ऐसी कठोर साधना और घरों में भिक्षा के कारण &amp;#039;करपात्री&amp;#039; कहलाए।  श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;षोडशानन्द नाथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===दण्ड ग्रहण===&lt;br /&gt;
24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर &amp;quot;अभिनवशंकर&amp;quot; के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी  बन कर &amp;quot;परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज&amp;quot; कहलाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===राजनीति में===&lt;br /&gt;
उन्होने [[वाराणसी]] में &amp;#039;धर्मसंघ&amp;#039; की स्थापना की। उनका अधिकांश जीवन [[वाराणसी]] में ही बीता। वे [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैत दर्शन]] के अनुयायी एवं शिक्षक थे। सन् १९४८ में उन्होने [[अखिल भारतीय राम राज्य परिषद]] की स्थापना की जो परम्परावादी [[हिन्दू]] विचारों का राजनैतिक दल है। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधानसभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यतः [[राजस्थान]]) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===गोरक्षा आन्दोलन===&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गोरक्षा आन्दोलन}}&lt;br /&gt;
[[इंदिरा गांधी]] ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्लखाने बंद हो जायेगें, जो अंग्रेजों के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दबाव में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया, जिसमें संविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी जिसे  &amp;#039;[[गोपाष्टमी]]&amp;#039; भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस धरने में [[भारत साधु समाज]], [[सनातन धर्म]], [[जैन धर्म]] आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया।  इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। जैन मुनि सुशील कुमार जी तथा सार्वदेशिक सभा के प्रधान [[लाला रामगोपाल शालवाले]] और [[हिन्दू महासभा]] के प्रधान प्रो॰ रामसिंह जी भी बहुत सक्रिय थे। श्री संत [[प्रभुदत्त ब्रह्मचारी]] तथा पुरी के जगद्‍गुरु शंकराचार्य श्री [[स्वामी निरंजनदेव तीर्थ]] तथा [[महात्मा रामचन्द्र वीर]] के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्थे और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी, जिससे कई साधु मारे गए । लेकिन संत [[राम चन्द्र वीर]] अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी [[मृत्यु]] के बाद ही समाप्त हुआ था। इस हत्याकांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री [[गुलजारी लाल नंदा]] ने त्यागपत्र दे दिया और इस कांड के लिए अपनी ही सरकार को जिम्मेदार बताया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===ब्रह्मलीन===&lt;br /&gt;
माघ शुक्ल चतुर्दशी सम्वत 2038 (7 फरवरी 1982) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से उनके पंच प्राण महाप्राण में विलीन हो गए। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधि दी गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कृतियाँ===&lt;br /&gt;
आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपने अनेक अद्भुत ग्रन्थ लिखे जैसे :- वेदार्थ पारिजात, रामायण मीमांसा, विचार पीयूष, मार्क्सवाद और रामराज्य आदि। &lt;br /&gt;
आपके ग्रन्थों में भारतीय परम्परा का बड़ा ही अद्भुत व प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आप ने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रमुख  विचार==&lt;br /&gt;
उन्होने सम्पूर्ण भारत में पैदल यात्राएँ करते हुए धर्म प्रचार के लिए सन 1940 ई० में &amp;quot;अखिल भारतीए धर्म संघ&amp;quot; की स्थापना की। धर्मसंघ का दायरा संकुचित नहीं, अत्यन्त विशाल है। वह आज भी प्राणी मात्र में सुख-शांति के लिए प्रयत्नशील है। संघ की दृष्टि में समस्त जगत और उसके प्राणी सर्वेश्वर भगवान के अंश हैं या उसके ही रूप हैं। संघ का मानना है कि यदि मनुष्य स्वयं शान्त और सुखी रहना चाहता है तो औरों को भी शान्त और सुखी बनाने का प्रयत्न आवश्यक है। इसलिए धर्म संघ के हर कार्य के आरम्भ और अन्त में &amp;quot;धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो&amp;quot;, ऐसे पवित्र जयकारे किए जाते हैं। इसमें अधार्मिकों के नाश के बजाय अधर्म के नाश की कामना की गयी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[वर्णाश्रम धर्म|हिन्दू वर्ण व्यवस्था]] के सम्बन्ध में स्वामी करपात्री का विचार था कि कर्मणा [[वर्ण]] मानने पर दिन भर में ही अनेक बार वर्ण बदलते रहेंगे। फिर व्यवस्था क्या होगी? अतः उपनयन, वेदाध्ययन, अग्निहोत्र आदि कर्म का अनुष्ठान, भोजन, विवाह आदि सभी सांस्कृतिक कर्म जन्मना ब्राह्मण आदि के आपस में ही हो सकते हैं। जन्मना ब्राह्मण और कर्मणा मुसलमान ब्राह्मण आदमी का भोजन, विवाह, आदि सम्बन्ध शास्त्र विरुद्ध है। इसी तरह जन्मना वर्णों से भिन्न लोगों का उपनयन, अग्निहोत्र आदि कर्मों का अधिकार सर्वथा शास्त्र विरुद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* दुस्त्यज दुर्व्यसन एवं पाशविकी चेष्टाओं को दूर करने के लिए दुस्त्यज धर्मनिष्ठा की अपेक्षा होती है और फिर उस दुस्त्यज धर्मनिष्ठा के त्याग के लिये दुस्त्यज ब्रह्मनिष्ठा या भगवद् अनुराग की अपेक्षा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* हमें चमत्कार , सिद्धि या शान्ति आदि गुणों से मोहित नहीं होना है । हमें [[वेद]]-[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार चलना होगा चाहे उसमें कमियाँ ही क्यों न दीखें । यह वैदिकों का धर्म है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी सन्दर्भ में, जब [[काशी]] के विद्वत्परिषद् ने [[भगवत पुराण|भागवत्पुराण]] के नवम् दशम् स्कन्ध को अश्लील एवं क्षेपक कहकर निकालने का निर्णय कर लिया तब करपात्री जी ने पूरे दो माह पर्यन्त भागवत की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत कर सिद्ध कर दिया कि वह तो भागवत की आत्मा ही है, हाँ जब कुछ वैष्णवों ने करपात्री जी के लिए अपने ग्रंथों में कटु शब्दों का प्रयोग किये तब उनके शास्त्रार्थ महारथी शिष्यों ने उसका उसी भाषा में उत्तर दिया। इससे उन्हें वैष्णव विरोधी समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[अखिल भारतीय रामराज्य परिषद]]&lt;br /&gt;
*[[गोरक्षा आन्दोलन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
* [https://archive.org/details/vedartha-parijat/page/n1 वेदार्थपारिजात - स्वामी करपात्री जी] (ऑनलाइन पाठ एवं पीडीएफ)&lt;br /&gt;
* [https://archive.org/search.php?query=Yajurveda%20bhashya%20sri%20karpatri  शुक्ल यजुर्वेदसंहिता - &amp;#039;वेदार्थपारिजात&amp;#039; (करपात्र) भाष्य सहित, सम्पूर्ण आठ खण्डों में] (पीडीएफ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{DEFAULTSORT:करपात्री, स्वामी}}&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:1905 में जन्मे लोग]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:१९८२ में निधन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:गोरखपुर के लोग]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:वाराणसी के लोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;सौरभ तिवारी 05</name></author>
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