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	<title>हिन्दू संस्कार - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-27T03:46:06Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;Ujjjval १५ फ़रवरी २०२१ को १७:३० बजे</title>
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		<updated>2021-02-15T17:30:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;  &lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म सूचना मंजूषा}}&lt;br /&gt;
{{मूल शोध|date=मई 2019}}&lt;br /&gt;
{{स्रोतहीन|date=मई 2019}}&lt;br /&gt;
{{Merge|सनातन धर्म के संस्कार}}&lt;br /&gt;
[[हिन्दू धर्म]] की महान आध्यात्मिक विरासत सफल और सार्थक यात्रा के लिए जहाँ यात्रा के काम आने वाले आवश्यकता - भोजन, वस्त्र, उपकरण आदि होते हैं, वही यह जानना भी कि यात्रा किस उद्देश्य से की जा रही है? उपाय क्या है? मार्ग में कहाँ-किस तरह की समस्याएँ आयेंगी तथा किन लोगों को मार्गदर्शन उपयोग रहेगा? इन जानकारियों के अभाव में  अनेक अवरोध और संकट उठ खड़े हो सकते हैं। मनुष्य का  सफल-सार्थक जीवन यात्रा महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== हिन्दू धर्म के पूर्वज ==&lt;br /&gt;
इन पूर्वजों ने इस आध्यात्मिक सत्य को बहुत गहराई तक पहचाना और जीवन की गहन समीक्षा की। उन्होंने पाया कि माँ के पेट में आने से लेकर चिता में समर्पण होने तक, उसके भी बाद मरणोत्तर विराम तक अनेक महत्वपूर्ण मोड़ आते है, यदि उनमें जीवात्मा को सम्हाला और सँवारा न जाये, तो मनुष्य अपनी अस्मिता का अर्थ समझना तो दूर, पीड़ा और पतन की ओर निरंतर अग्रसर होता हुआ नरकीटक, नरवानर, नरपामर बनता चला जाता है। इन महत्वपूर्ण मोड़ों पर सजग-सावधान करने और उँगली पकड़कर सही रास्ता दिखाने के लिए हमारे तत्वेत्ता, मनीषियों ने षोडश संस्कारों का प्रचलन किया था। चिन्ह-पूजा के रूप में प्रचलन तो उनका अभी भी है पर वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक बोध और प्रशिक्षण के अभाव वे मात्र कर्मकाण्ड और फिजूलखर्ची बनकर रह गये हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ संस्कार तो रस के कुपित हो जाने पर उसके विष बन जाने की तरह उलटी कुत्सा भड़काने का माध्यम बन गये हैं। विशेष रूप स विवाहों में तो आज यही हो रहा है। यों मनुष्य माटी का खिलौना है। पाश्चात्य सभ्यता तो उसे &amp;#039;सोशल एनीमल&amp;#039; अर्थात् &amp;#039;सामाजिक पशु&amp;#039; तक स्वीकार करने में संकोच नहीं करती, पर जिस जीवन को जीन्स और क्रोमोंजोम समुच्चय के रूप में वैज्ञानिकों ने भी अजर-अमर और विराट् यात्रा के रूप में स्वीकार कर लिया हो, उसे उपेक्षा और उपहास में टालना किसी भी तरह की समझदारी नहीं है। कम से कम जीवन ऐसा तो हो, जिसे गरिमापूर्ण कहा जा सके। जिससे लोग प्रसन्न हों, जिसे लोग याद करें, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ प्रेरणा लें, ऐसे व्यक्तित्व जो जन्म-जात संस्कार और प्रतिभा-सम्पन्न हों, उँगलियों में गिनने लायक होते हैं। अधिकांश तो अपने जन्मदाताओं पर वे अच्छे या बुरे जैसे भी हों, उन पर निर्भर करते हैं, वे चाहे उन्हें शिक्षा दें, संस्कार दें, मार्गदर्शन दें, या फिर उपेक्षा के गर्त में झोंक दें, पीड़ा और पतन में कराहने दें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्राचीन काल में ==&lt;br /&gt;
प्राचीनकाल में यह महान दायित्व कुटुम्बियों के साथ-साथ संत, पुरोहित और परिव्राजकों को सौंपा गया था। वे आने वाली पीढ़ियों को सोलह-सोलह अग्नि पुटों से गुजार कर खरे सोने जैसे व्यक्तित्व में ढालते थे। इस परम्परा का नाम ही संस्कार परम्परा है। जिस तरह अभ्रक, लोहा, सोना, पारस जैसी सर्वथा विषैली धातुएँ शोधने के बाद अमृत तुल्य औषधियाँ बन जाती हैं, उसी तरह किसी समय इस देश में मानवेतर योनियों में से घूमकर आई हेय स्तर की आत्माओं को भी संस्कारों की भट्ठी में तपाकर प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में ढाल दिया जाता था। यह क्रम लाखों वर्ष चलता रहा उसी के फलस्वरूप यह देश &amp;#039;स्वर्गादप गरीयसी&amp;#039; बना रहा, आज संस्कारों को प्रचलन समाप्त हो गया, तो पथ भूले बनजारे की तरह हमारी पीढ़ियाँ कितना भटक गयीं और भटकती जा रही हैं, यह सबके सामने है। आज के समय में जो व्यावहारिक नहीं है या नहीं जिनकी उपयोगिता नहीं रही, उन्हें छोड़ दें, तो शेष सभी संस्कार अपनी वैज्ञानिक महत्ता से सारे समाज को नई दिशा दे सकते हैं। इस दृष्टि से इन्हें क्रांतिधर्मी अभियान बनाने की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ==&lt;br /&gt;
[[Image:AnnaPrashan (Anna Prashan) - Hindu First Rice Eating Ceremony.JPG|right|thumb|300px|अन्नप्राशन संस्कार]]&lt;br /&gt;
भारत को पुनः एक महान राष्ट्र बनना है, [[विश्व गुरु]] का स्थान प्राप्त करना है, उसके लिए जिन श्रेष्ठ व्यक्तियों की आवश्यकता बड़ी संख्या में पड़ती है, उनके विकसित करने के लिए यह संस्कार प्रक्रिया अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।। प्रत्येक विचारशील एवं भावनाशील को इससे जुड़ना चाहिए। शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा सहित तमाम गायत्री शक्तिपीठों, गायत्री चेतना केन्द्रों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा केन्द्रों में इसकी व्यवस्था बनाई गई है। हर वर्ग में युग पुरोहित विकसित किए जा रहे हैं। आशा की जाती है कि विज्ञजन, श्रद्धालुजन इसका लाभ उठाने एवं जन-जन तक पहुँचाने में पूरी तत्परता बरतेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[राम शर्मा|श्रीराम शर्मा आचार्य]] ने युग की तमाम समस्याओं का अध्ययन किया और उनके समायोचित समाधान भी निकाले। इसी क्रम में उन्होंने संस्कार प्रक्रिया के पुनर्जीवन का भी अभियान चलाया। उन्होंने संस्कारों को विवेक एवं विज्ञान सम्मत स्वरूप दिया, उनके साथ प्रखर लोक शिक्षण जोड़ा, कर्मकाण्डों को सर्व सुलभ, प्रभावी और कम खर्चीला बनाया। युग निर्माण के अन्तर्गत उनके सफल प्रयोग बड़े पैमाने पर किए गए। इसके लिए उन्होंने प्रचलित संस्कारों में से वर्तमान समय के अनुकूल केवल बारह संस्कार (पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकर्म (मुण्डन, शिखास्थापन)- अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत (दीक्षा), विवाह, वानप्रस्थ, अन्येष्टि, मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार), जन्मदिवस एंव विवाह दिवस) पर्याप्त माने हैं। इन संस्कारों को उपयुक्त समय पर उपयुक्त वातावरण में सम्पन्न करने-कराने के असाधारण लाभ लोगों ने पाए हैं। उनके विवरण निम्नानुसार हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[पुंसवन संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; :संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के स...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[नामकरण संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;: बालक का नाम उसकी पहचान के लिए नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता �...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[चूड़ाकर्म संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (मुण्डन, शिखा स्थापना):स्थूल दृष्टि से प्रसव के साथ सिर पर आए वालों को हटाकर खोपड़ी की सफाई करना आवश्यक होता है, सूक्ष्म दृष्टि से शिशु के व्यवस्थित बौद्धिक विकास, कुविचारों के उच्छेदन, श्रेष्ठ व�...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[अन्नप्राशन संस्कार|अन्नप्राशसन संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:जब शिशु के दाँत उगने लगे, मानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। स्थूल (अन्नमयकोष) के विकास के लिए तो अन्न के विज्ञान सम्मत उपयोग क...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[विद्यारंभ संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:जब बालक/ बालिका की आयु शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इसमें समारोह के माध्यम से जहाँ एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[यज्ञोपवीत|यज्ञोपवीत संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:जब बालक/ बालिका का शारीरिक-मानसिक विकास इस योग्य हो जाए कि वह अपने विकास के लिए आत्मनिर्भर होकर संकल्प एवं प्रयास करने लगे, तब उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक एवं सामाजिक अनुशासनों ...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[विवाह संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विव...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[वानप्रस्थ संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ यथा शीघ्र करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देन...&lt;br /&gt;
[[Image:Bagamati cremation.jpg|right|thumb|300px|अन्त्येष्टि संस्कार]]&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[अन्त्येष्टि क्रिया|अन्त्येष्टि संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:&amp;#039;मृत्यु&amp;#039; जीवन का एक अटल सत्य है। इसे जरा-जीर्ण को नवीन-स्फूर्तिवान जीवन में रूपान्तरित करने वाला महान देवता भी कह सकते हैं। जीव चेतना एक यज्ञीय प्रक्रिया के अंतर्गत ...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मरणोत्तर&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ([[श्राद्ध|श्राद्ध संस्कार]]): मरणोत्तर ([[श्राद्ध]] संस्कार) जीवन का एक अबाध प्रवाह है। काया की समाप्ति के बाद भी जीव यात्रा रुकती नहीं है। आगे का क्रम भी भलीप्रकार सही दिशा में चलता रहे, इस हेतु मरणो...&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[जन्मदिवस संस्कार]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;: मनुष्य को अन्यान्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जन्मदिन वह पावन पर्व है, जिस दिन स्रष्टा ने हमें श्रेष्ठतम जीवन में पदोन्तन किया। श्रेष्ठ जीवन प्रदान करने के से...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
{{षोडश संस्कार}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20160305145101/http://hindi.awgp.org/?gayatri%2FAWGP_Offers%2Fparivar_nirman%2Fsanskar%2F गायत्री शांतिकुंज की ओर से]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100103232119/http://www.marathimati.com/balmitra/ShubhamKaroti/ShubhamKaroti.asp संस्कार]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Ujjjval</name></author>
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