"तुलुगमा पद्धति": अवतरणों में अंतर
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तुलुगमा पद्धति का प्रयोग उजबेक लोग युद्ध में प्रायः किया करते थे। यह युद्ध की एक ऐसी पद्धति थी जिसके अनुसार फौजें पहले शत्रु सेना के बगल की ओर मुड़ती थीं और फिर एक साथ सामने और पीछे की ओर हमला कर तेजी से तीरों की बौछार करती थी और यदि सफल नहीं हुई और शत्रु सेना ने उन्हें धकेल दिया तो ऐसी स्थिति में बहुत तेजी से भाग जाती थीं। सैन्य-संचालन की यह विधि बाबर ने शैबानी से 'सेर-ए-कुल' के युद्ध में सीखी थी और उसने इसका प्रयोग पानीपत के प्रथम युद्ध में तथा बाद में | तुलुगमा पद्धति का प्रयोग उजबेक लोग युद्ध में प्रायः किया करते थे। यह युद्ध की एक ऐसी पद्धति थी जिसके अनुसार फौजें पहले शत्रु सेना के बगल की ओर मुड़ती थीं और फिर एक साथ सामने और पीछे की ओर हमला कर तेजी से तीरों की बौछार करती थी और यदि सफल नहीं हुई और शत्रु सेना ने उन्हें धकेल दिया तो ऐसी स्थिति में बहुत तेजी से भाग जाती थीं। सैन्य-संचालन की यह विधि बाबर ने शैबानी से 'सेर-ए-कुल' के युद्ध में सीखी थी और उसने इसका प्रयोग पानीपत के प्रथम युद्ध में तथा बाद में खानवा,चंदेरी,घग्घर युद्ध व इनके अलावा अन्य युद्धों में किया। | ||
== प्रक्रिया == | |||
तुलुगमा पद्धति मे रणभूमि में मौजूद राजा अपने विश्वसनीय योद्धाओं से मिलकर एक रणनीति तैयार करता है जिसमें सेना को चार टुकङो मे बांट दिया जाता है,प्रथम दोनों टूकङी राजा के आगे कि ओर दाय व बाय की ओर तथा दुसरी दोनों टुकड़ियां पीछे की ओर इसी तरह तरह तैनात रहती है। | |||
<ref>''भारतीय इतिहास एवं संस्कृति एन्साइक्लपीडिया'', डॉ॰ हुकमचंद जैन एवं एस॰सी॰ विजय, जैन प्रकाशन मंदिर, जयपुर, संस्करण-2008, पृष्ठ-310.</ref> | |||
==इन्हें भी देखें== | ==इन्हें भी देखें== | ||
१९:१६, २२ अगस्त २०२२ के समय का अवतरण
तुलुगमा पद्धति युद्ध की एक पद्धति थी जो उज़बेक लोगों में प्रचलित थी। बाबर ने इसका प्रयोग पानीपत के प्रथम युद्ध में किया था।
परिचय[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
तुलुगमा पद्धति का प्रयोग उजबेक लोग युद्ध में प्रायः किया करते थे। यह युद्ध की एक ऐसी पद्धति थी जिसके अनुसार फौजें पहले शत्रु सेना के बगल की ओर मुड़ती थीं और फिर एक साथ सामने और पीछे की ओर हमला कर तेजी से तीरों की बौछार करती थी और यदि सफल नहीं हुई और शत्रु सेना ने उन्हें धकेल दिया तो ऐसी स्थिति में बहुत तेजी से भाग जाती थीं। सैन्य-संचालन की यह विधि बाबर ने शैबानी से 'सेर-ए-कुल' के युद्ध में सीखी थी और उसने इसका प्रयोग पानीपत के प्रथम युद्ध में तथा बाद में खानवा,चंदेरी,घग्घर युद्ध व इनके अलावा अन्य युद्धों में किया।
प्रक्रिया[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
तुलुगमा पद्धति मे रणभूमि में मौजूद राजा अपने विश्वसनीय योद्धाओं से मिलकर एक रणनीति तैयार करता है जिसमें सेना को चार टुकङो मे बांट दिया जाता है,प्रथम दोनों टूकङी राजा के आगे कि ओर दाय व बाय की ओर तथा दुसरी दोनों टुकड़ियां पीछे की ओर इसी तरह तरह तैनात रहती है। [१]
इन्हें भी देखें[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
सन्दर्भ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
बाहरी कड़ियाँ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
- ↑ भारतीय इतिहास एवं संस्कृति एन्साइक्लपीडिया, डॉ॰ हुकमचंद जैन एवं एस॰सी॰ विजय, जैन प्रकाशन मंदिर, जयपुर, संस्करण-2008, पृष्ठ-310.