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परमाणुवाद - भारतपीडिया

परमाणुवाद, परमाणु मॉडल या परमाणु सिद्धान्त (Atomic theory) के विकास में अनेक विचारकों ने भाग लिया है। प्राचीन विचारकों में डिमाक्राइटस और कणाद के नाम और आधुनिक विचारकों में न्यूटन, रदरफोर्ड और हाइसनबर्ग के नाम विशेष महत्व के हैं।

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परमाणु का आधुनिक मॉडल यह है कि परमाणु के केन्द्र में नाभिक होता है जिसमें न्यूट्रॉन और प्रोटॉन होते हैं, नाभिक का आकार परमाणु के आकार की तुलना में बहुत छोटा होता है, नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों का बादल होता है।
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रदरफोर्ड द्वारा प्रस्तुत किया गया परमाणु का मॉडल

डिमाक्राइटस के अनुसार परमाणु परिमाण, आकार और स्थान में एक दूसरे से भिन्न हैं, परंतु इनमें गुणभेद नहीं। संयोग वियोग में गति आवश्यक है और गति अवकाश में ही हो सकती है। इसलिये परमाणुओं के अतिरिक्त अवकाश भी सत्ता का अंतिम अंश है। बोझिल होने के कारण परमाणु नीचे गिरते हैं; भारी परमाणु अधिक वेग से गिरते हैं और नीचे के हलके परमाणुओं से आ टकराते हैं। इस तरह परमाणुओं में संयोग होता है।

न्यूटन ने परमाणुओं को भारी, ठोस और एकरस माना और उनमें गुणभेद को भी स्वीकार किया। परमाणु की सरलता चिरकाल तक मान्य रही; नवीन भौतिकी ने इसे अमान्य ठहराया है।

रदरफोर्ड के अनुसार परमाणु एक नन्हा सा सौरमंडल है, जिसमें अनेक इलेक्ट्रान अत्यधिक वेग से केंद्र के गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। हाइसनवर्ग का अनिर्णीतता का नियम एक और पुराने विचार को ठोकर लगाता है, इस नियम के अनुसार परमाणुओं के समूहों की दशा में नियम का शासन प्रतीत होता है, परंतु व्यक्तिगत क्रिया में परमाणु नियम की उपेक्षा करते हैं; इनकी गति अनिर्णीत है।

कणाद ने परमाणुओं में गुणभेद देखा। भौतिक द्रव्यों में गुणभेद है और इस भेद के कारण हमें रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द का बोध होता है। संभवत:, सवेदनाओं के भेद ने उसे परमाणुओं में गुणभेद देखने को प्रेरणा की। नवीन विज्ञान कहता है कि कुछ तत्वों को छोड़ अन्य तत्वों के परमाणु अकेले नहीं मिलते, अपितु २, ३, ४ के समूहों में मिलते हैं। कणाद के विचार में परमाणुओं का मिलकर भी 'चतुरणुक' बनाना सृष्टि में मौलिक घटना है, इस संयोग का टूटना ही संहार या प्रलय है।

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