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मान्धातृ

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भगवान कृष्ण और मान्धातृ

मान्धातृ मान्धाता अयोध्या के राजा, वैदिक काल के सम्राट थे।

सूर्यवंशी क्षत्रिय कोलिय (कोली) के इष्टदेव भगवान श्री मान्धाता महाराजा हैं। राजा मान्धाता ने पूरी पृथ्वी पर शासन किया, इसी कारण से मांधाता को पृथ्वीपति के नाम से जाना जाता है

मान्धातृ अथवा मांधाता, इक्ष्वाकुवंशीय नरेश युवनाश्व और गौरी के पुत्र। उन्हे सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों का कर्ता और दानवीर, धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् जो वैदिक अयोध्या नरेश मंधातृ से अभिन्न माना जाता है।

यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और 50 कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो एक ही साथ सौभरि ऋषि से ब्याही गई थीं। पूत्रेष्ठियज्ञ के हवियुक्त मंत्रपूत जल को प्यास में भूल से पी लेने के कारण युवनाश्व को गर्भ रह गया जिसे ऋषियों ने उसका पेट फाड़कर निकाला। वह गर्भ एक पूर्ण बालक के रूप में उत्पन्न हुआ था जो इंद्र की अमृतस्त्राविणी तर्जनी उँगली चूसकर रहस्यात्मक ढंग से पला और बढ़ा। इंद्रपालित (इंद्र के यह कहने पर कि माता के स्तनों के अभाव में यह शिशु "मेरे द्वारा धारण किया" अथवा पाला जाएगा) होने के कारण उसका नाम मांधाता पड़ा। यह बालक आगे चलकर पर पराक्रमी हुआ और रावण समेत अनेक योद्धाओं को इसने परास्त किया। इसने विष्णु तथा उतथ्य से राजधर्म और वसुहोम से दंडनीति की शिक्षा ली थी। गर्वोन्मत्त होने पर या लवणासुर द्वारा युद्ध में मारा गया।

इनके जन्म के बारे में एक बात यह भी पता चलती है कि इनका जन्म धनु लग्न में अर्ध रात्रि से पहले लगभग रात ९-१०बजे हुआ था व इनके जन्म के समय सभी ग्रह उच्च के थे। जिससे ये चक्रवर्ती सम्राट बने। पर ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य उच्च हों तो बुध उच्च नहीं हो सकते तो इनके जन्म के बुध मेष अथवा मिथुन के ही होंगे।

साँचा:भारतीय पौराणिक वंशावली