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विशेषाधिकार

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सम्राट चार्ल्स चतुर्थ का विशेषाधिकार

राज्य अथवा किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा किसी छोटे समूह को दिया गया अधिकार/छूट (इम्युनिटी) को विशेषाधिकार (privilege) कहलाता है।

विभिन्न प्रकार के विशेषाधिकार[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

  • स्थानीय विशेषाधिकार
  • व्यक्तिगत विशेषाधिकार
  • राजनयिक विशेषाधिकार, आदि

भारत में संसदीय विशेषाधिकार[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

संसदीय विशेषाधिकार वे विशिष्‍ट अधिकार हैं जो संसद के दोनों सदनों को, उसके सदस्‍यों को और समितियों को प्राप्‍त है। विशेषाधिकार इस दृष्‍टि से दिए जाते हैं कि संसद के दोनों सदन, उसकी समितियां और सदस्‍य स्‍वतंत्र रूप से काम कर सकें। उनकी गरिमा बनी रहे परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि कानून की नजरों में साधारण नागरिकों के मुकाबले में विशेषाधिकार प्राप्‍त सदस्‍यों की स्‍थिति भिन्‍न है। जहां तक विधियों के लागू होने का संबंध है, सदस्‍य लोगों के प्रतिनिधि होने के साथ साथ साधारण नागरिक भी होते हैं। मूल विधि यह है कि संसद सदस्‍यों सहित सभी नागरिक कानून की नजरों में बराबर माने जाने चाहिए। जो दायित्‍व अन्‍य नागरिकों के हों वही उनके भी होते हैं और शायद सदस्‍य होने के नाते कुछ अधिक होते हैं।

संसदों का सबसे महत्‍वपूर्ण विशेषाधिकार है सदन और उसकी समितियों में पूरी स्‍वतंत्रता के साथ अपने विचार रखने की छूट। संसद के किसी सदस्‍य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरूद्ध किसी न्‍यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। संसदीय विशेषाधिकारों की सूचियां तैयार की जा सकती हैं। वास्‍तव में ये तैयार भी की गईं हैं परंतु ऐसी कोई भी सूची पूरी नहीं है। थोड़े में कह सकते हैं कि कोई भी वह काम जो सदन के, उसकी समितियों के या उसके सदस्‍यों के काम में किसी प्रकार की बाधा डाले वह संसदीय विशेषाधिकार का हनन करता है। उदाहरण के लिए, कोई सदस्‍य न केवल उस समय गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जबकि उस सदन का, जिसका कि वह सदस्‍य हो, अधिवेशन चल रहा हो या जबकि उस संसदीय समिति की, जिसका वह सदस्‍य हो, बैठक चल रही हो, या जबकि दोनों सदनों की संयुक्‍त बैठक चल रही हो, या जबकि दोनों सदनों की संयुक्‍त बैठक चल रही हो। संसद के अधिवेशन के प्रारंभ से 40 दिन पहले और उसकी समाप्‍ति से 40 दिन बाद या जबकि वह सदन को आ रहा हो या सदन के बाहर जा रहा हो, तब भी उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

संसद के परिसरों के भीतर, अध्‍यक्ष/सभापति की अनुमति के बिना, दीवानी या आपराधिक कोई कानूनी ‘समन’ नहीं दिए जा सकते हैं। अध्‍यक्ष/सभापति की अनुमति के बिना संसद भवन के अंदर किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। क्‍योंकि संसद के परिसरों में केवल संसद के सदन के या अध्‍यक्ष/सभापति के आदेशों का पालन होता है। यहां अन्‍य किसी सरकारी प्राधिकारी के या स्‍थानीय प्रशासन के आदेश का पालन नहीं होता।

संसद का प्रत्‍येक सदन अपने विशेषाधिकार का स्‍वयं ही रक्षक होता है। विशेषाधिकार भंग करने या सदन की अवमानना करने वाले को भर्त्‍सना करके या ताड़ना करके या निर्धारित अवधि के लिए कारावास द्वारा दंडित कर सकता है। स्‍वयं अपने सदस्‍यों के मामले में सदन अन्‍य दो प्रकार के दंड दे सकता है, अर्थात सदन की सेवा से निलंबित करना और निकाल देना, किसी सदस्‍य को एक निर्धारित अवधि के लिए सदन की सेवा से निलंबित किया जा सकता है। किसी अति गंभीर मामले में सदन से निकाला जा सकता है।

सदन अपराधियों को ऐसी अवधि के लिए कारावास का दंड दे सकता है जो साधारणतया सदन के अधिवेशन की अवधि से अधिक नहीं होती। जैसे ही सदन का सत्रावसान होता है, बंदी को मुक्‍त कर दिया जाता है। दर्शकों द्वारा गैलरी में नारे लगाकर और/अथवा इश्‍तिहार फेंककर सदन की अवमानना करने के कारण, दोनों सदनों ने, समय समय पर, अपराधियों को सदन के उस दिन स्‍थगित होने तक कारावास का दंड दिया है।

सदन का दांडिक क्षेत्र अपने सदनों तक और उनके सामने किए गए अपराधों तक ही सीमित न होकर सदन की सभी अवमाननाओं पर लागू होता है। चाहे अवमानना सदस्‍यों द्वारा की गई हो या ऐसे व्‍यक्‍तियों द्वारा जो सदस्‍य न हों। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि अपराध सदन के भीतर किया गया है या उसके परिसर से बाहर। सदन का विशेषाधिकार भंग करने या उसकी अवमानना करने के कारण व्‍यक्‍तियों को दंड देने की सदन की यह शक्‍ति संसदीय विशेषाधिकार की नींव है। सदन की ऐसी पंरपरा भी रही है कि सदन का विशेषाधिकार भंग करने या सदन की अवमानना करने के दोषी व्‍यक्‍तियों द्वारा स्‍पष्‍ट रूप से और बिना किसी शर्त के दिल से व्‍यक्‍त किया गया खेद सदन द्वारा स्‍वीकार करर लिया जाता है। ऐसे में साधारणतया सदन अपनी गरिमा को देखते हुए ऐसे मामलो पर आगे कार्यवाही न करने का फैसला करता है।

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]