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इज़राइल का इतिहास

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इजराइल का ध्वज

इज़राइल संसार के यहूदी धर्मावलम्बियों के प्राचीन राष्ट्र का नया रूप है। इज़रायल का नया राष्ट्र 14 मई सन् 1948 को अस्तित्व में आया। इज़रायल राष्ट्र, प्राचीन फ़िलिस्तीन अथवा पैलेस्ताइन का ही बृहत् भाग है।

आदि काल[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

यहूदियों के धर्मग्रंथ "पुराना अहदनामा" के अनुसार यहूदी जाति का निकास पैगंबर हज़रत अबराहम (इस्लाम में इब्राहिम, ईसाइयत में Abraham) से शुरू होता है। अबराहम का समय ईसा से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व है। अबराहम के एक बेटे का नाम इसहाक और पोते का याकूब (ईसाईयत में Jacob) था। याकूब का ही दूसरा नाम इज़रायल था। याकूब ने यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक किया। इन सब जातियों का यह सम्मिलित राष्ट्र इज़रायल के नाम के कारण "इज़रायल" कहलाने लगा। आगे चलकर इबरानी भाषा में इज़रायल का अर्थ हो गया-"ऐसा राष्ट्र जो ईश्वर का प्यारा हो"।

याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा अथवा जूदा था। यहूदा के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी (जूदा-ज्यूज़) कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म (जुदाइज्म) कहलाया। प्रारंभ की शताब्दियों में याकूब के दूसरे बेटों की संतानें इज़रायल या "बनी इज़रायल" के नाम से प्रसिद्ध रही। फ़िलिस्तीन और अरब के उत्तर में याकूब की इन संततियों की "इज़रयल" और "जूदा" नाम की एक दूसरी से मिली हुई किंतु अलग-अलग दो छोटी-छोटी सल्तनतें थीं। दोनों में शताब्दियों तक गहरी शत्रुता रही। अंत में दोनों मिलकर एक हो गईं। इस सम्मिलन के परिणामस्वरूप देश का नाम इज़रायल पड़ा और जाति का यहूदी।

यहूदियों के प्रारंभिक इतिहास का पता अधिकतर उनके धर्मग्रंथें से मिलता है जिनमें मुख्य बाइबिल का वह पूर्वार्ध है जिसे "पुराना अहदनामा" (ओल्ड टेस्टामेंट) कहते हैं। पुराने अहदनामे में तीन ग्रंथ शामिल हैं। सबसे प्रारंभ में "तौरेत" (इबरानी थोरा) है। तौरेत का शब्दिक अर्थ वही है जो "धर्म" शब्द का है, अर्थात् धारण करने या बाँधनेवाला। दूसरा ग्रंथ "यहूदी पैगंबरों का जीवनचरित" और तीसरा "पवित्र लेख" है। इन तीनों ग्रंथों का संग्रह "पुराना अहदनामा" है। पुराने अहदनामें में 39 खंड या पुस्तकें हैं। इसका रचनाकाल ई.पू. 444 से लेकर ई.पू. 100 के बीच है। पुराने अहदनामे में सृष्टि की रचना, मनुष्य का जन्म, यहूदी जाति का इतिहास, सदाचार के उच्च नियम, धार्मिक कर्मकांड, पौराणिक कथाएँ और यह्वे के प्रति प्रार्थनाएँ शामिल हैं।

अब्राहम और मूसा[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

ईसाई धर्म, इस्लाम तथा यहूदी धर्म को संयुक्त रूप से इब्राहीमी धर्म भी कहते हैं क्योंकि अब्राहम तीनों धर्म के मूल में हैं।

यहूदी जाति के आदि संस्थापक अब्राहम को अपने स्वतंत्र विचारों के कारण दर-दर की खाक छाननी पड़ी। अपने जन्मस्थान ऊर (सुमेर का प्राचीन नगर) से सैकड़ों मील दूर निर्वासन में ही उनकी मृत्यु हुर्ह। अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम मूसा का है। मूसा ही यहूदी जाति के मुख्य व्यवस्थाकार या स्मृतिकार माने जाते हैं। मूसा के उपदेशों में दो बातें मुख्य हैं : एक-अन्य देवी देवताओं की पूजा को छोड़कर एक निराकार ईश्वर की उपासना और दूसरी- सदाचार के दस नियमों का पालन। मूसा ने अनेकों कष्ट सहकर ईश्वर के आज्ञानुसार जगह-जगह बँटी हुई अत्याचारपीड़ित यहूदी जाति को मिलकार एक किया और उन्हें फ़िलिस्तीन में लाकर बसाया। यह समय ईसा से प्राय: 1,500 वर्ष पूर्व का था। मूसा के समय से ही यहूदी जाति के विखरे हुए समूह स्थायी तौर पर फ़िलिस्तीन में आकर बसे और उसे अपना देश समझने लगे। बाद में अपने इस नए देश का उन्होंने "इज़रायल" की संज्ञा दी।

अब्राहम ने यहूदियों का उत्तरी अरब और ऊर से फ़िलिस्तीन की ओर संक्रमण कराया। यह उनका पहला संक्रमण था। दूसरी बार जब उन्हें मिस्र छोड़ फ़िलिस्तीन भागना पड़ा तब उनके नेता हज़रत मूसा थे (प्राय: 16वीं सदी ई.पू.)। यह यहूदियों का दूसरा संक्रमण था जो महान् बहिरागमन (ग्रेट एग्ज़ोडस) के नाम से प्रसिद्ध है।

अब्राहम और मूसा के बाद इज़रायल में जो दो नाम सबसे अधिक आदरणीय माने जाते हैं वे दाऊद (ईसाइयत में David) और उसके बेटे सुलेमान (ईसाइयत में Solomons) के हैं। सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इज़रायल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान ने समुद्रगामी जहाजों का एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार कराया और दूर-दूर के देशों के साथ तिजारत शुरु की। अरब, एशिया कोचक, अफ्रीका, यूरोप के कुछ देशों तथा भारत के साथ इज़रायल की तिजारत होती थी। सोना, चाँदी, हाथीदाँत और मोर भारत से ही इज़रायल आते थे। सुलेमान उदार विचारों का था। सुलेमान के ही समय इबरानी यहूदियों की राष्ट्रभाषा बनी। 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन् 937 ई.पू. में सुलेमान की मृत्यु हुई।

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८३० ईसा पूर्व में इजराइल और जूदा (यहूदा) राज्य

सुलेमान की मृत्यु से यहूदी एकता को बहुत बड़ा धक्का लगा। सुलेमान के मरते ही इज़रायली और जूदा (यहूदा) दोनों फिर अलग-अलग स्वाधीन रियासतें बन गईं। सुलेमान की मृत्यु के बाद 50 वर्ष तक इज़रायल और जूदा के आपसी झगड़े चलते रहे। इसके बाद लगभग 884 ई.पू. में उमरी नामक एक राजा इज़रायल की गद्दी पर बैठा। उसने फिर दोनों शाखों में प्रेमसंबंध स्थापित किया। किंतु उमरी की मृत्यु के बाद यहूदियों की ये दोनों शाखें सर्वनाशी युद्ध में उलझ गईं।

यहूदियों की इस स्थिति को देखकर असुरिया के राजा शुलमानु अशरिद पंचम ने सन् 722 ई.पू. में इज़रायल की राजधानी समरिया पर चढ़ाई की और उसपर अपना अधिकार कर लिया। अशरिद ने 27,290 प्रमुख इज़रायली सरदारों को कैद करके और उन्हें गुलाम बनाकर असुरिया भेज दिया और इज़रायल का शासनप्रबंध असूरी अफसरों को सपुर्द कर दिया। सन् 610 ई.पू. में असुरिया पर जब खल्दियों ने आधिपत्य कर लिया तब इज़रायल भी खल्दी सत्ता के अधीन हो गया।

हख़ामनी राजवंश[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

सन् 550 ई.पू. में ईरान सुप्रसिद्ध हख़ामनी राजवंश का समय आया। इस कुल के सम्राट् कुरुश ने जब बाबुल की खल्दी सत्ता पर विजय प्राप्त की तब इज़रायल और यहूदी राज्य भी ईरानी सत्ता के अंतर्गत आ गए। आसपास के देशों में उस समय ईरानी सबसे अधिक प्रबुद्ध, विचारवान् और उदार थे। अपने अधीन देशों के साथ ईरानी सम्राटों का व्यवहार न्याय और उदारता का होता था। प्रजा के उद्योग धंधों को वे संरक्षा देते थे। समृद्धि उनके पीछे-पीछे चलती थी। उनके धार्मिक विचार उदार थे। ईरानियों का शासनकाल यहूदी इतिहास का कदाचित् सबसे अधिक विकास और उत्कर्ष का काल था। जो हजारों यहूदी बाबुल में निर्वासित और दासता में पड़े थे उन्हें ईरानी सम्राट् कुरु ने मुक्त कर अपने देश लौट जाने की अनुमति दी। कुरु ने जेरूसलम के मंदिर के पुराने पुरोहित के एक पौत्र योशुना और यहूदी बादशाह दाऊद के एक निर्वासित वंशज जेरुब्बाबल को जरूसलम की वह संपत्ति देकर, जो लूटकर बाबुल लाई गई थी, वापस जेरूसलम भेजा और अपने खर्च पर जेरूसलम के मंदिर का फिर से निर्माण कराने की आज्ञा दी। इज़रायल और यहूदा के हजारों घरों में खुशियाँ मनाई गईं। शताब्दियों के पश्चात् इज़रायलियों को साँस लेने का अवसर मिला।

यही वह समय था जब यहूदियों के धर्म ने अपना परिपक्व रूप धारण किया। इससे पूर्व उनके धर्मशास्त्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जबानी प्राप्त होते रहते थे। अब कुछ स्मृति के सहारे, कुछ उल्लेखों के आधार पर धर्म ग्रंथों का संग्रह प्रारंभ हुआ। इनमें से थोरा या तौरेत का संकलन 444 ई.पू. में समाप्त हुआ।

दोनों समय का हवन, जिसमें लोहबान जैसी सुगंधित चीजें, खाद्य पदार्थ, तेल इत्यादि के अतिरिक्त किसी मेमने, बकरे, पक्षी या अन्य पशु की आहुति दी जाती थी, यहूदी ईश्वरोपासना का अवश्यक अंग था। ऋग्वेद के "आहिताग्नि" पुरोहितों के समान यहूदी पुरोहित इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वेदी पर की आग चौबीस घंटे किसी तरह बुझने न पाए।

इज़रायली धर्मग्रंथों में शायद सबसे सुंदर पुस्तक "दाऊद के भजन" हैं। पुराने अहदनामे की यह सबसे अधिक प्रभावोत्पादक पुस्तक समझी जाती है। जिस प्रकार दाऊद के भजन भक्तिभावना के सुंदर उदाहरण हैं उसी प्रकार सुलेमान की अधिकांश कहावतें हर देश और हर काल के लिए कीमती हैं और सचाई से भरी हैं। एक तीरा यहूदी धर्मग्रंथ "प्रचारक" (एक्लज़िएस्टेस) इन ग्रंथों के बाद का लिखा हुआ है।

हख़ामनी साम्राज्य का अन्त[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

सन् 330 ई.पू. में सिकन्दर ने ईरान को जीतकर वहाँ के हख़ामनी साम्राज्य का अन्त कर दिया। सन् 320 ई.पू. में सिकन्दर के सेनापति तोलेमी प्रथम ने इज़रायल और यहूदा पर आक्रमण कर उसपर अपना अधिकर कर लिया। बाद में सन् 198 ई॰पू॰ में एक दूसरे यूनानी परिवार सेल्यूकस राजवंश का अंतिओकस चतुर्थ यहूदियों के देश का अधिराज बना। जेरूसलम के बलवे से रुष्ट होकर अन्तिओकस ने उसके यहूदी मन्दिर को लूट लिया और हजारों यहूदियों का वध करवा दिया, शहर की चहारदीवारी को गिराकर जमीन से मिला दिया और शहर यूनानी सेना के सपुर्द कर दिया।

अंतिओकस ने यहूदी धर्म का पालन करना इज़रायल और यहूदा दोनों जगह कानूनी अपराध घोषित कर दिया। यहूदी मन्दिरों में यूनानी मूर्तियाँ स्थापित कर दी गईं और तौरेत की जो भी प्रतियाँ मिलीं आग के सपुर्द कर दी गईं।

यह स्थिति सन् 142 ई॰पू॰ तक चलती रही। सन् 142 ई॰पू॰ में एक यहूदी सेनापति साइमन ने यूनानियों को हराकर राज्य से बाहर निकाल दिया और यहूदा तथा इज़रायल की राजनीतिक स्वाधीनता की घोषण कर दी। यहूदियों की यह स्वाधीनता 141 ई॰पू॰ से 63 ई॰पू॰ तक बराबर बनी रही।

यह वह समय था जब भारत में बौद्ध भिक्षु और भारतीय महात्मा अपने धर्म का प्रचार करते हुए पश्चिमी एशिया के देशों में फैल गए। इन भारतीय प्रचारकों ने यहूदी धर्म को भी प्रभवित किया। इसी प्रभाव के परिणामस्वरूप यहूदियों के अन्दर एक नए "एस्सेनी" नामक सम्प्रदाय की स्थापना हुई। हर एस्सेनी ब्राह्म मुहूर्त में उठता था और सूर्योदय से पहले प्रात: क्रिया, स्नान, ध्यान, उपासना आदि से निवृत हो जाता था। सुबह के स्नान के अतिरिक्त दोनों समय भोजन से पहले स्नान करना हर एस्सेनी के लिए आवश्यक था। उनका सबसे मुख्य सिद्धान्त था-अहिंसा। हर एस्सेनी हर तरह की पशुबलि, मांसभक्षण या मदिरापान के विरुद्ध थे। हर एस्सेनी को दीक्षा के समय प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी :

"मैं यह्वे अर्थात् परमात्मा का भक्त रहूँगा। मैं मनुष्य मात्र के साथ सदा न्याय का व्यवहार करूँगा। मैं कभी किसी की हिंसा न करूँगा और न किसी को हानि पहुँचाऊँगा। मनुष्य मात्र के साथ मैं अपने वचनों का पालन करूँगा। मैं सदा सत्य से प्रेम करूँगा।" आदि।

उसी समय के निकट हिन्दू दर्शन के प्रभाव से इज़रायल में एक और विचारशैली ने जन्म लिया जिसे क़ब्बालह कहते हैं। क़ब्बालह के थोड़े से सिद्धान्त ये हैं-

"ईश्वर अनादि, अनन्त, अपरिमित, अचिन्त्य, अव्यक्त और अनिर्वचनीय है। वह अस्तित्व और चेतना से भी परे है। उस अव्यक्त से किसी प्रकार व्यक्त की उत्पत्ति हुई और अचिन्त्य से चिन्त्य की। मनुष्य परमेश्वर के केवल इस दूसरे रूप का ही मनन कर सकता है। इसी से सृष्टि सम्भव हुई।"

क़ब्बालह की पुस्तकों में योग की विविध श्रेणियों, शरीर के भीतर के चक्रों और अभ्यास के रहस्यों का वर्णन है।

यहूदियों की राजनीतिक स्वाधीनता का अंत[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

यहूदियों की राजनीतिक स्वाधीनता का अंत उस समय हुआ जब सन् 66 ई.पू. में रोम के जनरल पांपे ने तीन महीने के घेरे के पश्चात् जेरूसलम के साथ-साथ सारे देश पर अधिकार कर लिया। इतिहासलेखकों के अनुसार हजारों यहूदी लड़ाई में मारे गए और 12,000 यहूदी कत्ल कर दिए गए।

इसके बाद सन् 135 ई. में रोम के सम्राट् हाद्रियन ने जेरूसलम के यहूदियों से रुष्ट होकर एक-एक यहूदी निवासी को कत्ल करवा दिया। वहाँ की एक-एक ईंट गिरवा दी और शहर की समस्त जमीन पर हल चलवाकर उसे बराबर करवा दिया। इसके पश्चात् अपने नाम एलियास हाद्रियानल पर ऐंलिया कावितोलिना नामक नया रोमी नगर उसी जगह निर्माण कराया और आज्ञा दे दी कि कोई यहूदी इस नए नगर में कदम न रखे। नगर के मुख्य द्वार पर रोम के प्रधान चिह्न सुअर की एक मूर्ति कायम कर दी गई। इस घटना के लगभग 200 वर्ष बाद रोम के पहले ईसाई सम्राट् कोंस्तांतीन ने नगर का जेरूसलम नाम फिर से प्रचलित किया।

अरबों का अधिकार[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

छठी ई॰ तक इज़रायल पर रोम और उसके पश्चात् पूर्वी रोमी साम्राज्य बीज़ोंतीन का प्रभुत्व कायम रहा। खलीफ़ा अबूबक्र और खलीफ़ा उमर के समय अरब और रोमी (Bizantine) सेनाओं में टक्कर हुई। सन् 636 ई. में खलीफ़ा उमर की सेनाओं ने रोम की सेनाओं को पूरी तरह पराजित करके फ़िलिस्तीन पर, जिसमें इज़रायल और यहूदा शामिल थे, अपना कब्जा कर लिया। खलीफ़ा उमर जब यहूदी पैगम्बर दाऊद के प्रार्थनास्थल पर बने यहूदियों के प्राचीन मन्दिर में गए तब उस स्थान को उन्होंने कूड़ा कर्कट और गन्दगी से भरा हुआ पाया। उमर और उनके साथियों ने स्वयं अपने हाथों से उस स्थान को साफ किया और उसे यहूदियों के सुपुर्द कर दिया।

जेरुसलम पर इसाइयों का अधिकार[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

प्रथम क्रूसयुद्ध के समय येरुसलम की घेराबन्दी (1099)

इज़रायल और उसकी राजधानी यरुशलम पर अरबों की सत्ता सन् 1099 ई॰ तक रही। सन् 1099 ई॰ में जेरूसलम पर ईसाई धर्म के जाँनिसारों ने अपना कब्जा कर लिया और बोलोन के गाडफ्रे को जेरूसलम का राजा बना दिया। येरुसलम राज्य की स्थापना हुई जो रोमन कैथोलिक राज्य था। ईसाइयों के इस धर्मयुद्ध में 5,60,000 सैनिक काम आए। इस युद्ध में मुसलमानों एवं यहूदियों दोनों की निर्मम हत्या की गयी या उन्हें दास के रूप में बेच दिया गया। किन्तु 88 वर्षों के शासन के बाद यह सत्ता समाप्त हो गई।

क्रूसेड या क्रूस युद्ध[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

साँचा:मुख्य

इसके पश्चात् सन् 1147 ई॰ से लेकर सन् 1204 तक ईसाइयों ने धर्मयुद्धों (क्रूसेडों) द्वारा इज़रायल पर कब्जा करना चाहा किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। सन् 1212 ई॰ में ईसाई महन्तों ने 50 हजार किशोरवयस्क बालक और बालिकाओं की एक सेना तैयार करके पाँचवें धर्मयुद्ध की घोषणा की। इनमें से अधिकांश बच्चे भूमध्यसागर में डूबकर समाप्त हो गए। इसके बाद इस पवित्र भूमि पर आधिपत्य करने के लिए ईसाइयों ने चार असफल धर्मयुद्ध और किए।

13वीं और 14वीं शताब्दी में हुलाकू और उसके बाद तैमूर लंग ने जेरूसलम पर आक्रमण करके उसे नेस्तनाबूद कर दिया। इसके पश्चात् 19वीं शताब्दी तक इज़रायल पर कभी मिस्री आधिपत्य रहा और कभी तुर्क। सन् 1914 में जिस समय पहला विश्वयुद्ध हुआ, इज़रायल तुर्की के कब्जे में था।

ब्रिटेन के अधीनता एवं नये राष्ट्र का उदय[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

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बालफोर तथा उनकी घोषणा (1917)
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संयुक्त राष्ट्रसंघ की फिलिस्तीन के विभाजन की योजना (1947)

सन् 1917 में ब्रिटिश सेनाओं ने इस पर अधिकार कर लिया। 2 नवम्बर सन् 1917 को ब्रिटिश विदेश मन्त्री बालफ़ोर ने यह घोषणा की कि इज़रायल को ब्रिटिश सरकार यहूदियों का धर्मदेश बनाना चाहती है जिसमें सारे संसार के यहूदी यहाँ आकर बस सकें। मित्रराष्ट्रों ने इस घोषण की पुष्टि की। इस घोषणा के बाद से इज़रायल में यहूदियों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती गई। लगभग 21 वर्ष (दूसरे विश्वयुद्ध) के पश्चात मित्रराष्ट्रों ने सन् 1948 में एक इज़रायल नामक यहूदी राष्ट्र की विधिवत् स्थापना की।

5 जुलाई सन 1950 को इज़रायल की पार्लामेंट ने एक नया कानून बनाया जिसके अनुसार संसार के किसी कोने से यहूदियों को इज़रायल में आकर बसने की स्वतन्त्रता मिली। यह कानून बन जाने के सात वर्षों के अन्दर इज़रायल में सात लाख यहूदी बाहर के देशों से आकर बसे।

इज़रायल में जनतन्त्री शासन है। वहाँ एकसंसदीय पार्लामेण्ट है जिसे "सीनेट" कहते हैं। इसमें 120 सदस्य सानुपातिक प्रतिनिधान की चुनाव प्रणाली द्वारा प्रति चार वर्षों के लिए चुने जाते हैं। इज़रायल का नया जनतन्त्र एक ओर आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के द्वारा देश को उन्नत बनाने में लगा हुआ है तो दूसरी ओर पुरानी परम्पराओं को भी उसने पुनर्जीवन दिया है, जिनमें से एक है शनिवार को सारे कामकाज बन्द कर देना। इस प्राचीन नियम के अनुसार आधुनिक इज़रायल में शनिवार के पवित्र "सैबथ" के दिन रेलगाड़ियाँ तक बन्द रहती हैं।

यहूदियों ने ही पश्चिमी धर्मों में नबियों और पैगम्बरों तथा इलहामी शासनों का आरम्भ और प्रचार किया। उनके नबियों ने, विशेषकर छठी सदी ई॰पू॰ के नबियों ने जिस साहस और निर्भीकता से श्रीमानों और असूरी सम्राटों को धिक्कारा है और जो बाइबिल की पुरानी पोथी में आज भी सुरक्षित है, उसका संसार के इतिहास में सानी नहीं। उन्होंने ही नेबुखदनेज्ज़ार की अपनी बाबुली कैद में बाइबिल के पुराने पाँच खण्ड (पेंतुतुख) प्रस्तुत किए। इसी से बाबुल के सम्बन्ध से ही सम्भवत: बाइबिल का यह नाम पड़ा।

स्वतन्त्रता[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

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१९४८ के अरब-इजराइल युद्ध की समाप्ति का सूचक, हाथ से बना मशि-ध्वज (इंक-फ्लैग) फहराते हुए अवराहम अदन

सन्‌ 1948 ई॰ से पहले फिलिस्तीन ब्रिटेन के औपनिवेशिक प्रशासन के अन्तर्गत एक अधिष्ठित (मैनडेटेड) क्षेत्र था। यहूदी लोग एक लम्बे अरसे से फिलिस्तीन क्षेत्र में अपने एक निजी राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे। इसी उद्देश्य को लेकर संसार के विभिन्न भागों से आकर यहूदी फिलिस्तीनी इलाके में बसने लगे। अरब राष्ट्र भी इस स्थिति के प्रति सतर्क थे। फलतः 1947 ई॰ में अरबों और यहूदियों के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया। 14 मई 1948 ई॰ को अधिवेश (मैनडेट) समाप्त कर दिया गया और इज़रायल नामक एक नए देश अथवा राष्ट्र का उदय हुआ। युद्ध जनवरी, 1949 ई॰ तक जारी रहा। न तो किसी प्रकार की शान्तिसन्धि हुई, न ही किसी अरब राष्ट्र ने इज़रायल से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किए।

सन्‌ 1957 में इज़रायल ने पुनः ब्रिटेन तथा फ्रांस से मिलकर स्वेज की लड़ाई में गाजा क्षेत्र में अधिकार कर लिया, परन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ के आज्ञानुसार उसे इस भाग को अन्ततः छोड़ना पड़ा। प्रथम युद्ध एक प्रकार से समाप्त हो गया, लेकिन अप्रत्यक्ष तनातनी बनी रही।

1967 ई॰ में स्थिति बहुत खराब हो गई और इज़रायल-सीरिया-सीमाक्षेत्र में हुई झड़पों के बाद मिस्र ने इज़रायल की सीमा पर अपनी सेना बड़ी संख्या में तैनात कर दी। राष्ट्रसंघीय पर्यवेक्षक दल को निष्कासित कर दिया गया और रक्त सागर में इज़रायल की जहाजरानी पर मिस्र द्वारा रोक लगा दी गई। 5-6 जून की रात्रि को इज़रायल ने मिस्र पर जमीनी और हवाई आक्रमण शुरू कर दिए। जार्डन भी इज़रायल के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हो गया और सीरिया की सीमाओं पर भी लड़ाई जारी हो गई। 11 जून को राष्ट्रसंघ द्वारा की गई युद्धविराम की अपील लगभग सभी युद्धरत राष्ट्रों ने स्वीकार कर ली। लेकिन इस समय तक इज़रायल गाज़ा पट्टी, स्वेज़ नहर के तट तक सिनाई प्रायद्वीप के भूभाग, जार्डन घाटी तक जार्डन के भूभाग, जेरूसलम तथा गैलिली सागर के पूर्व में स्थित सीरिया के गालन नामक पर्वतीय भाग (जिसमें क्यूनेत्रा नामक नहर भी है) पर अधिकार कर चुका था। जेरूसलम को तत्काल इज़रायल का अभिन्न अंग घोषित कर दिया गया, लेकिन शेष विजित इलाके को 'अधिकृत क्षेत्र' के रूप में ही रखा गया।

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गोलडा मेयर

फरवरी, 1969 ई॰ में लेवी एश्कोल की मृत्यु हो जाने पर श्रीमती गोलडा मायर इज़रायल की प्रधानमन्त्री नियुक्त हुईं और अक्टूबर, 1969 ई॰ के चुनाव में उन्हें पुन: प्रधानमन्त्री चुन लिया गया। युद्ध-विराम-रेखा पर और विशेष रूप से अधिकृत स्वेज़ क्षेत्र में इज़रायलियों तथा अरब राष्ट्रों एवं फिलिस्तीनी गुरिल्ला संगठन के बीच छोटी-मोटी झड़पें चलती रहीं जिनका अन्त अगस्त, 1970 ई॰ में हुए युद्धविराम समझौते के बाद ही हुआ।

इन्हें भी देखें[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]