Deprecated: Caller from MediaWiki\Cache\LinkCache::fetchPageRow ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385

Deprecated: Caller from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::selectOne ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385

Deprecated: Caller from MediaWiki\Page\PageProps::getProperties ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385
शाकद्वीपीय ब्राह्मण - भारतपीडिया

शाकद्वीपीय ब्राह्मण

imported>रोहित साव27 द्वारा परिवर्तित २१:१९, २१ जुलाई २०२१ का अवतरण (Reverted to revision 5219834 by रोहित साव27 (talk): Reverted (TwinkleGlobal))
(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

साँचा:हिन्दू धर्म सूचना मंजूषा शाकद्वीपीय ब्राह्मण, शकलद्वीपीय ब्राह्मण अथवा मग ब्राह्मण, ब्राह्मणों का एक सर्वोत्तम वर्ग है यही एक ऐसे ब्राम्हण है जिनका उल्लेख वेद और पुराणों में भी किया गया है। जो उत्तरी भारत में पाया जाता है तथा जो पुजारी, आयुर्वेदिक वैद्य आदि होते हैं। ये ब्राह्मण वर्ग में सर्वोत्तम माने जाते हैं। प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार ये शाकद्वीप से श्री कृष्ण द्वारा जम्बूद्वीप में लाए गए थे। इन्हें पुराणों में तथा श्री करपात्रीस्वामी के अनुसार दिव्य ब्राह्मण की उपाधि दी गई है। यह हिन्दू ब्राह्मणों का ऐसा वर्ग है जो मुख्यतः पूजा पाठ, वेद-आयुर्वेद, चिकित्सा, संगीत से संबंधित है। इनकी जाति मुख्यतः बिहार तथा पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में है।[] इन्हें सूर्य के अंश से उत्पन्न होने के कारण सूर्य के समान प्रताप वाला ब्राह्मण माना जाता है।

अंगूठाकार बनाने में त्रुटि हुई: फ़ाइल गायब है
शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्यांश तथा सूर्योपासक थे। सूर्यदेव का चित्र।

परिचय सम्पादित करें

शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। आज भी मगध के आसपास ही हैं। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। किन्हीं ग्रन्थों में द्वारका शाकद्वीप में स्थित कही गई है। वेद तथा पुराणों में इनका उल्लेख ब्राह्मणों की एक सर्वोत्तम जाति के रूप में है जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था। महाभारत काल में इन्हें शाक द्वीप से जम्बू द्वीप लाया गया था।

वेद पुराणों के अनुसार साकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्य से उत्पन्न हुए तथा सूर्य के समान ही उनका तेज था। वह सभी शाकद्वीप में निवास करते थे तथा योनिज न होने से दिव्य कहलाए, यह अग्रणी सूर्योपासक माने जाते हैं।[]


मनुस्मृति के अनुसार सूर्यास्त के पश्चात श्राद्ध कर्म निषेध है, ऐसे में एक शाकद्वीपीय ब्राह्मण को सूर्य वरण करके श्राद्ध सम्पन्न किया जा सकता है। यह बात उनकी विशिष्टता तथा दिव्यता का सूचक है। आध्यात्मिक तंत्र तथा पुरातन विशिष्ट चिकित्सा में इनका एकाधिकार था।[]

भारतीय ब्राह्मण स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं इसी कारण इन्हें पूर्व में दरिद्रता आदि के श्राप भी मिले हैं। अपने इसी सूक्ष्म विचारों से वे शाकद्वीपीय ब्राह्मण को हीन भाव से देखते हैं।[] शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के गोत्र भी काश्यप, भरद्वाज आदि के ही होते हैं। यह संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान हैं तथा भविष्य पुराण आदि में इन्हें दिव्य ब्राह्मण भी कहा गया है।

आगमन सम्पादित करें

जब भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को श्राप से कुष्ठ रोग हुआ तब वे अत्यन्त चिंतित हो गए। तब उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी। भगवान नें वहाँ के अट्ठारह परिवारों को जम्बूद्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। साकद्वीपीय ब्राह्मणों ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया। कालान्तर में मगध नरेश की आग्रह पर भगवान ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया।[]

शाकद्वीप सम्पादित करें

पुराणों में सात द्वीपों (जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप) का वर्णन है जिनके अलग अलग वर्ण, उपद्वीप, पर्वत, सागर, इष्टदेव, नदियाँ तथा शासक हैं।[]

शाकद्वीप इन्ही में से एक है जिनके शासक प्रियव्रत पुत्र मेधातिथि हैं। इसमें भी सात उपद्वीप हैं जिनका नाम क्रमश: पुरोजव, मनोजव, पवमान, धुम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और चित्रधार है। इन्हीं नामके मेधातिथि के पुत्र हुए तथा उनके पुत्रों ने अपने नाम के उपद्वीपों पर राज किया। यहाँ ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस नामक सप्त मर्यादापर्वत हैं तथा अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्ठि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति नामक सात नदियाँ हैं। यहाँ की जातियाँ (वर्ण) ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत तथा अनुव्रत हैं तथा इष्टदेव श्रीहरि हैं। इस शाकद्वीप में एक शाक नामक वृक्ष है जिसकी मनोहर सुगंध पूरे द्वीप में छाई रहती है। यहाँ के वासी, बीमारियों से दूर तथा हजारों वर्षों तक जीवित रहने वाले हैं। शाकद्वीप के चारो ओर मट्ठे का सागर है।[]

कुल के विद्वान सम्पादित करें

शाकद्वीपीय कुल में कई विद्वान हुए हैं जिनकी विद्वत्ता ने भारत को गौरवान्वित किया है। इन्होंने राजनीति, अध्यात्म, चिकित्सा, तन्त्र, खगोल विज्ञान आदि क्षेत्र में अपनी ख्याति दिखाई।वराहमिहिर, शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन, आर्यभट, वाणभट्ट चाणक्य, भास्कराचार्य आदि प्रमुख शाकद्वीपीय विद्वान हैं।

मिथक सम्पादित करें

कई विद्वान शाकद्वीपियों के भारत आगमन के विषय पर अपनी राय रखते हैं कि वे ईरान आदि से आए थे तथा अपने ही पुराणों पर लिखित बातों को नकारते हैं। भगवान कृष्ण ने इन्हे शाकद्वीप से जम्बूद्वीप में लाया था, तब तो ईरान भी जंबूद्वीप का हिस्सा था।

मिथक यह हैं कि शाकद्वीपीय आए कहाँ से? बड़े बड़े विद्वान भी स्वयं को श्रेष्ठ बनाने हेतु विष्णुपुराण तथा श्रीमद् भागवत महापुराण आदि में वर्णित शाकद्वीप को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं तथा शाकद्वीपीयों को हीनता की दृष्टि से देखते हैं।

इस विषय वस्तु को समझने के लिए हमे पुराणों में वर्णित भूलोक(14 लोकों के अंतर्गत 7वें लोक) के विवरण को ध्यानपूर्वक समझना होगा। भागवत पुुराण के पांचवे स्कन्ध मेंं तथा वामन पुराण के अध्याय 13 में भू लोक को सात द्वीपो से युक्त भूमि बताया गया है। इस भूलोक को पृथ्वी लोक नहीं समझना चाहिए।

भूलोक में अंदर से बाहर की ओर 7 द्वीप है, जिनके नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर हैं। सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः लवण जल(खारे पानी), इक्षुरस, मदिरा, घृत(घी), दधि(दही), दुग्ध(दूध)और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। प्रत्येक द्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले समुद्र से घिरा हुआ है।साथ ही अंदर से बाहर की ओर द्वीपों का विस्तार दुगुना होता जाता है।उदाहरण के लिए जम्बूद्वीप भूलोक के मध्य में स्थित है एवं यह अपने से दुगुने विस्तार वाले लवण सागर से घिरा हुआ है। लवण सागर एवं प्लक्ष द्वीप का विस्तार समान है अर्थात प्लक्षद्वीप जम्बूद्वीप की अपेक्षा दुगुने विस्तार वाला है। इसी प्रकार सभी द्वीपों का मान समझना चाहिए।

जम्बूद्वीप एक लाख योजन(1योजन =8 मील) विस्तीर्ण है और इसके 9 वर्ष माने गए है जिनमें प्रत्येक वर्ष 9,000 योजन विस्तीर्ण हैं ।इन वर्षों के नाम इस प्रकार है

भारत वर्ष को ही हमारा पृथ्वी ग्रह समझना चाहिए।इस भारत वर्ष अर्थात पृथ्वी को 9 खंडो में विभक्त किया गया है।इनके नाम इस प्रकार है,

● इन्द्रद्वीप

●कसेरुमान

●ताम्रपर्ण

●गभस्तिमान

● नागद्वीप

●सौम्य

●गन्धर्व

●वारुण

●कुमारद्वीप(भारत देश)

यही कुमारद्वीप महाभारत काल मे अखंड भारत था।

इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मग ब्राह्मण हमारे पृथ्वी ग्रह से अलग शाक द्वीप के निवासी थे।

बाहरी कड़ियाँ सम्पादित करें

सन्दर्भ सम्पादित करें

  1. "परिचय".[१]Retrieved 25 मई 2017.
  2. "वेदों के अनुसार".[२]Retrieved 13 जुलाई 2014.
  3. "तेजमय सूर्यांश".[३]Retrieved 13 जुलाई 2014.
  4. "विप्रवार्ता".[४]Retrieved 13 जुलाई 2014.
  5. "गमन".[५]Retrieved 13 जुलाई 2014.
  6. भागवत महापुराण पंचम स्कंध।
  7. भागवत महापुराण बीसवाँ अध्याय पंचम स्कंध।