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देववाद

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देववाद के एक समर्थक थॉमस चब्ब

देववाद या तटस्थेश्वरवाद (Deism) के अनुसार, सत्य की खोज में बुद्धि प्रमुख अस्त्र और अंतिम अधिकार है। ज्ञान के किसी भाग में भी बुद्धि के अधिकार से बड़ा कोई अन्य अधिकार विद्यमान नहीं। यह दावा धर्म और ज्ञानमीमांसा के क्षेत्रों में विशेष रूप में विवाद का विषय बनता रहा है।

ईसाई मत में धर्म की नींव विश्वास पर रखी गई है। जो सत्य ईश्वर की ओर से आविष्कृत हुए है, वे मान्य हैं, चाहे वे बुद्धि की पहुँच के बाहर हों, उसके प्रतिकूल भी हों। 18वीं शती में, इंग्लैंड में कुछ विचारकों ने धर्म को दैवी आविष्कार के बजाय मानव चिंतन की नींव पर खड़ा करने का यत्न किया। आरंभ में अलौकिक या प्रकृतिविरुद्ध सिद्धांत उनके आक्रमण के विषय बने। इसके बाद ऐसी घटनाओं की बारी आई, जिन्हें ऐतिहासिक खोज ने असत्य बताया; और अंत में कहा गया कि जिस जीवनव्यवस्था को ईसाइयत आदर्श व्यवस्था के रूप में उपस्थित करती है, वह स्वीकृति के योग्य नहीं। टोलैंड (John Toland), चब्ब (Thomas Chubb) और बोर्लिगब्रोक (Bolingbroke) बुद्धिवाद के इन तीनों स्वरूपों के प्रतिनिधि तथा प्रसारक थे।

ज्ञानमीमांसा में बुद्धिवाद और अनुभववाद का विरोध है। अनुभववाद के अनुसार, मनुष्य का मन एक कोरी तख्ती है, जिस पर अनेक प्रकार के बाह्य प्रभाव अंकित होते हैं। हमारा सारा ज्ञान बाहर से प्राप्त होता है। इसके विपरीत, बुद्धिवाद कहता है कि सारा ज्ञान अंदर से उपजता है। जो कुछ इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है, उसे प्लेटो ने केवल "संमति" का पद दिया। बुद्धिवाद के अनुसार गणित सत्य ज्ञान का नमूना है। गणित की नींव लक्षणों और स्वयंसिद्ध धारणाओं पर होती है और ये दोनों मन की कृतियाँ हैं। आधुनिक काल में, डेकार्ट ने निर्मल और स्पष्ट प्रत्ययों को सत्य की कसौटी बताया। स्पिनोज़ा ने अपनी विख्यात पुस्तक "नीति" को रेखागणित का आकार दिया। वह कुछ परिभाषाओं और स्वत:सिद्ध धारणाओं से आरंभ करता है और प्रत्येक साध्य को उपयोगी उपपत्ति से प्रमाणित करता है।

इन्हें भी देखें[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]