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रास पंचाध्यायी

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रास पंचाध्यायी

रास पंचाध्यायी मूलत: भागवत पुराण के दशम स्कंध के उनतीसवें अध्याय से तैंतीसवें अध्याय तक के पाँच अध्यायों का नाम है। यह संस्कृत का कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं है। किंतु हिंदी में रास पंचाध्यायी नाम से स्वतंत्र ग्रंथ लिखे गए और यह नाम अत्यंत प्रसिद्ध हो गया। भागवत पुराण के इन पाँच अध्यायों की इस पुराण का प्राण माना जाता है क्योंकि इस अध्यायों में श्रीकृष्ण की दिव्य लीला के माध्यम से प्रेम और समर्पण की प्रतिष्ठा की गई है। इस लीला का उपास्य काम विजयी माना जाता है अत: जो कोई भक्त इस लीलाप्रसंग को पढ़ता या दृश्य रूप में देखता है वह कामजय की सिद्धि प्राप्त करता है।

रास पंचाध्यायी का सार[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

"रास पंचाध्यायी" के पाँच अध्यायों का संक्षेप में सार इस प्रकार है - शारदीय पूर्णिमा की रात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण के मन में गोपियों के साथ रसमयी रासक्रीड़ा करने का संकल्प हुआ। उन्होंने अपनी मनोहारी कामबीज वंशी की ध्वनि बजाई। वंशी की मोहक ध्वनि सुनते ही गोपियाँ अपना समस्त क्रियाव्यापार त्याग कर रास प्रदेश में कृष्ण के पास पहुँच गई। श्री कृष्ण ने उन्हें पहले तो समझा-बुझाकर अपने घर वापस जाने को कहा, किंतु गोपियाँ अपने निश्चय पर आरूढ़ रहीं और रासक्रीड़ा के लिए कृष्ण से आग्रह करती रहीं। जब गोपियाँ अपने पर लौटने को उद्यत न हुई तो श्री कृष्ण ने आनंदपुलकित मन से मडंलाकार स्थिति होकर उनके साथ रासलीला प्रारंभ की। इस रासलीला को वैष्णव भक्त दिव्य क्रीड़ा मानते हैं और इसका आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। श्री कृष्ण चिदानंदघन दिव्यशरीर हैं, गोपियाँ दिव्य जगत् की भगवान की अतंरंग शक्तियाँ हैं। उनकी लीला भावभूमि की है स्थूल शरीर और मन से उसका कोई संबंध नहीं। रास पंचाध्यायी पर टीका लिखनेवाले श्री वल्लभाचार्य, श्री श्रीधर स्वामी, श्री जीय गोस्वामी आदि ने इस आध्यात्मिक तत्त्व की व्याख्या बड़े विस्तार से की है।

हिन्दी में रास पंचाध्यायी[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

हिंदी के भक्त कवियों ने सभी "रास पंचाध्याची" के इस भागवत तत्त्व को ग्रहण कर अपनी सरस कृतियों में इस स्थान दिया है। सूरदास ने इस प्रसंग को सूरसागर में समेटा है किंतु स्वतंत्र ग्रंथ नहीं लिखा। स्वतंत्र रूप से रास पंचाध्यायी लिखनेवालों में नंददास, रहीम खानखाना, हरिराम व्यास और नवलसिंह कायस्थ के नाम प्रसिद्ध हैं। नंददास की रास पंचाध्यायी रोला छंद में है। साहित्यिक ब्रजभाषा में बड़ी सरस शैली का कवि ने प्रयोग किया है। हरिराम व्यास रचित रास पंचाध्यायी त्रिपदी छंद में है। इसमें 120 छंद हैं। रासलीला का वर्णन हरिराम व्यास ने अपने ढंग से किया है। भागवत पुराण का आनुपूर्वी अनुकरण इसमें नहीं है। रहीमरचित रास पंचाध्यायी का वर्णन "भक्तमाल" में मिलता है। दो पद भी उसमें संकलित हैं। संपूर्ण पुस्तक अप्राप्य है। नवलसिंह की रास पंचाध्यायी सामान्य कोटि की है। रास पंचाध्यायी का महत्त्व प्रेमलक्षणा भक्ति के संदर्भ में बहुत माना जाता है। इसकी कथा कहने की भी परिपाटी पड़ गई है। संक्षेप में, वैष्णव भक्ति के समर्पण भाव को स्थापित करनेवाला यह प्रधान प्रसंग है जो भागवत पुराण का अंश होने पर भी स्वतंत्र स्थान पा गया है।