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प्रवेशद्वार:जैन धर्म/Intro

भारतपीडिया से

आचार्य अमितगति ने कहा है:

सत्वेषु मैत्रिं गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्।

माध्यस्थ्यभावं विपरीतवृतौ, सदा ममात्मा विदधातु देवः॥


हे जिनेन्द्र! सब जीवों से हों मैत्री भाव हमारे,

गुणधारी सत्पुरुषन पर हों हर्षित मन अधिकारे।

दुःख दर्द पीडित प्राणिन पर करुँ दया हर बारे,

नहीं प्रेम नहिं द्वेष वहाँ विपरीत भाव जो धारे॥


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जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है ।

जैन किसे कहते हैं?[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

'जैन' कहते हैं उन्हें, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने-जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्म।

जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र 'णमोकार मंत्र' है-[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

ऐसो पञ्च णमोकारो, सव्वपावप्पणासणो॥ मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं होई मंगलम ॥


अर्थात अरिहंतो को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। इन्हें पाँच परमेष्ठी (जो परम पद में स्थित हैं ) कहा जाता है.

यह पञ्च नमस्कार मन्त्र सभी पापों का नाश करता है और सभी मंगलों में पहला मंगल है। णमोकार मंत्र जैन धर्म के दिगंबर एवं श्वेताम्बर दोनों संप्रदायों में सामान रूप से मान्य है.

यह मंत्र 'प्राकृत भाषा' में है और जैनागम के अधिकतर मूल ग्रन्थ प्राकृत में ही लिखे गए हैं। जैनागम के अनुसार 'णमोकार मंत्र' अनादिनिधन है अर्थात यह मन्त्र हमेशा से है और हमेशा रहेगा। परन्तु इस युग में सबसे पहले इस मंत्र का सर्वप्रथम प्रयोग 'षट्खंडागम' नामक ग्रन्थ में 'मंगलाचरण' के रूप में हुआ है । इस ग्रन्थ के रचनाकार दो बहुप्रतिभाशाली जैनाचार्य थे : आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि।


तीर्थंकर[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

जो धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं और जिनके पाँच कल्याणक (गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक) मनाये जाते हैं उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभदेव से लेकर श्री महावीर पर्यंत 24 तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने समय-समय पर धर्म की पुनर्स्थापना की है। वर्तमान में २४ वें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर का शासनकाल चल रहा है.