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भगवान महावीर का साधना काल
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== शूलपाणी का उपसर्ग == वेगवती नदी के किनारे एक गांव था उस गांव में शूलपाणी नाम का भयंकर यक्ष रहता था,एक दिन भगवान महावीर संध्या के समय उस गांव के निकट पधारे उस गांव में एक चैत्य था जिसमें वह भयंकर यक्ष रहता था,<ref>https://www.jainismknowledge.com/2020/05/mahavira-and-yaksha-story.html</ref> भगवान महावीर संध्या के समय उस चैत्य में ध्यानमगन हो गए,कुछ समय बाद वहां पर भयंकर आवाजें आने लगी वह यक्ष भगवान महावीर को सताने लगा, वह बिजली की गर्जना करता तो कभी भयंकर अट्टहास करता, उसके बाद जब यक्ष ने देखा कि भगवान महावीर पर उसकी घटना का कोई प्रभाव नहीं हो रहा तब उसने भयंकर विषधर का रूप बनाया, कभी हाथी का तो कभी भयंकर जानवरों का रूप लिया । इतनी से भी जब भगवान महावीर का ध्यान नहीं टूटता तो उसने भगवान महावीर को वेदना देना शुरू किया । प्रभु महावीर में तितिक्षा की असीम शक्ति थी । वे सहजता से यक्ष के सभी उपसर्गों को सह गए, उसके बाद जब यक्ष ने देखा कि यह मेरी किसी भी बात से प्रभावित नहीं है तो यह अवश्य ही कोई महापुरुष होगा। यक्ष ने उससे पहले कई सारी हत्या की थी, पर वह भगवान महावीर को प्रभावित नहीं कर सका पूरी रात उपसर्ग देने के बाद वह लज्जित हो गया । तब उसने भगवान महावीर से क्षमा याचना मांगी तो भगवान महावीर ने अभय मुद्रा में वर देते हुए कहा कि हिंसा से ही हिंसा फैलती है, आतंकित व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं हो सकता जिसमें भय होता है वही भयभीत होता है। अभय व्यक्ति को किसी का भी भय नहीं होता, अतः अहिंसा व शांति ही लोक कल्याण का मार्ग है। उसके बाद उसने कभी भी किसी को न सताने का वचन दिया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=zG97NwAACAAJ|title=सचित्र श्री कल्पसूत्र: शुद्ध मूल पाठ, हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद तथा संक्षिप्त कथा विस्तार|last=अमरमुनि|first=वरुण (मुनि.)|publisher=Padma Prakāśana|year=2008|isbn=978-81-89698-47-8|location=|pages=101}}</ref>
सारांश:
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