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भगवान महावीर का साधना काल
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== चंडकौशिक का उपसर्ग == भगवान महावीर अस्तिका नगरी से प्रस्थान कर श्वेत अंबिका का नगर की तरफ बढ़े,रास्ते में उन्हें एक जगह दिखाई दी जहां से दो रास्ते जाते थे,उन्होंने राहगीर से पूछा श्वेत अंबिका नगरी किस तरफ है, तो राहगीर ने कहा यह रास्ता बड़ा परंतु सुरक्षित है परंतु दूसरा रास्ता जो जंगल से होकर जाता है, छोटा तथा भयानक है, क्योंकि इस रास्ते में भयंकर विषधर चंडकौशिक रहता है । इस रास्ते का उपयोग कोई भी नहीं करता इस रास्ते जो भी जाता है , वह मारा जाता है, भगवान महावीर मुस्कुराए और वह जंगल की तरफ चल दिए जंगल में वह सांप की बांबी के पास पहुंचे । चंडकौशिक सर्प बहुत ही भयंकर जहरीला था, उसके जहर की सीमा इतनी थी कि मात्र दृष्टि मात्र से लोगों के जीवन का अंत कर देता था , उसकी फुफकार इतनी जहरीली थी कि उसने पूरा जंगल उजाड़ दिया था। वह सर्प स्वभाव से गुस्सैल भी था, जब उसने भगवान महावीर को अपने पास देखा तो उसने अपनी विषैली दृष्टि भगवान महावीर पर डाली ,पर जब उसकी दृष्टि का प्रभाव प्रभु पर नहीं हुआ तो उसने भयंकर विषैली फुफकार मारी ,पर भगवान महावीर तो पर्वत के समान अविचल खड़े रहे। इसके बाद उस सर्प ने भगवान महावीर के अंगूठे पर प्रहार किया और अपना संपूर्ण विष एकत्रित कर, उसने प्रभु पर डाल दिया पर यह क्या! अंगूठे में रक्त के स्थान पर दूध की धारा बह निकली यह देख कर उस विषधर को बहुत आश्चर्य! हुआ। भगवान महावीर ने अपनी शांत वाणी में विषधर से कहा कि "शांत चंडकौशिक शांत तुम्हारी पूर्व जन्मों के कारण ही तुम्हें यह सर्प की योनि मिली है। अपने गुस्से के कारण तुम कितने और जन्म व्यर्थ करोगे, शांति और अहिंसा ही मुक्ति का मार्ग है।" भगवान महावीर की शांत वाणी को सुनकर विषधर शांत हो गया और उसने उसी वक्त से गुस्सा त्याग कर समर्पण कर दिया, कुछ समय बाद उस विषधर में अपने प्राण त्यागे,कुछ ही समय में यह समाचार बाहर के गांव में फैल गया, लोगों ने दूध आदि से उसका अभिषेक किया, जैन मान्यता के अनुसार यही दिन नाग पंचमी कहलाया।
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