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== अथर्वण ज्योतिष == अथर्व ज्योतिष में नक्षत्र ज्योतिष को अन्य रूप से दर्शाया गया है। इसमें फलित ज्योतिष की अनेक महत्त्वपूर्ण बातें हैं। ऋक्-ज्योतिष, यजुर्वेद-ज्योतिष तथा अथर्व-ज्योतिष में से वेदांग ज्योतिष का स्वतन्त्र ग्रन्थ यही कहा जा सकता है। इसमें 162 श्लोक हैं। वेदांग ज्योतिष का काल ईसा पूर्व 501 वर्ष से 500 तक माना जाता है। विषय और भाषा की दृष्टि से इसका रचनाकाल उक्त दोनों ग्रन्थों से अर्वाचीन है। इसमें तिथि, नक्षत्र, करण, योग, तारा और चन्द्रमा के बलाबल का सुन्दर निरूपण किया गया है। अथर्व-ज्योतिष की रचना के समय ज्योतिषशास्त्र का विचार सूक्ष्म दृष्टि से होने लग गया था। इस समय भारत वर्ष में वारों का भी प्रचार हो गया था तथा वाराधिपति भी प्रचलित हो गये थे।: <blockquote> आदित्यः सोमो भौमश्च तथा बुधबृहस्पतयो। भार्गवः शनैश्चरश्चैव एते सप्त दिनाधिपाः।। 93।। </blockquote> इसी प्रकार इसमें जातक के जन्म नक्षत्र को लेकर सुन्दर ढंग से फल बतलाया गया है। तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक वर्ग स्थापित कर फल बताया है: 1 जन्म नक्षत्र 10 कर्म नक्षत्र 19 आधान नक्षत्र 2 संपत्कर नक्षत्र 11 संपत्कर नक्षत्र 20 संपत्कर नक्षत्र 3 विपत्कर नक्षत्र 12 विपत्कर नक्षत्र 21 विपत्कर नक्षत्र 4 क्षेमकर नक्षत्र 13 क्षेमकर नक्षत्र 22 क्षेमकर नक्षत्र 5 प्रत्वर नक्षत्र 14 प्रत्वर नक्षत्र 23 प्रत्वर नक्षत्र 6 साधक नक्षत्र 15 साधक नक्षत्र 24 साधक नक्षत्र 7 निधन नक्षत्र 16 निधन नक्षत्र 25 निधन नक्षत्र 8 मित्र नक्षत्र 17 मित्र नक्षत्र 26 मित्र नक्षत्र 9 परम मित्र नक्षत्र 18 परम मित्र नक्षत्र 27 परम मित्र नक्षत्र उपर्युक्त नक्षत्रों का वर्गीकरण, जिसे तारा कहा गया है, आजतक इसी प्रकार का चला आ रहा है। यों तो जातक ग्रन्थों के फलादेश में बहुत संशोधन और परिवर्धन हुए हैं, किन्तु तारा का फलादेश यथावत् रह गया है। इस छोटे से ग्रन्थ में ग्रह-उल्का, विद्युत, भुकम्प, दिग्दाह आदि का फल भी संक्षेप में लिखा है।
सारांश:
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