"पराशर ऋषि": अवतरणों में अंतर
imported>Mahendra Darjee छो →परिचय |
छोकोई सम्पादन सारांश नहीं |
||
| (इसी सदस्य द्वारा किया गया एक मध्यवर्ती अवतरण नहीं दिखाया गया है) | |||
| पंक्ति १३: | पंक्ति १३: | ||
== परिचय == | == परिचय == | ||
■ श्री पराशर वन्दना - | |||
"पराशरं नौमि गुरुं मुनीनाम्" | |||
(गुरु-स्वरूप मुनि पराशर को नमस्कार है।) | |||
ब्रह्मनिष्ठोऽतितेजस्वी योगविद्यापरायणः। | |||
ऋषिर्जयति धर्मज्ञः पुण्यश्लोकः पराशरः॥१॥ | |||
#अर्थात - जो ब्रह्मनिष्ठ (ब्रह्मज्ञान से युक्त) हैं, जो अति तेजस्वी तथा योगविद्यापरायण (योग-विद्या में तत्त्पर तथा पूर्ण निष्ठा रखने वाला) हैं, ऐसे धर्मज्ञ एवं पुण्य-कीर्ति वाले (उत्तम आचरण वाले) ऋषि पराशर की जय हो। | |||
पौत्रो मुनेर्वसिष्ठस्य शक्तेश्चैवात्मजस्थता। | |||
अदृश्यन्ती सुतो यश्चः मुनिर्वन्द्यः पराशरः॥२॥ | |||
#अर्थात - जो मुनि वसिष्ठ के पौत्र हैं, जो शक्ति मुनि के आत्मज तथा अदृश्यन्ती सुत हैं, (उन) मुनि पराशर को नमस्कार है। | |||
मनस्विनं त्यागपरञ्च सौम्यं सुशोभितं ब्रह्मसुखानुभूत्या। | |||
भक्त्या ब्रुवन्तं श्रुतिशास्त्रसारं पराशरं नौमि गुरुं मुनीनाम्॥३॥ | |||
#अर्थात - जो मनस्वी हैं, त्यागपरञ्च और सौम्य गुणों से सुशोभित हैं, जिन्होंने ब्रह्मसुख को अनुभव किया है तथा जिन्होंने भक्ति-भाव से श्रुति-शास्त्र (वेद-शास्त्र) के सार अर्थात वेदान्तज्ञान को कहा है, ऐसे गुरु (स्वरूप) मुनि पराशर को मेरा नमस्कार है। | |||
वेदज्ञं मन्त्रद्रष्टारं तपः सिद्धिप्रतिष्ठितम्। | |||
नमामि धर्मतत्वज्ञं महाभागवतं मुनिम्॥४॥ | |||
#अर्थात - वेदों को जानने वाले, मन्त्रद्रष्टा (मन्त्र का दर्शन करने वाला), तपस्वी, सिद्धि में प्रतिष्ठित रहने वाले, धर्म के तत्व को जानने वाले, #महाभागवत (परम् वैष्णव भक्त) मुनि (#पराशर) को मेरा नमस्कार है। | |||
सत्यकामं ऋषिं शान्तं सत्यवत्यै वरप्रदम्। | |||
भक्तिज्ञानविरागाप्तं प्रणमामि पराशरम् ॥५॥ | |||
#अर्थात - जो सत्य-प्रेमी है, जो समस्त चिन्ताओं को त्यागकर शान्त हो गए हैं, और जो सत्यवती को वर प्रदान करने वाले हैं, जिन्होंने भक्ति, ज्ञान तथा विराग (राग-द्वेष रहित भाव) - को पूर्ण-रूप से प्राप्त कर लिया है, ऐसे ऋषि पराशर को मेरा प्रणाम है। | |||
अष्टादशपुराणानां प्रणेता भारतस्य च। | |||
वेदव्यासः सुतो यस्य धन्यं तं नौम्यहं मुनिम् ॥६॥ | |||
#अर्थात - अठारह पुराणों के प्रणेता महामुनि वेदव्यास जिनके पुत्र हैं, जो धन्य और बड़े ही पुण्यशाली हैं, उन मुनि पराशर को मैं नमस्कार करता हूँ। | |||
वेदान्तदर्शनस्रष्टा विष्णोरंशसमुद्भवः। | |||
चिरजीवी सुतो यस्य तं मुनिं प्रणतोऽस्मयहम् ॥७॥ | |||
#अर्थात - जो वेंदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र) के रचयिता हैं, और जिनके पुत्र भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुए हैं तथा चिरंजीवी हैं, ऐसे मुनि पराशर को मैं प्रणाम करता हूँ। | |||
ज्ञानावतारस्य च जन्महेतुं सत्कर्म सद्धर्मविदां वरिष्ठम् । | |||
पराशरं सत्त्वनिधिं विधिज्ञं नमामि भक्त्या परमं महर्षिम् ॥८॥ | |||
#अर्थात - जो ज्ञान के अवतार हैं तथा सत्कर्म ही जिनके जन्म (के ऐश्वर्य, वैभव तथा सुख) - के कारण है, तथा जो सद्धर्म जानने वालों में श्रेष्ठ हैं, ऐसे सत्वनिधि (सत्वगुण से युक्त), विधिज्ञ (विधि को जानने वालों में श्रेष्ठ), परम् महर्षि पराशर को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ। | |||
पौत्रो हि यस्य प्रथितो विरक्तो ज्ञानाब्धिचन्द्रश्च शुकः शिवांशः। | |||
महामुनिर्भागवतोपदेष्टा पराशरं तं प्रणमामि भक्त्या ॥९॥ | |||
अर्थात - जो वैराग्य-युक्त (निरासक्त रहने वाले) है, जो (मस्तक) पर चन्द्र को धारण करने वाले शिव का अंश है, जो ज्ञान के समुद्र हैं और भागवत के उपदेशक हैं - वे महामुनि शुक जिनके पौत्र हैं, ऐसे पुण्यवान् मुनि पराशर को मैं भक्ति-भाव से प्रणाम करता हूँ। | |||
अष्टोत्तरशतं जप्त्वा गायत्रीं वेदमातरम्। | |||
वन्दनां प्रपठेद् भक्त्या साधकः सिद्धिदायिनीम् ॥१०॥ | |||
अर्थात - एक सौ आठ बार वेदमाता गायत्री (-मन्त्र) | |||
का जप करके जो तपस्वी इस (पराशर) वन्दना को भक्ति-भाव से पढ़ता है, वह सिद्धि को प्राप्त करता है। | |||
- #वैदिक_संग्रह | |||
■"श्रीपराशरषट्कम्" | |||
◆ "वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम्" - | |||
शिष्यं श्रीमद्वशिष्ठर्षे रघुवंशपुरोधसः। | |||
वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम् ॥१॥ | |||
#अर्थात - रघुवंश के पुरोहित श्रीसम्पन्न (ज्ञानमूर्ति) ऋषि वशिष्ठ के शिष्य, मुनि शक्ति के पुत्र और सम्पूर्ण जगत के गुरु '#आचार्य_पराशर' को मैं वन्दन करता हूँ। | |||
राममन्त्रप्रदं श्रीमद्राममन्त्रार्थ कोविदम्। | |||
वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम् ॥२॥ | |||
#अर्थात - जो 'राम' नाम का (षडक्षर) मन्त्र (श्रीराम-मन्त्र - राम रामाय नमः) प्रदान करने वाले हैं, जो ज्ञान के समुद्र तथा श्री राम-मन्त्रार्थ (राम-मन्त्र के अर्थ) का बोध कराने वाले प्रकाण्ड विद्वान हैं - ऐसे मुनि शक्ति के पुत्र और समस्त संसार के गुरु '#आचार्य_पराशर' को मैं वन्दन करता हूँ। | |||
रामसेवारतं शश्वद् वेदव्यासस्य सद्गुरुम्। | |||
वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम् ॥३॥ | |||
#अर्थात - जो भगवान श्रीराम की सेवा में रत रहने वाला है, जो चिरस्थायी भगवान वेदव्यास के सद्गुरु हैं - ऐसे मुनि शक्ति के पुत्र और विश्वगुरु '#आचार्य_पराशर' को मैं वन्दन करता हूँ। | |||
सिद्धेन्द्रं सिद्धिदं श्रीमद्वैष्णवधर्मबोधकम्। | |||
वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम् ॥४॥ | |||
#अर्थात - जो अत्यन्त भाग्यशाली हैं, जो (समस्त प्रकार की) सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं, जो श्रीमद् वैष्णव धर्म का बोध कराने वाले और जगत् के गुरु हैं - ऐसे मुनि शक्ति के पुत्र '#आचार्य_पराशर' को मैं वन्दन करता हूँ। | |||
वेदान्तममवेत्तारं विशिष्टाद्वैतवादिनम्। | |||
वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम् ॥५॥ | |||
#अर्थात - विशिष्टाद्वैतवाद (विशिष्ट अद्वैतवाद) वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र) को जानने वाले मुनि शक्ति के पुत्र तथा जगद्गुरु '#आचार्य_पराशर' को मैं वन्दन करता हूँ। | |||
मुनीन्द्रं रामनिष्ठं च जटोर्ध्वपुण्डधारकम्। | |||
वन्दे पराशराचार्यं शक्तिपुत्रं जगद्गुरुम् ॥६ ॥ | |||
#अर्थात - जो मुनियों में श्रेष्ठ हैं, जो भगवान श्रीराम में निष्ठा रखने वाले हैं, जो सिर पर जटा और मस्तक पर ऊर्ध्वपुण्ड्र को धारण करने वाले हैं - उन मुनि शक्ति के पुत्र एवं जगद्गुरु '#आचार्य_पराशर' को मैं वन्दन करता हूँ। | |||
- #स्तोत्रकुसुमांजलि | |||
★ भारतीय ज्योतिष के प्रवर्तकों में महर्षि पराशर अग्रगण्य हैं। महर्षि प्रोक्तं ग्रंथों में केवल इन्ही का सम्पूर्ण ग्रंथ 'बृहत्पराशरहोराशास्त्र' नाम से उपलब्ध हैं। अन्य प्रवर्तक ऋषियों के वचन तो इतस्ततः मिलते हैं, लेकिन किसी सम्पूर्ण ग्रंथ के अद्यावधि दर्शन नही होते हैं। यह बात पराशर के मत की सर्व व्यापकता व सार्वभौमिकता का एक पुष्कल प्रमाण है। 'पराशरहोराशास्त्र' की गुणग्रहिता व सम्पूर्णता के कारण ही इनकी यह रचना सर्वत्र प्रचलित है। | ★ भारतीय ज्योतिष के प्रवर्तकों में महर्षि पराशर अग्रगण्य हैं। महर्षि प्रोक्तं ग्रंथों में केवल इन्ही का सम्पूर्ण ग्रंथ 'बृहत्पराशरहोराशास्त्र' नाम से उपलब्ध हैं। अन्य प्रवर्तक ऋषियों के वचन तो इतस्ततः मिलते हैं, लेकिन किसी सम्पूर्ण ग्रंथ के अद्यावधि दर्शन नही होते हैं। यह बात पराशर के मत की सर्व व्यापकता व सार्वभौमिकता का एक पुष्कल प्रमाण है। 'पराशरहोराशास्त्र' की गुणग्रहिता व सम्पूर्णता के कारण ही इनकी यह रचना सर्वत्र प्रचलित है। | ||