Deprecated: Caller from MediaWiki\Cache\LinkCache::fetchPageRow ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385

Deprecated: Caller from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::selectOne ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385

Deprecated: Caller from MediaWiki\Page\PageProps::getProperties ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385
पादप कार्यिकी - भारतपीडिया

पादप क्रिया विज्ञान या पादपकार्यिकी (Plant physiology), वनस्पति विज्ञान की वह शाखा है जो पादपों के कार्यिकी (physiology) से सम्बन्धित है। पादप कार्यिकी में पौधों में होने वाली विभिन्न प्रकार की जैविक क्रियाओं (Vital Activities) का अध्ययन किया जाता है। पादप क्रियाविज्ञान का अध्ययन सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephen Hales) ने किया। उन्होंने प्रथम बार अपने भौतिकी व संख्यिकी के ज्ञान के आधार पर प्रयोगात्मक विधियां ज्ञात की जिनसे पौधों में होने वाले परिवर्तन जैसे पौधों में रसों (Saps) की गति, वाष्पोत्सर्जन दर, पौधों में रसारोहण क्रिया में मूलदाब व केशिका बल को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

अंगूठाकार बनाने में त्रुटि हुई: फ़ाइल गायब है
अंकुरण दर का एक प्रयोग


पादप क्रियाविज्ञान के अन्तर्गत पौधों के शरीर में हर एक कार्य किस प्रकार होता है, इसका अध्ययन किया जाता है। जीवद्रव्य, कोलायडी प्रकृति का होता है और यह जल में बिखरा रहता है। भौतिक नियमों के अनुसार जल या लवण मिट्टी से जड़ के रोम के कला की कोशिकाओं की दीवारों द्वारा प्रवेश करता है और सांद्रण के बहाव की ओर से बढ़ता हुआ संवहनी नलिका में प्रवेश करता है। यहाँ से यह जल इत्यादि किस प्रकार ऊपर की ओर चढ़ेंगे इसपर वैज्ञानिकों में सहमति नहीं थी, पर अब यह माना जाता है कि ये केशिकीय रीति से केशिका नली द्वारा जड़ से ऊँचे तने के भाग में पहुँच जाते हैं।

पौधों के शरीर का जल वायुमंडल के संपर्क में पत्ती के छिद्र द्वारा आता है। यहाँ भी जल के कण वायु में निकल जाते हैं, यदि वायु में जल का सान्द्रण कम है। जैसे भीगे कपड़े का जल वाष्पीभूत हो वायु में निकलता है, ठीक उसी प्रकार यह भी एक भौतिक कार्य है। अब प्रश्न यह उठता है कि पौधों को हर कार्य के लिये ऊर्जा कहाँ से मिलती है तथा ऊर्जा कैसे एक प्रकार से दूसरे प्रकार में बदल जाती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्णहरित पर प्रकाश पड़ने से प्रकाश की ऊर्जा को पर्णहरित पकड़ कर कार्बनडाइआक्साइड और जल द्वारा ग्लूकोज़ और आक्सीजन बनाता है। ये ही ऊर्जा के स्रोत हैं (देखें, प्रकाश संश्लेषण)।

प्रकृति में पौधों द्वारा नाइट्रोजन का चक्र भी चलता है। पौधों की वृद्धि में प्रकाश का योग बड़े महत्व का है। प्रकाश से ही पौधों का आकार और भार बढ़ते हैं तथा नए ऊतकों और आकार या डालियों का निर्माण होता है। जिन पादपों को प्रकाश नहीं मिलता, वे पीले पड़ने लगते हैं। ऐसे पादपों को पांडुरित (etiolated) कहते हैं। प्रकाश के समय, दीप्तिकाल (photo period), पर ही पौधे की पत्ती बनना, झड़ना, तथा पुष्प बनना निर्भर करता है। इसे दीप्तिकालिता (Photoperiodism) कहते हैं। २४ घंटे के चक्र में कितना प्रकाश आवश्यक है ताकि पौधों में फूल लग सके, इसे क्रांतिक दीप्तिकाल कहते हैं। कुछ पौधे दीर्घ दीप्तिकाली होते हैं और कुछ अल्प दीप्तिकाली और कुछ उदासीन होते हैं। इस जानकारी से जिस पौधे में फूल न चाहें उसमें फूल का बनना रोक सकते हैं और जहाँ फूल चाहते हैं वहाँ फूल असमय में ही लगवा सकते हैं।

वायुताप का भी पौधों पर, विशेषकर उनके फूलने और फलने पर, प्रभाव पड़ता है। इसके अध्ययन को फीनोलॉजी (Phenology) कहते हैं। यह सब हार्मोन नामक पदार्थों के बनने के कारण होता है। पौधों में हार्मोनों के अतिरिक्त विटामिन भी बनते हैं, जो जन्तु और मनुष्यों के लिये समान रूप से आवश्यक और हितकारी होते हैं। पौधों में गमनशीलता भी होती है। ये प्रकाश की दिशा में गमन करते हैं। ऐसी गति को प्रकाशानुवर्ती और क्रिया को प्रकाश का अनुवर्तन (Phototropism) कहते हैं। पृथ्वी के खिंचाव के कारण भी पौधों में गति होती हैं, इसे जियोट्रॉपिज़्म (Geotropism) कहते हैं।

जैविक क्रियाएँ सम्पादित करें

पादप कोशिका में होने वाले सभी रासायनिक एवं भौतिक परिवर्तन तथा पादप अथवा पादप कोशिका एवं वातावरण (environment) के बीच सभी प्रकार का आदान-प्रदान जैविक क्रिया के अन्तर्गत आते हैं। जैविक क्रियाएंं निम्नलिखित होती है:-

  • रसायनिक परिवर्तन : रसायनिक परिवर्तन के अंतर्गत प्रकाश संश्लेषण, पाचन, श्वसन, प्रोटीन, वसा तथा हॉरमोन्स पदार्थों का संश्लेषण अदि आते हैं।
  • भौतिक परिवर्तन : भौतिक परिवर्तन के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की गैसें कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, तथा परासरण, वाष्पोत्सर्जन, रसारोहण, खनिज तत्व एवं जल का अवशोषण आदि।

कोशिका वृद्धि और विकास में रासायनिक एवं भौतिक दोनों परिवर्तन होते है। प्रकाश संश्लेषण और श्वसन में वातावरण और कोशिका के बीच ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है। इसी प्रकार वाष्पोत्सर्जन तथा जल अवशोषण में वातावरण तथा पादप कोशिका के बीच जल के अणुओं का आदान-प्रदान होता है।

पौधे की वृद्धि और विकास का पूर्ण रूप से नियंत्रण इस प्रकार किया जा सकता है:-

  • प्रकाशकालिता की खोज से अनेक पौधों में उनका वांछित दीप्तिकाल घटा या बढ़ाकर तथा निम्न ताप उपचार द्वारा असामयिक पुष्पन तथा शीत प्रजातियों को सामान्य वातावरण में फलने-फूलने को प्रेरित किया जाता है। पादप शरीर-क्रिया विज्ञान के अनुसन्धान से कुछ क्रियाएं जैसे प्रकाशीय श्वसन को कम करके पौधों की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
  • ऊतक संवर्धन तकनीक से पादप क्रिया में वैज्ञानिकों ने कम समय में ऐसे पौधे तैयार किए हैं जो सामान्य रूप से प्रजनन द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता और इनका उपयोग व्यापक स्तर पर किया जा रहा है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि कृषि जगत में हरित क्रांति की सफलता पादप कार्यिकी के ज्ञान व नवीन खोजो के कारण ही संभव हो पाई है।

इन्हें भी देखें सम्पादित करें

बाहरी कड़ियाँ सम्पादित करें