कबीर
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कबीर (लगभग 1440-1518 ई.) भक्तिकाल की निर्गुण धारा के सबसे प्रमुख संत-कवि थे। वे बनारस (काशी) के जुलाहा परिवार से जुड़े माने जाते हैं और रामानंद के शिष्य कहे जाते हैं।
वाणी और रचनाएँ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
कबीर की वाणी तीन रूपों में मिलती है:
- साखी: दोहों में दिया गया उपदेश
- सबद: गेय पद
- रमैनी: दार्शनिक विचार
उनकी रचनाएँ 'बीजक' और 'कबीर ग्रंथावली' में संकलित हैं, तथा कई पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी सम्मिलित हैं।
महत्व[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
कबीर ने जाति, धर्म और आडंबर का विरोध किया और मानवता, सत्य और प्रेम का संदेश दिया। उनकी भाषा 'सधुक्कड़ी' कहलाती है, जिसमें कई बोलियों का मिश्रण है।
सन्दर्भ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
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