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खस (प्राचीन जाति)

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खस जाति गान्धार, त्रिगर्त और मद्र राज्यों में रहते थे

खस एक प्राचीन बाह्लीकी भाषा बोल्ने हिन्द-आर्य जाति थी । इन्कि लिपि को ब्रह्म लिपि तथा खरोष्ठी लिपि काहा जाता हे। इन्हें शकों/कुशान की कोई उपजाति मानी जाति हे।

उत्पत्ति[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

खस लोगों की उत्पत्ति पूर्वी ताजिकिस्तान के ताजिक वा कम्बोज वा शक जातियों में से होने की आशंका की गयी हैं । भारतीय साहित्यिक उल्लेखों में उन्हें गान्धार, बाह्लीक, त्रिगर्त और मद्र राज्यों में रहते थे । यह भी धारणा है खस लोग काश्गर अथवा मध्य एशिया के निवासी थे और तिब्बत के रास्ते वे नेपाल और भारत आए।

साहित्यिक उल्लेख[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में खस जाति का उल्लेख मिलता है। महाभारत में उल्लेखित खसों ने कौरव के पक्ष से युद्ध लड़ा था । मनुस्मृति के अनुसार खस अन्य भारतीय जाति जैसे शक, कम्बोज, दारद, पहलव, यवन, पारद आदि जैसे ही प्राचीन म्लेच्छ जाति थे। जो संस्कार का त्याग करने से 'व्रात्य क्षत्रिय' और 'म्लेच्छ' में परिणत हुए। मनुस्मृति में उन्हें व्रात्य क्षत्रिय के वंशज कहाँ गया था । साँचा:Sfn प्राचीन खसों ने बौद्ध धर्म धारण किया था ।साँचा:Sfn मार्कण्डेय पुराण में खस एक हिमालयी राज्ये के रूप में वर्णित किया गया है।साँचा:Sfn महाभारत के सभापर्व एवं मार्कंडेय तथा मत्स्यपुराण में इनके अनेक उल्लेख प्राप्त होते है। महाभारत के कर्ण पर्व में खसों को पंजाब क्षेत्र और किरात वसाति के बीच वाले इलाकों में रहनेका वर्णन किया था । साँचा:Quote

समझा जाता है कि महाभारत में उल्लिखित खस का विस्तार हिमालय में पूर्व से पश्चिम तक था। राजतरंगिणी के अनुसार ये लोग कश्मीर के नैऋत्य कोण के पहाड़ी प्रदेश अर्थात् नैपाल में रहते थे। अत: वहाँ के निवासियों को लोग खस मूल का कहते हैं।

ऐतिहासिक उल्लेख[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

इतिहासकार राहुल साँकृत्ययान खसों को शकों के वंश मानता थे ।साँचा:Sfn सिल्वाँ लेवी की धारणा है कि खस हिमालय में बसनेवाली एक अर्धसंस्कृत जनजाति थी जिसने आगे चलकर बुद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। फिर 12 सताब्दी में प्रकिती पुजन तथा हिन्दु धर्म को ग्रहन कर लिआ।

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]