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जय जिनेन्द्र

भारतपीडिया से

साँचा:जैन धर्म जय जिनेन्द्र! एक प्रख्यात अभिवादन है। यह मुख्य रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ होता है  "जिनेन्द्र भगवान (तीर्थंकर) को नमस्कार"।साँचा:Sfn यह दो संस्कृत अक्षरों के मेल से बना है: जय और जिनेन्द्र।

जय शब्द जिनेन्द्र भगवान के गुणों की प्रशंसा के लिए उपयोग किया जाता है।
जिनेन्द्र उन आत्माओं के लिए प्रयोग किया जाता है जिन्होंने अपने मन, वचन और काया को जीत लिया और केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया हो।साँचा:Sfnसाँचा:Sfnसाँचा:Sfn

दोहा[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

चार मिले चौंसठ खिले,मिले बीस कर जोड़।
सज्जन से सज्जन मिले, हर्षित चार करोड़।।

अर्थात्-:जब भी हम किसी समाजबंधु से मिलते हैं तो दूर से ही हमारे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और दोनों हाथ जुड़ जाते हैं हमारे मुख से जय जिनेन्द्र निकल ही जाता है।

इन्हें भी देखें[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

साँचा:प्रवेशद्वार

सन्दर्भ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

स्रोत ग्रन्थ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

  • Rankin, Aidan(2013). Living Jainism: An Ethical Science. John Hunt Publishing.[१]
  • Sangave, Vilas Adinath(2001). Aspects of Jaina religion. Bharatiya Jnanpith.[२]

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