निराशावाद

निराशावाद मन की एक अवस्था को सूचित करता है, जिसमें व्यक्ति जीवन को नकारात्मक दृष्टि से देखता है। मूल्य निर्णय के संदर्भ में व्यक्तियों के बीच नाटकीय अंतर हो सकता है, यहां तक कि तब भी, जब तथ्यों के निर्णय निर्विवाद हों. "गिलास आधा खाली है या आधा भरा हुआ है?" की परिस्थिति इस अवधारणा का सबसे आम उदाहरण है। अच्छी या बुरी के रूप में इस तरह की परिस्थियों के मूल्यांकन की श्रेणी का वर्णन क्रमशः व्यक्ति के आशावाद या निराशावाद के रूप में किया जा सकता है। पूरे इतिहास में, निराशावादी प्रवृत्ति ने चिंतन के सभी मुख्य क्षेत्रों को प्रभावित किया है।[१]
दार्शनिक निराशावाद इस विचार के समान है, लेकिन इसके समरूप नहीं है कि जीवन का एक नकारात्मक मूल्य होता है, या यह कि ये दुनिया इतनी अधिक बुरी है, जितनी कि संभवतः यह हो सकती है। अनेक दार्शनिकों ने यह भी पाया है कि निराशावाद एक प्रवृत्ति नहीं है, जैसा कि आम तौर पर इस शब्द के द्वारा संकेत किया जाता है। इसके बजाय यह एक अकाट्य दर्शनशास्र है जो प्रत्यक्ष रूप से प्रगति की अवधारणा और आशावाद के विश्वास-आधारित दावों को चुनौती देता है।
उल्लेखनीय समर्थक[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
आर्थर शोफेनहॉवर[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
आर्थर शोफेनहॉवर का निराशावाद इस बात पर आधारित है कि मानवीय विचार और व्यवहार में मुख्य-प्रेरणा के रूप में इच्छा तर्क से ऊपर है। शोफेनहॉवर ने मानवीय अभिप्रेरणा के वास्तविक स्रोतों के रूप में भूख, कामवासना, बच्चों की देखभाल करने की आवश्यकता और शरण-स्थल व व्यक्तिगत सुरक्षा जैसे अभिप्रेरकों का उल्लेख किया। इन कारकों की तुलना में, तर्क मानवीय विचारों के लिये केवल ऊपरी दिखावट के समान है; यह ऐसे वस्र हैं, जिन्हें हमारी नग्न कामनाएं समाज में बाहर जाने पर ओढ़ लेती हैं। शोफेनहॉवर तर्क को इच्छा की तुलना में कमज़ोर और महत्वहीन मानते हैं; एक उपमा देते हुए, शोफेनहॉवर्र ने मानवीय बुद्धि की तुलना एक अपाहिज व्यक्ति के रूप में की है, जो देख सकता है, लेकिन जो इच्छा रूपी अंधे दानव के कंधों पर सवार है।[२]
मनुष्य के जीवन को अन्य पशुओं के जीवन के समान मानते हुए, उन्होंने प्रजनन-चक्र को वस्तुतः एक चक्रीय प्रक्रिया के रूप में देखा, जो कि निरर्थक रूप से और अनिश्चित काल तक जारी रहती है, जब तक कि क्रमिक जीवन को संभव बनाने के लिये आवश्यक संसाधन बहुत अधिक सीमित न हो जाएं, जिस स्थिति में यह विलुप्ति के द्वारा समाप्त हो जाता है। शोफेनहॉवर के निराशावाद का एक मुख्य अंग इस बात का पूर्वानुमान करना है कि निरर्थक रूप से जीवन के चक्र को जारी रखा जाए या विलुप्ति का सामना किया जाए.[२]
इसके अतिरिक्त शोफेनहॉवर मानते हैं कि इच्छा की चाह में ही दुःख निहित हैं: क्योंकि ये स्वार्थी इच्छाएं विश्व में सतत टकराव उत्पन्न करती हैं। जैविक जीवन का कार्य सभी के विरुद्ध सभी का युद्ध है। इस बात का अहसास दिलाकर तर्क केवल हमारे दुःखों को बढ़ाने का ही काम करता है कि यदि हमें चयन का अधिकार दिया गया होता, तो हमने वह नहीं चुना होता, जो हमें प्राप्त हुआ है, लेकिन अंततः यह हमें दुःख भोगने से बचाने या इसके अंकुश की मार से बचा पाने में अक्षम होता है।[२]
प्रमाण[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
यह विश्व उतना बुरा प्रतीत होता है, जितना कि यह हो सकता था, इस बारे में कोई निजी राय या दृष्टिकोण, जैसे एक गिलास आधा भरा है या आधा खाली, देने के बजाय शोफेनहॉवर ने निराशावाद की अवधारणा के विश्लेषण के द्वारा इसे तार्किक रूप से सिद्ध करने का प्रयास किया।
साँचा:Quotation उन्होंने दावा किया कि परिस्थितियों में थोड़ी-सी भी गिरावट आने, जैसे इस ग्रह की कक्षा में छोटा-सा बदलाव होने, या किसी पशु द्वारा अपने किसी अंग का प्रयोग बंद कर देने का परिणाम विनाश के रूप में मिलेगा. यह विश्व आवश्यक रूप से बुरा है और "ऐसा नहीं होना चाहिये".[३] साँचा:Quotation
जिआकोमो लियोपार्डी[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
प्रकार[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
नैतिक[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
पतन के वर्णन को नैतिकता में देखा जा सकता है: फ्रेडरिक नीत्शे का अनैतिकतावाद, फ्रायड द्वारा उदात्तीकरण के रूप में किया गया सहकारिता का वर्णन, स्टैनली मिलग्रैम के शॉक प्रयोग, वैश्विक अंतर्संयोजनात्मकता के बावजूद युद्ध और नरसंहार की लगातार मौजूदगी और बाज़ार का रूढ़िवाद या राज्य-शासन कला.
बौद्धिक[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
~400 बीसीई (BCE) में, सुकरात-पूर्व के दार्शनिक गॉर्जियास ने विलुप्त हो चुकी एक रचना, ऑन नेचर ऑर द नॉन-एक्ज़िस्टंट (On Nature or the Non-Existent) में तर्क दिया कि:
- कुछ भी मौजूद नहीं है;
- यदि कुछ मौजूद भी हो, तब भी उसके बारे में कुछ भी जाना नहीं जा सकता; और
- भले ही उसके बारे में कुछ जाना जा सकता हो, लेकिन इससे संबंधित ज्ञान दूसरों तक नहीं पहुंचाया जा सकता.
फ्रेडरिक हैनरिच जैकोबी (1743-1819), ने तर्कवाद और विशिष्ट रूप से इमैन्युएल कान्ट के "निर्णायक" दर्शनशास्र, की विशेषता बताते हुए एक रिडक्शियो ऐड ऐब्सर्डम (reductio ad absurdum) दिया, जिसके अनुसार समस्त तर्कवाद (आलोचना के रूप में दार्शनशास्र) शून्यवाद बनकर रह जाता है और इसलिए इससे बचना चाहिये व इसके स्थान पर विश्वास और ईश्वरोक्ति के किसी प्रकार पर लौट आना चाहिये।
रिचर्ड रॉर्टी, कीर्कगार्ड और विटजेन्सटीन इस प्रश्न के अर्थ को चुनौती देते हैं कि क्या हमारी विशिष्ट अवधारणाएं एक उपयुक्त तरीके से विश्व के साथ संबंधित हैं, क्या हम अन्य तरीकों की तुलना में विश्व का वर्णन करने के हमारे तरीके को सही साबित कर सकते हैं। सामान्य रूप से, इन दार्शनिकों का तर्क है कि सत्य इसे सही रूप में प्राप्त करना अथवा वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करना नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक पद्धति का एक भाग था और किसी विशिष्ट समय में भाषा ने हमारे उद्देश्य की पूर्ति की; इस छोर तक उत्तर-संरचनावाद ऐसी किसी भी परिभाषा को अस्वीकार करता है, जो विश्व के बारे में पूर्ण 'सत्यों' या तथ्यों की खोज कर लेने का दावा करती हो।
राजनैतिक[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
किसी भी राजनैतिक दल में स्वयं में व स्वयं के बारे में निराशावादी रहने की प्रवृत्ति नहीं होती. रूढ़िवादी विचारक, विशेषतः सामाजिक रूढ़िवादी, अक्सर राजनीति की ओर एक निराशावादी दृष्टि से देखते हैं। विलियम एफ. बकले की यह टिप्पणी प्रसिद्ध है कि वे "इतिहास के आर-पार खड़े होकर 'रूको!' चिल्ला रहे हैं" और व्हाइटैकर चेम्बर्स का विश्वास था कि अवश्य ही पूंजीवाद का साम्यवाद के रूप में पतन हो जाएगा, हालांकि वे स्वयं अत्यधिक साम्यवाद-विरोधी थे। अक्सर सामाजिक रूढ़िवादी पश्चिम को एक अपकर्षी और शून्यवादी सभ्यता के रूप में देखते हैं, जिसने ईसाइयत तथा/या ग्रीक दर्शनशास्र की अपनी जड़ें खो दी हैं, जिसके परिणामस्वरूप इसका नैतिक व राजनैतिक पतन निश्चित है। रॉबर्ट बॉर्क की स्लाउचिंग टूवर्ड गोमोरा (Slouching Toward Gommorah) और ऐलन ब्लूम की द क्लोसिंग ऑफ अमेरिकन माइंड (The Closing of the American Mind) इस दृष्टिकोण की प्रसिद्ध अभिव्यक्तियां हैं।
अनेक आर्थिक रूढ़िवादी और दक्षिण-पंथी इच्छास्वातंत्र्यवादी मानते हैं कि समाज में राज्य का विस्तार और सरकार की भूमिका अपरिहार्य है और सर्वश्रेष्ठ रूप से वे इसके खिलाफ एक स्वामित्व अभियान लड़ रहे हैं। वे मानते हैं कि लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति शासित होने की है और स्वतंत्रता मामलों की एक अपवादात्मक अवस्था है, जो कि अब कल्याणकारी शासन द्वारा प्रदत्त सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के बदले छोड़ी जा रही है। कभी-कभी राजनैतिक निराशावाद की अभिव्यक्ति आतंक-राज्य संबंधी उपन्यासों में देखने को मिलती है, जैसे जॉर्ज ऑरवेल का नाइनटीन एटी-फोर .[४] अपने स्वयं के देश के प्रति राजनैतिक निराशावाद अक्सर उत्प्रवास की इच्छा से संबंधित होता है।[५]
पर्यावरणीय[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
कुछ पर्यावरणविदों का मानना है कि पृथ्वी की पारिस्थितिकी पहले ही अपूर्य रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी है और यहां तक कि राजनीति में कोई अवास्तविक परिवर्तन भी इसे बचा पाने के लिये पर्याप्त नहीं होगा। इस दृष्टिकोण के अनुसार, अरबों मनुष्यों का अस्तित्व-मात्र भी इस ग्रह की पारिस्थितिकी पर अत्यधिक दबाव डालता है, जिसका परिणाम अंततः एक मैल्थुशियाई पतन के रूप में मिलता है। यह पतन भविष्य में मनुष्यों की बड़ी संख्या का समर्थन कर पाने की पृथ्वी की क्षमता को कम कर देगा। साँचा:Citation needed
सांस्कृतिक[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
सांस्कृतिक निराशावादी मानते हैं कि स्वर्ण-युग इतिहास की बात है, तथा वर्तमान पीढ़ी केवल स्तर को गिराने और सांस्कृतिक जीविकावाद के ही योग्य है। ओलिवर जेम्स जैसे बुद्धिजीवी आर्थिक प्रगति को आर्थिक असमानता, कृत्रिम आवश्यकताओं की प्रेरणा और एफ्लुएंज़ा से जोड़कर देखते हैं। उपभोक्तावाद-विरोधी लोगों का मानना है कि संस्कृति में प्रत्यक्ष उपभोग और स्वार्थ, अपनी छवि के प्रति सतर्कता का व्यवहार बढ़ता जा रहा है। जीन बॉड्रीलार्ड जैसे उत्तर-आधुनिकतावादियों का तर्क है कि अब संस्कृति (और इसलिये हमारे जीवन) का वास्तविकता में कोई आधार नहीं है।[१]
कुछ उल्लेखनीय निरूपण इससे भी आगे चले गये हैं और वे इतिहास का एक वैश्विक रूप से लागू होने वाला चक्रीय मॉडल प्रस्तावित करते हैं—उल्लेखनीय रूप से जियामबैतिस्ता विको (Giambattista Vico) के लेखन में.
विधिक[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
बिबास लिखते हैं कि कुछ फौजदारी प्रतिवादी वकील निराशावाद की ओर गलती करना पसंद करते हैं: "आशावादी पूर्वानुमानों के जोखिम सुनवाई के दौरान विनाशकारी रूप से गलत सिद्ध होते हैं, यह एक लज्जाजनक परिणाम है, जिससे मुवक्किल क्रोधित हो जाता है। दूसरी ओर, यदि मुवक्किल अपने वकील के अत्यधिक निराशावादी परामर्श का पालन करें, तो मुकदमे सुनवाई के लिये नहीं जाते और मुवक्किल को कभी इस बात का पता नहीं चलता."[६]
मनोविज्ञान[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
निराशावाद का अध्ययन अवसाद के अध्ययन के साथ-साथ किया जाता है। मनोवैज्ञानिकों ने भावनात्मक दर्द या यहां तक कि जीव-विज्ञान में भी निराशावादी दृष्टिकोण की जड़ें खोजी हैं। आरॉन बेक का तर्क है कि अवसाद विश्व के संबंध में अवास्तविक नकारात्मक दृष्टिकोण के कारण उत्पन्न होता है। बेक अपने मरीज़ के नकारात्मक विचारों के बारे में उसके साथ चर्चा के द्वारा उपचार की शुरुआत करते हैं। हालांकि निराशावादी लोग अक्सर ऐसे तर्क प्रस्तुत कर पाने में सक्षम हो जाते हैं, जो यह सुझाव देते हैं कि वास्तविकता की उनकी समझ सही है; जैसे अवसादात्मक वास्तविकतावाद (Depressive realism) या (निराशावादी वास्तविकतावाद [pessimistic realism]) में.[१] बेक डिप्रेशन इन्वेंट्री (Beck Depression Inventory) के निराशावादी पदार्थ को आत्महत्याओं के अनुमान में उपयोगी पाया गया है।[७] बेक होपलेसनेस स्केल (Beck Hopelessness Scale) का वर्णन निराशावाद के माप के रूप में किया गया है।[८]
वेंडेर और क्लीन इस बात की ओर संकेत करते हैं कि निराशावाद कुछ परिस्थितियों में उपयोगी भी हो सकता है: "यदि कोई व्यक्ति बार-बार पराजित हो रहा हो, तो वह रूकने, प्रतीक्षा करने और दूसरों को जोखिम उठाने देने का एक रूढ़िवादी तरीका अपनाता है। एक निराशावादी दृष्टिकोण इस तरह की प्रतीक्षा में सहायक होता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति जीवन के टुकड़ों को बटोर रहा हो, तो जोखिम लेने वाली एक विस्तारवादी पद्धति को अपनाने और इस प्रकार अपर्याप्त संसाधनों तक अभिगम को अधिकतम स्तर तक बढ़ाने की क़ीमत चुकानी पड़ती है।[९]
आलोचना[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
आत्म-संतुष्टिपूर्ण भविष्यकथन[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
कभी-कभी निराशावाद को एक आत्म-संतुष्टिपूर्ण भविष्यवाणी समझा जाता है; अर्थात यदि कोई व्यक्ति किसी बारे में बुरा महसूस कर रहा हो, तो इससे भी बुरा परिणाम प्राप्त होने की संभावना ही अधिक होती है।[१०]
व्यावहारिक आलोचना[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
इतिहास के माध्य से, कुछ लोगों ने निष्कर्ष निकाला है कि दुःख सहने के लिये एक निराशावादी दृष्टिकोण, भले ही यह तर्कसंगत हो, से बचना अनिवार्य है। आशावादी दृष्टिकोणों को पसंद किया जाता है और भावनात्मक रूप से इनका सम्मान किया जाता है।[११] अल-गज़ाली और विलियम जेम्स ने मनोवैज्ञानिक, या यहां तक कि मनोदैहिक रोगों से जूझने के बाद अपने निराशावाद को अस्वीकार कर दिया. हालांकि इस प्रकार की आलोचना में यह माना जाता है कि निराशावाद अपरिहार्य रूप से उदासी और अत्यंत अवसाद की मनोदशा की ओर ले जाता है। कई दार्शनिक इस बात से असहमत हैं और दावा करते हैं कि "निराशावाद" का शोषण किया जा रहा है। निराशावाद और शून्यवाद के बीच संबंध उपस्थित है, लेकिन, जैसा कि एल्बर्ट कैमस जैसे दार्शनिकों का विश्वास था, यह आवश्यक नहीं है कि निराशावाद हमें शून्यवाद की ओर ही ले जाए. प्रसन्नता आशावाद के साथ अलंघनीय रूप से जुड़ी हुई नहीं है, न ही निराशावाद अलंघनीय रूप से अप्रसन्नता के साथ जुड़ा हुआ है। किसी अप्रसन्न आशावादी व्यक्ति और प्रसन्न निराशावादी व्यक्ति की कल्पना कर पाना बहुत सरल है। निराशावाद का आरोप वैध आलोचना को मौन करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सन 2006 में अर्थशास्री नॉरिएल रॉबिनी को, आगामी वैश्विक आर्थिक संकट के उनके भीषण किंतु सटीक पूर्वानुमान के लिये एक निराशावादी कहकर बहुत हद तक ख़ारिज कर दिया गया था। पर्सनैलिटी प्लस (Personality Plus) की राय है कि फिर भी निराशावादी स्वभाव (उदा. विषाद और निरुत्साह) उपयोगी हो सकता है क्योंकि नकारात्मक पहलू पर निराशावादी व्यक्ति का ध्यान केंद्रित होने के कारण उन्हें ऐसी समस्याओं को पहचान पाने में सहायता मिलती है, जिन्हें अधिक आशावादी स्वभाव (उदा. क्रोधी और विश्वासपूर्ण) व्यक्ति नहीं देख पाते.
क्षय[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
नीत्शे का मानना था कि प्राचीन ग्रीक लोगों ने अपने निराशावाद के परिणामस्वरूप दुःखान्त नाटकों की रचना की। क्या निराशावाद आवश्यक रूप से पतन, क्षय, अधोगति, थके हुए व कमज़ोर सहज-ज्ञान का संकेत है।.. क्या शक्ति का भी कोई निराशावाद होता है? क्या अस्तित्व के कठिन, वीभत्स, बुरे, समस्यापूर्ण पहलुओं के लिये तंदुरुस्ती के द्वारा, बढ़ी हुई सेहत के द्वारा, अस्तित्व की पूर्णता के द्वारा प्रोत्साहित कोई बौद्धिक पूर्वानुमान होता है?[१२]
निराशावाद के प्रति नीत्शे की प्रतिक्रिया शोफेनहॉवर की प्रतिक्रिया के विपरीत थी। "'प्रत्येक दुःखद वस्तु को इसकी अनोखी बढ़नेवाली शक्ति'" — द वर्ल्ड ऐज़ विल एंड रिप्रेज़ेन्टेशन (The World as Will and Representation), खण्ड II, पृ. 495 में वे (शोफेनहॉवर) कहते हैं — "'इस खोज से प्राप्त होती है कि यह विश्व, वह जीवन, कभी भी वास्तविक संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकता और इसलिये यह हमारी अनुरक्ति के योग्य नहीं है: इससे मिलकर दुःखी आत्मा बनती है - इसका परिणाम ईश्वरेच्छाधीनता (resignation) के रूप में मिलता है।' "डायोनिसस ने मुझसे कितने अलग तरीके से बात की! मैं इस समस्त ईश्वरेच्छाधीनता से कितनी दूर कर दिया गया!"[१३]
इन्हें भी देखें[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
टिप्पणियां[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
- ↑ १.० १.१ १.२ बेनेट, ओलिवर. कल्चरल पेसिमिज़्म (Cultural pessimism). एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी प्रेस. 2001.
- ↑ २.० २.१ २.२ Schopenhauer, Arthur Studies in Pessimism. Cosimo, Inc..ISBN 1602063494.
- ↑ साँचा:CathEncy
- ↑ (1969). Orwell's Political Pessimism in'1984'. Polity.[१]
- ↑ (1992). The emigration potential of Czechoslovakia, Hungary, Lithuania, Poland and Russia: recent survey results. International Sociology.[२]साँचा:Dead link
- ↑ . Plea Bargaining outside the Shadow of Trial. Harvard Law Review.
- ↑ (1985). Hopelessness and eventual suicide: a 10-year prospective study of patients hospitalized with suicidal ideation. American Journal.[३]
- ↑ (1974). The measurement of pessimism: the hopelessness scale. Journal of Consulting and Clinical.
- ↑ (1982). Mind, Mood and Medicine. New American Library.
- ↑ ऑप्टिमिज़्म/पेसिमिज़्म. जॉन डी. और कैथरीन टी. मैकआर्थर शोध. http://www.macses.ucsf.edu/Research/Psychosocial/optimism.php#relationhealth Archived 28 सितंबर 2011 at Web Archive
- ↑ माइकल आर. मिकाउ. "डूइंग, सफरिंग, एंड क्रियेटिंग": विलियम जेम्स एण्ड डिप्रेशन. http://web.ics.purdue.edu/~mmichau/james-and-depression.pdf Archived 26 फ़रवरी 2009 at Web Archive.
- ↑ नीत्शे, फ्रेडरिक, द बर्थ ऑफ ट्रैजडी ऑर: हेलेनिज़्म एन्ड पेसिमिज़्म, "एटेम्प्ट ऐट अ सेल्फ-क्रिटिसिज़्म," § 1
- ↑ नीत्शे फ्रेडरिक, द बर्थ ऑफ ट्रैजडी ऑर: हेलेनिज़्म एन्ड पेसिमिज़्म, "एटेम्प्ट ऐट अ सेल्फ-क्रिटिसिज़्म," § 6
सन्दर्भ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
- डियेनस्टैग, जोशुआ फोआ, पेसिमिज़्म: फिलासॉफी, एथिक, स्पिरिट, प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2006, आईएसबीएन 0-691-12552-X
- नीत्शे, फ्रेडरिक, द बर्थ ऑफ ट्रैजडी एण्ड द केस ऑफ वैग्नर, न्यूयॉर्क: विन्टेज बुक्स, 1967, आईएसबीएन 0-394-70369-3