Deprecated: Caller from MediaWiki\Cache\LinkCache::fetchPageRow ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385

Deprecated: Caller from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::selectOne ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385

Deprecated: Caller from MediaWiki\Page\PageProps::getProperties ignored an error originally raised from MediaWiki\Extension\SmartCommons\Store\MetadataStore::updateMetadata: [1054] Unknown column 'scf_url' in 'SET' in /www/wwwroot/enwiki/w/includes/debug/MWDebug.php on line 385
प्राचीन यूनानी चिकित्साविज्ञान - भारतपीडिया सामग्री पर जाएँ

प्राचीन यूनानी चिकित्साविज्ञान

भारतपीडिया से
अंगूठाकार बनाने में त्रुटि हुई: फ़ाइल गायब है
हिप्पोक्रेटस : पाश्चात्य जगत में इसे चिकित्साविज्ञान का जनक माना जाता है।

यूनानी चिकित्साविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हिप्पोक्रेटस था जिसे पाश्चात्य जगत 'चिकित्साविज्ञान का जनक' कहता है। हिप्पोक्रैटस और अन्य लोगों की कृतियों का इस्लामी चिकित्साविज्ञान और मध्यकाल के यूरोपीय चिकित्साविज्ञान पर गहरी छाप पड़ी और अन्ततः १४वीं शती के बाद ये सिद्धान्त कालातीत (obsolete) हो गए।

परिचय[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

'यूनानी' शब्द संस्कृत 'यवनानी' का रूपांतर मात्र है, जो स्वयं 'यवन' शब्द से व्युत्पन्न है। पाणिनि के समय में �यवनानी�शब्द यवन की स्त्री के लिये प्रयुक्त होता था। पीछे यह शब्द यवनों की लिपि और यवनों की भाषा के लिये भी प्रयुक्त होने लगा। प्राचीन काल में ग्रीस देश को यूनान कहते थे और वहाँ के तथा सीरिया के रहनेवालों को यूनानी। संस्कृत ग्रंथों से पता लगता है कि प्राचीन काल में विदेशियों और विधर्मियों को यवन कहते थे। यह शब्द उस समय से प्रचलित है, जब इस्लाम धर्म और मुसलमानों का संसार में कहीं नामोनिशान भी नहीं था। आज यूनानी चिकित्सापद्धति मुसलमानों के हाथ में है। इसके ग्रंथ अरबी, फारसी और अब उर्दू में भी मिलते हैं। प्राचीन यूनानी ग्रंथ ग्रीक और लैटिन भाषाओं में थे। उन्हीं का अनुवाद अरबों ने अपनी भाषा में किया था। अरबों को चिकित्सा का ज्ञान यूनान से ही प्राप्त हुआ था और उसकी प्रतिष्ठा, प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सूचित करने के लिये उन्होंने चिकित्सापद्धति के साथ यूनानी शब्द जोड़ दिया था। अरब वाले इस पद्धति को ही आज अपनी पद्धति मानते हैं। यूनानी पद्धति का आविर्भाव यूनान में हुआ था, जिसकी वृद्धि में अनेक यूनानी दार्शनिकों का, जैसे अस्कलीप्यूस (Ascelepus), वुकरात (Hippocrates) पिथैगोरैस (pythhagoras), अफ्लातून (Plato), अरस्तु (Aristotle) और पीछे इस्कंदरिया के इरोफिलस (Herophhilus), एरासिसट्राटस (Erasistratus) और अंत में जालीनूस (Galenus) का सहयोग प्राप्त हुआ था।

कालांतर में यूनानी विद्या का ह्रास होना शुरू हुआ। यूनानी विद्या को रोमनवालों ने ग्रहण कर लिया, पर वे उसका विकास कुछ नहीं कर सके। इस बीच इस्लाम धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। मुसलमान शासकों ने यूनान के ज्ञानकोश को अरबी ढाँचे में ढाल लिया और उसकी अन्य देशों के ज्ञान विज्ञान एवं विद्याओं से तुलना की। इससे अनेक देशां के ज्ञानभंडार का अरबी भाषा में संग्रह हो गया।

अब अरबी विद्वान् प्रतिलिपि एवं अनुवाद कार्य से विरत होने के उपरांत, ज्ञान विज्ञान के पूर्ण अधिकारी बन गए तथा उनके पास एक ज्ञानकोश संचित हो गया। तब आधिकारिक बन गए तथा उनके पास एक ज्ञानकोश संचित हो गया। तब आधिकारिक रूप से इन्होंने इन प्राचीन सिद्धांतों एवं समस्याओं का परिशीलन, विवेचन, मीमांसा और अन्वेशण आरंभ किया और उनके प्रत्येक अंगोपांग में विकास किया। दूसरे शब्दों में यूनानी वैद्यक, अरबी वैद्यक का परिधान धारण करने लगा। अरबी विकास मूल ज्ञानकोश के साथ ऐसा हिल मिल गया कि उसे पृथक् करना दुष्कर एवं दुरूह हो गया।

अरबों के शासन के शांतिकाल में जो वैद्यक ग्रंथ प्रणीत किए गए, वे इतने उच्च कोटि के सिद्ध हुए कि सभी पाश्चात्य और पूर्व देशों के विद्वानों ने ऐसे ग्रंथों को पाठय् ग्रंथ के रूप में स्वीकृत कर लिया।

यूनान में वैद्यक ज्ञान का प्रसार मिस्र और फीनिशिया द्वारा हुआ। आयुर्वेद का बहुत सा ज्ञान भारत से बौद्ध भिक्षुओं द्वारा, अथवा सीरिया और बैबिलोनिया हाकर, मिस्र गया, मिस्र से युनान गया, अथवा ईरान होकर यूनान गया और वहां से अरब और अन्य पश्चात्य देशों में फैला। आधुनिक पाश्चात्य वैद्यक विज्ञान का आधार भारतीय आयुर्वेद ही है और ऐलोपैथी का मूल मंत्र भारत से ही गया। वस्तुत: आधुनिक ऐलोपैथी में यूनानी और आयुर्वेदीय चिकित्सापद्धति दोनों ही मिले हुए हैं। भारत की चिकित्सापद्धति प्राचीन कल में अधिक समृद्ध और उन्नत थी। चीनी चिकित्सा पद्धति पर भी इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ा देखा जाता है।

यूनानी वैद्यक के आधारभूत सिद्धांत, अरकान अरबआ और अरबलात अरबआ आदि, आर्यवैद्यक में बहुत पहले से स्थिर हो चुके थे और इन्हें चतुर्महाभूत, या पंचमहाभूत और चतुर्दोष, या त्रिदोष आदि नामों से जानते थे। उक्त काल में ही बुकरात, डाइऑसकॉरिडीज़ (Dioscorides) और जालीनूस आदि के ग्रंथों में अनेक भारतीय द्रव्यों तथा सिद्धांतों का ग्रहण हो चुका था। मुवश्शिर इवनफातिक ने मुख्तारूल हुक्म में लिखा है �जब सिकंदर ने दारा पर विजय पाई, तो उसने ईरानियों के समस्त ग्रंथ नष्ट कर दिये, केवल ज्योतिष, दर्शन और वैद्यक के ग्रंथ छोड़ दिए, जिनका उसके आदेश से यूनानीय भाषांतर किया गया।�संभवत: भारत से भी इसी प्रकार वैद्यक विद्या के कोश यूनानियों के हाथ आए हों।

सिकंदर के आक्रमण ने यूनानियों तथा भारतीयों के बीच संबंध पैदा कर दिया था। इस मेलजोल का अवश्यंभावी परिणाम यह हुआ कि यूनानियों ने भारतीयों से विधि ज्ञान विज्ञान सीखे। बाद में भी यह संबंध ईरान, सीरिया और इस्कंदरिया से बना रहा। डॉ॰ हॉर्न्ले (Hornle) तथा डॉ॰ न्यूबर्ग (Neuberg) ने लिखा है कि टीजिऐस (Ctesias) और मेगास्थीनीज़ (Megasthenes) नामक दो यूनानी हकीम ईसवी सन से ४ शती पूर्व ज्ञान की खोज में भारत आए थे। यह कारण है कि उत्तरकालीन यूनानी ग्रंथों में ब्रणपूरण की भारतीय विधियों का उल्लेख मिलता है। यूनानियों से यूनानी भाषा के ग्रंथें द्वारा यूरोप, एशिया और अफ्रीका की अनेक जातियों ने इस विद्या को सीखा और उसका प्रचलन हर स्थान पर हो गया था।

यूनानी-रूसी-संस्कृति के हास के पश्चात् ज्ञान और विद्या के साथ वैद्यक की धरोहर भी मुसलमानों के हाथ में आई जिन्होंने इसे बलख, बोखारा, तुर्किस्तान, चीन और भारत से लेकर अंदलुस (स्पेन) तक फैलाया। इस्लाम के प्रारंभिक काल में, यद्यपि इसके अभिभावक मुसलमान अवश्य थे, तथापि यह अन्य जातियों के हाथ में रही। लगभग डेढ़ सौ वर्षो तक यूनानी चिकित्सा पद्धति को ईसाई, यहूदी, तारापूजक, ईरानी, कुल्दानी (Kelts), मिस्री और सुरयानी आदि विभिन्न भाषाभाषी जातियाँ जाननेवाली थीं। जब इन ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हो गया तब मुसलमानों ने इस विद्या को सीखना प्रारंभ किया, तब अनेक विश्वविख्यात, हकीमों जैसे राजी और शेख, का प्रादुर्भाव हुआ।

आधारभूत सिद्धान्त[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

यूनानी चिकित्सा के आधारभूत सिद्धांत निम्नलिखित है:

इल्मेतिब (वैद्यक) शास्त्र है जिससे मानवशरीर की स्वस्थ तथा अस्वस्थ अवस्थाओं का ज्ञान होता है और यह शास्त्र बताता है कि स्वास्थ्य की रक्षा कैसे की जा सती है तथा रोगावस्था में रोग का निवारण कैसे हो सकता है। मनुष्य का स्वास्थ्य उन तत्वों की प्राकृतिक और अप्राकृतिक स्थिति पर निर्भर करता है जिनसे मानव शरीर बना है। इन तत्वों को यूनानी चिकित्सक उमूर मुकब्वेमा, या अज़ज़ाइ मुकव्वेमा, कहते हैं। मनुष्य का अस्तित्व इनहीं तत्वों पर निर्भर है। जब तक ये तत्व अपनी प्राकृतिक अवस्था में रहते हैं, तब तक मानव शरीर अपना कार्य नियमित रूप से करता है। इसी का नाम स्वास्थ्य है। इन मूल तत्वों पर ही मानव प्रकृति की उत्पत्ति निर्भर करती है, दि इन तत्वों में एक भी न रहे, तो मानव शरीर की स्थिति असंभव हो जायगी।

उमूर तबीइय्या को ही आयुर्वेद में दोष-धातुमल-विज्ञान और ऐलोपैथी में फिज़ियॉलोजी कहते हैं। उमूर तबीइय्या में सात तत्वों का समावेश है:

  • १. अरकान (चतुर्महाभूत);
  • २. मिजाज, या गुण प्रकृति;
  • ३. अखलात, या चतुर्दोष (मानव शरीर के समस्त द्रव उपादान);
  • ४. आज़ा, या धातु तथा अंग प्रत्यंग एवं स्रोत;
  • ५. अरवाह, या ओज एवं वायु;
  • ६. क़ुवा, या बल और
  • ७. अफ्आल (शरीर क्रिया या कर्म)।

ये ही शरीर के कूल घटक, या उपादान है जिनसे मनुष्य बना है। इल्म मनाफ़ेडल् आजा (क्रिया शरीर ग्रंथों) में इन्हीं पदार्थो का निरूपण हुआ करता है।

यूनानियों ने शरीर के संघटनकारी समस्त पदार्थो को दो प्रधान भागों, द्रव्यभूत और अद्रव्यभूत, में बाँटा है अद्रव्यभूत घटक द्रव्य नहीं है। यह द्रव्यभूत घटकों के आश्रय से रहनेवाला उनका गुणधर्म है। इनहें छोड़ देने पर द्रव्यभूत घटक केवल चार ठहरते हैं, जिनमें अरकान द्रव्यीभूत घटकों के भी निर्मायक मूलभूत तत्व हैं। इसे छोड़ देने पर केवल तीन द्रव्यभूत घटक, अखलात, आज़ा और अरवाह रह जाते है।

यूनानियों ने शरीर के समस्त संघटनकारी तत्वों को स्वरूप की द्दष्टि से तीन वर्गो में बाँटा है:

  • १. वायु रूप समस्त घटक अरवाह;
  • २. द्रव रूप समस्त घटक, अख्लात और
  • ३. ठोस रूप समस्त घटक, आज़ा।

शैखुर्रईस ने यूनानी वैद्यक के समस्त प्रतिपाद्य विषयों और उनके अंग प्रत्यंगों का अपने सुप्रसिद्व ग्रंथ, अल कानून के प्रारभिक अध्यायों में विशद विवरण दिया हैं। इस ग्रंथ में यह भी बतायया गया हैं कि हकीम को किन किन बिषयों को कितना जानना आवश्यक हैं तथा किन बिषयों में प्रत्यक्ष, अनुभव एवं परीक्षण अपेक्षित हैं। शेख महोदय कुल्लियात कानून की दूसरी फसल मौजआत तिब (चिकित्सा के प्रतिपाद्य) में फर्मातें हैं :

'चूकिं यूनानी वैद्यक शास्त्र स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य (सेहत एवं जवाले सेहत) की द्दष्टि से मानव शरीर का निरूपण करता हैं और प्रत्येक वस्तु का ज्ञान उसी समय पुर्णतया प्राप्त कर लिया जाय, बशर्ते कि उस वस्तु के कारण का हों, इसके लिए यह आवश्यक हैं कि यूनानी वैद्यक शास्त्र में स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य (रोग) के हेतु, उनके कारण ज्ञात किए जाए। चूँकि स्वास्थ्य तथा उनके निदान कारण कभी व्यक्ति एवं प्रकट होते हैं और कभी अव्यक्त एवं अप्रकट, जो ज्ञानेद्रियों से ज्ञात नहीं किए जा सकते प्रत्यूत उनके ज्ञान के लिये उपद्रव एवं लक्षण के पथप्रदर्शन की अपेक्षा हुआ करती हैं, इसलिये यह भी अनिवार्य हो गया कि यूनानी वैद्यक शास्त्र में स्वास्थ्यावस्था एवं अस्वास्थ्यावस्था (रोगवस्था) में होने वाले उन उपद्रवों एवं लक्षणों का उल्लेख किया जाय जिनसे हम स्वास्थ्य एवं अस्वास्थ्य अर्थात् रोग के पहचानने में समर्थ हो जातें हैं। �उलूम हकीकिया (जाति तथा धर्म निरपेक्ष) में ऐसा कहा हैं कि किसी वस्तु का ज्ञान उसके निदान कारणों से प्राप्त होता हैं। यदि उसके निदान कारण न हो, तो उसके निजी लक्षणों के ज्ञान से कुछ सीमा तक उसका पता लग जाता हैं।

यूनानी ग्रंथो में अस्बाग (हैतुकी) के चार भेद बताए गए हैं। ये हैं : अस्बाब माद्दिया, अस्बाब फाएलिया, अस्बाब सूरिया और अस्बाब तमामिया, या गइया। बस्बाब माद्दिया (समवायिकारण) से स्वास्थ्य एवं रोग अधिष्ठित होते हैं। इसके भी दो उपभेद है: १. सन्निकृष्ट (मौजूअ करीब) और विप्रकृष्ट (मौजअ बदई)। सन्निकृष्ट निदान अंग प्रत्यंग, ओज एवं वायु हें और विप्रकृष्ट निदान चतुर्दोष (अखलात) और चतुर्महाभूत (अरकान) हैं। असबाब फाएलिया वे कारण हैं, जो मानव शरीर के भीतर परिर्वतन करते हें, या उनकी रक्षा करतें हैं। अस्बाब सूरिया के तीन उपभेद है: १. प्रकृति (मजाजात), २. बल (कुवा) और ३. संगठन (तराकीब)। प्रकृति, बल और संगठन के यथावत् रहने से बाह्य स्वास्थ्य पाया जाता हैं। इन तीनों में से किसी एक के विकृत होने से रोग होता हें। अस्बाब तमामिया शरीर क्रियाएँ (अफकाल) हैं।

सुतरा यूनानी वैद्यक में निम्न विषयों का प्रतिपादन किया जाता है : महाभूत (अरकान) प्रकृति (मिजाजात), दोष (अख्लात), अभिश्रावयव (आजाए बसीता, मुफरदा), संमिश्रावयव (आजाए मुरक्कबा), प्राण और ओज (अरवाह), बल (कुवाए तबइयया, हैवानिया व नफसाविया, शरीर क्रिया वा कर्म (अफ्आल), स्वास्थ्यय एवं अस्वास्थ्य और तन्मध्यवर्ती हालात (हालात सालसा), अस्वस्था दृष्ट, या शरीरिक अवस्था में और अधोलिखित निदान कारण खाद्य, पेय, वायु, जल, देश तथा स्थान, संसाधन, स्तंभन, व्यवसाय, स्वभाव, कायिका एवं मानसिक कार्य, अकार्य, विभिन्न वायु लिंगभेद, शरीर पर आने वाले अन्य ब्ह्राा विषय (उमूर गरीब), स्वास्थ्य संरक्षण, प्रत्येक व्याधि के निवारणार्थ खाध एवं पेय की विधि, चेष्टा अचेष्टा (हरकात व सकनात) का अनुमान, औषधसेवन, हस्तकर्म एवं शल्यकर्म से लाभ उठाना। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्हें हकीम को बिना तर्क के मान लेना चाहिए और कुछ ऐसे हैं जिन्हें तर्क और युक्ति से सिद्व करना होता हैं।

वैद्यक शास्त्र में कुछ विषय अन्य शास्त्रों से ग्रहण किए गए हैं, ऐसे विषयों का स्वरूप तर्क एवं युक्ति के बिना स्वीकार कर लेना वैद्य के लिये अनिवार्य हैं। अंग प्रत्यंग और उनके कर्म (अफआल) तो ज्ञानेंद्रियों और शवच्छंदेन एवं शल्यकर्म (तश्रीह) से ज्ञात किए जातें हैं। शेख कहते हैं, जिन विषयों का जानना और जिनकी वैद्यक में तर्क एवं युक्ति से सिद्ध करना आवश्यक हें, वे रोग, उनके निदान कारण (अस्बाब जुज इयया) और उनके लक्षण है तथा यह है कि व्याधि का निवारण किस प्रकार किया जाए एवं स्वास्थ्य संरक्षण किस प्रकार हो सकता हैं। ये विषय ऐसे हें कि उनमें से जिनका अस्तिव स्पष्ट एवं निश्चित न हो, उनको समय और प्रमाण- वर्णानासह तर्क एवं युक्ति - से विस्तारपूर्वक सिद्ध करना आवश्यक हैं।

शेख के विवरण से हमें जहाँ यूनानी वैद्यक के समस्त प्रतिपाद्यों एवं सिद्वांतो का संक्षेप में ज्ञान हो जाता हैं, वहाँ इस विषय का भी ज्ञान होता हैं कि इन प्राचीन विद्वानों के पास प्रत्यक्ष ज्ञानार्थ उस प्रारंभिक एवं सरल युग में जो जो उपकरण उपलब्ध थे, उनसे अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य भर काम लेने में इन औद्योगिकों (जफाकाशों) ने कोई बात उठा नहीं रखी हैं।

कपितय सिद्वांतो का बदलना और विभिन्न अन्वेषक का विभिन्न काल में विभिन्न निष्कर्ष पर पहुँचना, एक अबाध नियम हैं। पाश्चात्य वैज्ञानिक विषयों के संबंध में भी ऐसा सदा ही होता आ रहा हैं। जो बात एक समय अकाट्य सत्य समझी जाती थी, वह नए साधनों, उपकरणों और खोजों से अनेक बार असत्य प्रमाणित हुई हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान के बाद भी भूयोदर्शन करने वालों से भूल होना संभव है, तो इस नियम से प्राचीन विद्वान भी नहीं बच सकते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रकृति के नियमों का अध्ययन एवं निरीक्षण उन्होनें किया। प्रत्यक्ष प्रयोग या अनुभव के बाद कुछ निष्कर्ष स्थिर किए, उनमें से कुछ पीछे के प्रयोगों और अनुभवों से मिथ्या सिद्ध हुए। इससे हम उन प्राचीन विद्वानों को दोष नहीं दे सकतें। शैखुरईस के अनुसार व्याधि का प्रतिकार हेतुव्याधिविपरीत (बिज्जिद) द्वारा ही किया जाता हैं। इसे एलाज विज्जिद कीतं हैं। यही मूलभूत सिद्धांत अन्य चिकित्सा प्रणालियों के भी हैं।

इन्हें भी देखें[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]