बौना ग्रह
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बौना ग्रह एक ऐसा आकाशीय पिंड होता है जो किसी अन्य ग्रह की परिक्रमा नहीं करता तथा ग्रह के समान बहुत से गुण प्रदर्शित नहीं करता |
सौरमण्डल में बौने ग्रहों की संख्या अज्ञात है | बौना ग्रह का निर्धारण उसका करीब से अवलोकन करके किया जाता है | आधा दर्जन बौने ग्रहों में कम से कम एक चन्द्रमा अर्थात उपग्रह उपस्थित है | आकाशीय पिंडों को तीन भागों में विभाजित किया गया है जो तारे की विशिष्ट कक्षा में परिक्रमा करते हैं- बौना ग्रह, उपग्रह और ग्रह | ग्रह की नई संकल्पना ने प्लूटो को ग्रहों की श्रेणी से निकल कर बौने ग्रहों की श्रेणी में रखा गया |
अवधारणा का इतिहास[सम्पादित करें | स्रोत सम्पादित करें]
1801 में मंगल और बृहस्पति के बीच उपस्थित क्षुद्र ग्रहों की खोज से पहले उनको ग्रह माना जाता था | 1851 तक ग्रहों की संख्या 23 तक मानी जाने लगी | खगोलविदों ने छोटे पिंडों के लिए क्षुद्रग्रह शब्द का उपयोग शुरू किया और फिर उनका नामकरण या ग्रहों के रूप में वर्गीकरण करना बंद कर दिया | [१] 1930 में यम की खोज के बाद सौरमंडल में 9 ग्रह माने जाने लगे |
लगभग 50 वर्षों तक यम को बुध से बड़ा माना जाता था | [२][३] 1978 में यम के उपग्रह शैरन की खोज हुए | इससे उसके द्रव्यमान और आकर का आंकलन करना आसान हो गया | तब पता चला की यम के आकर का जो पुराना आंकलन था वह उससे छोटा था | [४] इसका भार पृथ्वी के चन्द्रमा से पांच गुणा और बुध से बीस गुणा कम था | पर अब भी यह क्षुद्रग्रह पट्टिका के सीरीस से 10 गुणा अधिक बड़ा था | [५]
हमारे सौरमण्डल में पाँच ज्ञात पिण्डों को 'बौना ग्रह' की संज्ञा दी गयी है :
१) यम (प्लूटो)
२) सीरीस
३) हउमेया
४) माकेमाके
५) ऍरिस
(एरिस सबसे बड़ा बौना ग्रह है।)
साँचा:स्टब
साँचा:सौरमण्डल
- ↑ (2007). "Changes in a scientific concept: what is a planet?". Preprints in Philosophy of Science. [१]
- ↑ Mager, Brad"Pluto Revealed".discoveryofpluto.com.[२]
- ↑ (September 14, 2007)."Is Pluto a planet?".Cornell University, Astronomy Department.[३]
- ↑ Buie, Marc W.(2006). "Orbits and Photometry of Pluto's Satellites: Charon, S/2005 P1, and S/2005 P2". The Astronomical Journal. 132(1)
- 290–98.doi:10.1086/504422.
- ↑ Jewitt, David(2006). The Solar System Beyond The Planets in Solar System Update : Topical and Timely Reviews in Solar System Sciences. Springer.ISBN 978-3-540-37683-5.



